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दुनिया मेरे आगे: नफरत के दौर में

इस पाक रिश्ते की गहराई इतनी अधिक थी कि उन्हें हिंदू या मुसलमान होने के गुमान का कभी अहसास तक नहीं हुआ।

Author नई दिल्ली | Published on: January 23, 2020 1:03 AM
तेरा मजहब, मेरा मजहब के वाक युद्ध में जिम्मेदार बहुत से हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

कभी-कभी बहुत तकलीफ देने वाले हादसे बाकी दुनिया को बहुत बड़ा पैगाम दे जाते हैं। ऐसी ही एक घटना, जिसने न केवल मुझे, बल्कि बहुत बड़ी बिरादरी को झकझोर कर रख दिया। हाल ही में दिल्ली में भीषण अग्निकांड हुआ, जहां एक तीन मंजिला इमारत में आग लगने से दर्जनों बेगुनाह मौत के आगोश में समा गए। उस घटना के वक्त सबसे ऊपरी मंजिल पर फंसे लोगों में से एक मुसलिम युवक मुशर्रफ भी था। चारों ओर आग से घिरी इमारत और कमरे के भीतर दम घोंटते धुएं के बीच वह अपनी जिंदगी के आखिरी पल सामने देख रहा था और उसी वक्त उसने आखिरी फोन अपने परिवार या मजहब के किसी सदस्य या रिश्तेदार को नहीं करते हुए, अपने बचपन के हिंदू दोस्त मोनू अग्रवाल को किया।

अब इन दोनों का इतना परिचय ही काफी है कि मुशर्रफ और मोनू अग्रवाल दोनों की बचपन से गहरी दोस्ती थी और दोनों को एक दूसरे पर बहुत ज्यादा यकीन था। यहां बात गहरी निकल कर सामने आती है कि शायद कोई बिरला इंसान ही हो सकता है, जो जिंदगी के आखिरी लम्हे में अपने घर वालों को या रिश्तेदारों को याद न करे। लेकिन मुशर्रफ ने जिंदगी के आखिरी लम्हे में फोन पर अपने बचपन के अजीज दोस्त मोनू से कहा- ‘आग लग गई भाई। आज नहीं बच पाऊंगा। भाई सिर्फ तुम पर भरोसा है! मेरे परिवार को जैसे-तैसे चला देना… आज तो मैं गया… आ जाना लेने… लेकिन यह मत सोचना कि मैं चला गया। हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा।’ इतना कहने के बाद मुशर्रफ की आवाज बंद हो गई। इस बातचीत का आॅडियो जिसने भी रूह से सुना, उसके भीतर एक गहरा सन्नाटा छा गया। शैतानी जिस्म में भी इंसानियत का संचार हो गया। दिमाग के कोने में बसे आवेश, नफरत, द्वंद्व और मजहबी पागलपन किसी गहरे रसातल में डूब से गए।

इस जिक्र से यह जाहिर होता है कि यह बातचीत महज एक घटना की गंभीरता को ही नहीं दर्शाती है, बल्कि यह इससे ऊपर मजहब और रिश्ते की असली कहानी बयां करती है। मजहब का सही मायने में पाठ पढ़ाती है। विडंबना है कि आज जब देश, दुनिया और समाज में मजहब के नाम पर बांटने और तोड़ने वाली बातों को हवा मिल रही है। तथाकथित मजहबी ठेकेदारों के बीच मजहबी कट्टरता के नाम पर इंसानों के बीच नफरत की दरारें डालने की होड़ मची है, अपने-अपने हिसाब से मजहब की परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं, आम आदमी के जेहन में मजहब के नाम पर दुश्मनी और खौफ पैदा करने की हरकतें हो रही हैं, ‘मारो-मारो’ का शोर मचा हुआ है… तब कोई नेक इंसान अपने आप को इस फानी दुनिया में अकेला और बहुत ठगा हुआ महसूस करता है।

हालांकि इस तेरा मजहब, मेरा मजहब के वाक युद्ध में जिम्मेदार बहुत से हैं। इसकी गुनहगार ऐसी ताकतें भी है, जो मजहब और कबीलों के नाम पर आम अवाम को बांट कर रखना चाहती है, ताकि उनकी सल्तनत सलामती से चलती रहे। ऐसे दौर और माहौल में इन दो अलग-अलग मजहब के दोस्तों की दर्द भरी और दिलकश कहानी न केवल इंसानी दिलों में इंसानियत भर देती है, बल्कि मजहब की एक नई इबारत लिखती नजर आती है। और वह इबारत लिखी जा रही है अपने बदन को आग में जलाने के बाद भी।

इस पाक रिश्ते की गहराई इतनी अधिक थी कि उन्हें हिंदू या मुसलमान होने के गुमान का कभी अहसास तक नहीं हुआ। अगर एहसास हुआ भी तो, उन्होंने सही मायने में मजहब को बेदाग रखा। उन्होंने सही मायनों में महजब की किताबों की पाक लाइनों को जिंदा रखा। यही तो बात थी, तभी तो नफरतों के दौर में केवल इंसानियत उनके भीतर बची थी। आज जो लोग सीने में सद्भाव की जगह द्वेष को पनाह दे रहे हैं। उनके लिए यह एक बहुत बड़ी सीख है मजहब के सही मायने को जानने-समझने की और इंसानियत को असलियत में कबूल करने की।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि आखिर मजहब के सही अर्थ में मायने क्या है! क्या वही है जो हम केवल सुनते आ रहे हैं? क्या कभी खुद किसी धर्म की किताब का अनुशीलन किया? क्या इंसानियत को सही मायने में समझने की कोशिश की? या फिर भेड़चाल की तरह दूसरों के बनाए रंगों की धर्म-ध्वजा लेकर आपसी कलह, कट्टरता और जेहाद का राग अलापते रहे? या फिर बांटने वाली सियासत के दलदल में फंस कर मौकापरस्त होकर अपना उल्लू सीधा करते रहे?

मैं ज्यादा तो नहीं, लेकिन एक दुनियावी तालीम प्राप्त इंसान होने के नाते यही कहूंगा कि हम सब अल्लामा इकबाल की वे पक्तियां जरूरत सुनते और कहते रहते हैं कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’ मजहब के नाम पर चंद लोग जो बैर करना सिखा रहे है, उनसे बचना जरूरी है और साथ ही जो इकबाल कह गए, हमें उस बात को जेहन में उतारना होगा। केवल बोलने मात्र से काम नहीं चलेगा। हमारी रूह जो सच और सही का आभास करे, हमें वही करना चाहिए। आदमजात और बिरादरी की भलाई इसी में है।

नरपत दान चारण

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