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दुनिया मेरे आगे: दावानल में जलता जीवन

गहन विचार का मुद्दा है कि हम उन्नत तकनीकियों से लैस होकर भी लाचार जीवों की कोई सहायता नहीं कर पाते।

Author नई दिल्ली | Updated: January 22, 2020 1:20 AM
आग की परिधि में साउथ वेल्स के रिहायशी क्षेत्र भी आ चुके हैं। (फोटो-इंडियन एक्सप्रेस)

अनादि काल से ही जल और जंगल जीवन का पालना रहे हैं। नदी, तालाबों के किनारे उगी वनस्पतियां धीरे-धीरे विशाल वन में बदल गर्इं। मनुष्य ने जल के निकट आश्रय लेना शुरू किया और उससे प्यास बुझाई, वन से भूख मिटाई, लकड़ियां एकत्र कीं, औषधि प्राप्त की, छाया का आनंद उठाया। नदी किनारे पलने वाली आदिम सभ्यताएं समय के साथ बुद्धि के उच्च स्तर पर पहुंच गर्इं और फिर उन्हीं जंगलों को नष्ट कर कृषि की शुरुआत की। भोजन, औषधि, र्इंधन और छाया देने वाले तथा हरीतिमा से धरती को रंगने वाले पेड़-पौधे अब विकासशील मानव के लिए आवश्यकता से अधिक विवशता हो गए। मानव जाति की उपेक्षा और अन्यमनस्कता ने प्रकृति को विध्वंसक रूप लेने पर विवश कर दिया है।

ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में पिछले चार महीने से फैला भीषण दावानल धरती से हजारों वर्ग किलोमीटर की वन संपदा को भस्म कर चुका है। हजारों हेक्टेयर में लगातार आग के भयंकर तांडव में न जाने कितनी ही बहुमूल्य हरी और नम वृक्ष राशियां जल कर राख हो चुकी हैं। आग की परिधि में साउथ वेल्स के रिहायशी क्षेत्र भी आ चुके हैं। नागरिकों तक पहुंच रही अग्नि की लपटें शायद आॅस्ट्रेलियाई सरकार को गहरी नींद से नहीं जगा सकीं और आग की भयावहता बढ़ती गई। यही मिसाल तब देखने को मिली थी, जब ब्राजील के अमेजन जंगलों में आठ हजार से अधिक आग की घटनाएं घटीं थीं। वहां के प्रधानमंत्री जायरेकी बोलोनसरो ने अन्य राष्ट्रों से सहायता लेने से इनकार कर दिया था।

नतीजतन, धरती का फेफड़ा कहे जाने वाले अमेजन वन धधकते रहे… धरती से अमूल्य जैव विविधता नष्ट होती रही… आसमान धुएं से काला होता रहा… आॅक्सीजन के स्रोत जलते रहे। अंतरिक्ष में झंडे गाड़ने वाला इंसान मूकदर्शक बन महीनों बैठा रहा। यही भूल साउथ वेल्स में दोहराई गई। चार महीनों से जंगल को अपने आगोश में समेट रही आग पर काबू पाने के सभी उपायों को प्रयोग में नहीं लाया गया। अब आंकड़ों में वन संपत्ति और जंतुओं की मौत का अनुमान लगाया जा रहा है।

दुखद है, इन भयंकर अग्निकांडों में वन संपदा ही नहीं नष्ट होती, वनों के आश्रय में रहने वाले निरीह जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों पर आग की लपटें मृत्यु का ग्रास बन कर टूटती हैं। भोले-भाले, बेबस जंगलीय जीव आग में स्वाहा हो जाते हैं। सांप, बिच्छू, हिरण, हाथी, जंगली सुअर, शेर, बाघ, बिल्लियां और वृक्षों पर घोंसला बना कर रहने वाले रंग-बिरंगे पक्षी, जिनका अन्य कोई ठिकाना नहीं, जिनके पास मनुष्य की भांति बुद्धि नहीं, तकनीक नहीं, सामर्थ्य नहीं, उनकी नियति ही है धधकते वनों के साथ राख हो जाना। इस प्राकृतिक आपदा का सबसे बड़ा शिकार वनवासी जीव ही होते हैं। जंगल की आग उन जीवों के समूचे कुनबे पर कहर बन कर टूटती है। अमेजन जंगलों के अगणित जीवों के जीवित दाह के बाद हम आस्ट्रेलियाई वनों की आग में पचास करोड़ के आसपास जीवों को खो चुके हैं। कोआला जैसे मासूम, खूबसूरत, भोले जीव के लिए प्रसिद्ध आस्ट्रेलिया का जंगल, आज कोआला की लाशों पर आंसू बहा रहा है। कोआला की आधी आबादी जल कर समाप्त हो चुकी है।

यह हृदय विदारक घटना सहनीय नहीं है। मन को अत्यंत पीड़ा हो रही है। अगर यह क्रम इसी प्रकार जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब जैव-विविधता की सभी की स्टोन प्रजातियां प्रकृति के कोप का भाजन बन जाएंगी। जंगलों में सांस लेते, विचरते विशाल से लेकर लघु जीव धरती से लुप्त हो जाएंगे। हम पहले ही जैव समृद्धि का अधिकांश अंश खो चुके हैं। जंगल तक मनुष्य की पैठ ने जीवों के लिए आवास और भोजन की दुर्धर्ष स्थितियां उत्पन्न कर दी हैं, जिस पर प्रकृति के प्रतिकूल व्यवहार का प्रभाव भी सबसे अधिक उन्हीं पर पड़ता है। ऐसे में सृष्टि के अमूल्य उपहार रूपी इन जीवों पर अस्तित्व का विकराल संकट मंडरा रहा है।

गहन विचार का मुद्दा है कि हम उन्नत तकनीकियों से लैस होकर भी लाचार जीवों की कोई सहायता नहीं कर पाते। मनुष्य के दुष्कृत्यों का भाजन निर्दोष पशु-पक्षी बनते हैं। प्रकृति का दोहन मनुष्य ने किया, जीव लुप्त हुए, पारिस्थितिकी शृंखला टूटी, वातावरण परिवर्तित हुआ, ऋतु विपर्यय हुआ, यह चक्र प्रकृति के विध्वंसक चरण तक आ पहुंचा है। आए दिन प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति ने समूची धरती को आग में झोक दिया है। भूकम्प, ज्वालामुखी, बाढ़, अकाल, आग, महामारी आदि के बढ़ते प्रभाव से मनुष्य हतप्रभ है। उसकी बुद्धि इससे निपटने में सक्षम नहीं है।

इसी असमर्थता की ओर संकेत करता है, मैड्रिड का असफल पर्यावरण सम्मेलन। जितनी शीघ्रता से प्रकृति के क्रियाकलापों में परिवर्तन हो रहा है, उतनी शीघ्रता इन संकटों से निपटने में नहीं दिख रही है। मनुष्य की दुर्दम्य लालसाओं की पूर्ति प्रकृति के मूल्य पर हो चुकी है और हो भी रही है। अब प्रकृति की बारी है। हमें ऐसे और झटकों के लिए तैयार रहना चाहिए। मन को दृढ़ बनाना चाहिए, अबोध, निरीह जीवों की जली-कटी लाशें देखने के लिए। अग्निकुंड में बदलती धरती के साथ जलने के लिए। किंचित मनुष्य के प्रकृति के साथ किए गए दुर्व्यवहार का यही दंड होना चाहिए।

अंजलि ओझा ‘लेखनी’

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