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दुनिया मेरे आगे: लालच की क्रूरता

हाल के दिनों में मानव निर्मित पर्यावरण के चलते छोटे जीवों का अस्तित्व खतरे में आ पड़ा है।

Author नई दिल्ली | Published on: January 24, 2020 1:14 AM
प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर चली यह कुल्हाड़ी परोक्ष रूप से मानवजाति के विनाश का कारण बनती है।

मां शिशु को जन्म देती है। इसके बाद धरती उस शिशु को शेष जीवन के लिए अपनी गोद में जगह देती है। उसके फलने-फूलने के हरसंभव प्रयास करती है। लेकिन वही शिशु बड़ा होकर मूर्खता और आत्म-घृणित नुकीलेपन की कुल्हाड़ी से पर्यावरण को चोट पहुंचाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर चली यह कुल्हाड़ी परोक्ष रूप से मानवजाति के विनाश का कारण बनती है। धरती पर असंख्य जीवों में मनुष्य एक है। लेकिन उसे अपने सिवाय दुनिया में कोई दिखाई नहीं देता। अपनी बुद्धि से वह सभी प्राणियों पर हावी होने का प्रयास करता रहता है। कई बार सफल भी होता है। बुद्धि दोधारी तलवार की तरह है। सदुपयोग हो तो विश्वकल्याण, नहीं तो विश्वविनाश। विश्वकल्याण की परिकल्पना में सभी जीवों का हित निहित होता है।

आज विकास और औद्योगीकरण के नाम पर धरती खोखली होती जा रही है। प्रदूषित जल, जानलेवा गैसों, कल-कारखानों और वाहनों की तीव्र ध्वनि और वनस्पति विहीन क्रंक्रीट और प्लास्टिक जंगल धरती के रक्षा कवच पर्यावरण को नेस्तनाबूद करने पर तुले हैं। मनुष्य अपने हाथों अपना गला दबा रहा है। आए दिन खनिज खनन के लालच में भूस्खलन जैसी घटनाओं को दावत दे रहा है। अमेजन तथा आस्ट्रेलिया के जंगल, जो समस्त प्राणी जगत को आॅक्सीजन का लगभग पांचवां हिस्सा प्रदान करते हैं, हाल के दिनों में धू-धू कर जल रहे थे। जब-जब प्रकृति असंतुलित होती है तब-तब मनुष्य को भूकम्प, अकाल, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी के प्रकोप का निवाला बनना पड़ता है। आज स्थिति इतनी दयनीय है कि धीरे-धीरे हिमनद पिघलते जा रहे हैं। ध्रुवीय भालू मरते जा रहे हैं। दुर्लभ जीव-जंतु, वनस्पति लुप्त हो रहे हैं। हर पांच में से दो लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता है। क्या हम भविष्य की पीढ़ी को यही देने जा रहे हैं?

क्या सृष्टि में मनुष्य से परे कोई और स्वार्थी प्राणी हो सकता है? मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति पर चोट करने से नहीं हिचकता। एक पेड़ के कटने से कितने जीव निराश्रित होते हैं, शब्दों में बयान कर पाना कठिन है। बहुमंजिला अट्टालिकाओं के बीच चमकने वाला सूरज, बारिश की बूंदों की फुहार, चहचहाने वाली गौरैया, रंग-बिरंगी तितलियों के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। अब लोगों के पास इतना समय नहीं कि वे इन सबके बारे में सोचें। वह तो चौबीसों घंटों मोबाइल के मोहजाल में फंसा रहता है। पहले लोग अपने घरों में कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, चांदनी आदि पेड़-पौधे लगाते थे। इसी बहाने पक्षियों का चहचहाना सुनने को मिल जाता था। अब शहरों और गांवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फोन के टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें गौरैया और कुछ अन्य पक्षियों की प्रजनन और गतिकी क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मनुष्य असंख्य जीवों का हत्यारा बन जाता है। इन हत्याओं के लिए कोई सुनिश्चित दंड विधान नहीं है और न ही कोई जिम्मेदारी।

हाल के दिनों में मानव निर्मित पर्यावरण के चलते छोटे जीवों का अस्तित्व खतरे में आ पड़ा है। कीटनाशकों, सेलफोन टावरों और जल प्रदूषण के कारण बड़ी संख्या में मधुमक्खियां, पक्षी और समुद्री जीव मारे जा रहे हैं। मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण आज दुनिया में मानव अस्तित्व पर सवाल उठाने वाले प्रमुख मुद्दों में से एक है। इस विनाशकारी प्रवृत्ति का कारण मानवीय त्रुटि है। दुनिया प्लास्टिक दानव का शिकार हो रही है। वियतनाम, कंबोडिया जैसे देशों में प्लास्टिक सामग्री का उपयोग कम किया जाता है। अगर किया भी जाता है तो उसे तुरंत जला दिया जाता है। दुनिया के सभी देशों को प्लास्टिक के उपयोग पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

प्रकृति की रक्षा करने की जिम्मेदारी हम सब पर है। रीसाइक्लिंग के माध्यम से विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों की रीसाइक्लिंग करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। सिंचाई के लिए दैनिक उपयोग के गंदे पानी का नियमित उपयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा, चिमनी को ज्यादा ऊंचाई पर रखा जाना चाहिए, ताकि उन्हें धूम्रमुक्त बनाया जा सके। उच्च तापमान पर जहरीले रासायनिक कचरे को जलाया जाना चाहिए। सामान, सब्जियों आदि के लिए प्लास्टिक की थैलियों के बजाय कपड़े, कागज और लिनन बैगों का उपयोग करने से पर्यावरण में प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। यहां तक कि बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें अपने साथ पौधे लगाना और दोस्तों के जन्मदिन पर पौधे देना सिखाया जाना चाहिए। पक्षी आसमान में उड़ता है, मछली पानी में तैरती है, चीता तेजी से दौड़ता है, लेकिन प्रकृति ने हमें सोचने के लिए बुद्धि दी है। इससे हम परिवर्तन और सुधार ला सकते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था- ‘धरती के पास सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता है। किसी के लालच की नहीं।’ अगर मनुष्य आवश्यकता छोड़ लालच के पीछे दौड़ेगा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी गिनती लुप्तप्राय प्राणियों में होने लगेगी। लालच बेहद क्रूर है।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

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