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दुनिया मेरे आगे: शहर में स्त्री

महिलाओं को ये खेत, नदियां, झरने, पहाड़, फूल, दरख्त को देखने और उनकी खूबसूरती के एहसास से दूर रखा जाता है।

Author Published on: December 13, 2019 3:45 AM
गांव के लोग बहुओं का घर पर रहने और उन्हें घर संभालते हुए घरेलू महिला के रूप में ही देखना पसंद करते हैं।

कई बार गांव के लड़के-लड़कियां पढ़ने या रोजी-रोटी कमाने महानगरों में आते हैं और पढ़ाई पूरी करके वहीं बस जाते हैं। कुछ अपने घर वालों की राजी-खुशी से पारंपरिक तौर-तरीके से शादी करते हैं, अपनी बिरादरी या जाति से और अपने क्षेत्र की दुल्हन मोटा दहेज लेकर लाते हैं। कुछ लड़के महानगरों में ही मुहब्बत कर बैठते हैं और घर वालों को मना कर उनसे शादी भी कर लेते हैं। मुसीबत उन जोड़ों के साथ पेश आती है, जहां ग्रामीण पृष्ठभूमि के लड़के और शहर में पैदा हुई, पली-बढ़ी लड़की के बीच मुहब्बत हो जाता है। लड़का गांव लौट जाता है। वहीं कोई रोजगार या अपनी खेती देखता है, व्यवसाय करता है। इसके बाद मसला पेश आता है शहर की लड़की गांव जाकर रहेगी या नहीं। परेशानी इसके बाद शुरू होती है। लड़की को गांव के माहौल में ढलने के लिए मजबूर होना पड़ता है और उसका प्रेमी भी उससे यही उम्मीद करता है। ऐसे में लड़की अकेली पड़ जाती है।

दरअसल, कुछ भौतिक सुविधाओं में बढ़ोतरी को छोड़ दें तो आज भी ग्रामीण इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के साधन सीमित हैं। ये कुछ कारण हैं, जिनकी वजह से शहर की लड़कियां गांव में नहीं रहना चाहतीं। हालांकि खुद लड़के भी ऐसा ही सोचते हैं। एक बड़ा कारण और है। जहां तक मेरा अनुभव है, बाकी लोगों के अलावा बहुत सारे मुसलिम परिवारों में भी लोगों का रहन-सहन और उनकी सोच एक ऐसी जगह पर कायम है, जहां लोग बेटियों को किसी नियमित कॉलेज या विश्वविद्यालय नहीं भेजते। कुछ लोग लड़कियों का किसी स्कूल में पढ़ाना या कोई और नौकरी करना गलत मानते हैं और कहते हैं कि लड़कियों की यह मनमानी उन्हें मजहब से दूर कर देती है। ऐसी सोच अब भी है, इसके बावजूद कि वक्त बदल रहा है और लोग लड़कियों के बारे में अपनी धारणा बदल रहे हैं।

गांव के लोग बहुओं का घर पर रहने और उन्हें घर संभालते हुए घरेलू महिला के रूप में ही देखना पसंद करते हैं। इसीलिए वहां कुछ उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं अगर हैं भी, तो वे सिर्फ घरेलू महिला बन कर रह गई हैं। उन्हें नौकरी करने नहीं दिया जाता और इस तरह उनका पढ़ा-लिखा सब बेकार हो जाता है। ऐसी सोच के मालिक शहरों में भी हैं, जिनके घर में शिक्षित लड़कियां घुट कर रह जाती हैं।
अपने कुछ अनुभवों के आधार पर कह सकती हूं कि गांव की बहुएं आज भी सिर्फ डॉक्टर के पास या अस्पताल जाने या फिर तीज-त्योहार पर बाजार के लिए ही बाहर निकलती हैं। कितनी जकड़ी सोच है! रिश्तेदारी में फालतू घूमना बुरा नहीं समझा जाता, मगर स्कूल-कॉलेज या विश्वविद्यालय और सेहत के लिए टहलने को बुरा समझा जाता है।

ऐसी कितनी ही लड़कियां हैं जो पढ़-लिख कर भी रोजगारयाफ्ता और खुदमुख्तार नहीं हैं, शहरों में और गांव में भी। उन्हें सिर्फ इसलिए पढ़ाया जाता है कि अब अनपढ़ लड़कियों को लड़के पसंद नहीं करते। लड़कियों की अपनी ख्वाहिश और जरूरत, अपना वजूद, उनकी माली हालत आज भी किसी के लिए मायने नहीं रखती। वे बस सौंदर्यबोध का साधन हैं, घर और जिस्म की जरूरत पूरा करने का जरिया… बच्चे पैदा करने की मशीन।
शहरों में कुछ जगह मिली है लड़कियों को, क्योंकि वहां पढ़ने-लिखने के मौके उनके सामने मौजूद हैं। वह स्कूल-कॉलेज हो या फिर निजी कोचिंग संस्थान। शहरों में मुसलिम परिवारों में भी अपने घर की लड़कियों को पढ़ाने या नौकरी करने देने में कोई खास हिचक नहीं रही। परदे की भी बहुत मजबूरी नहीं रही। शहरों का जीवन लड़कियों को शायद इसीलिए पसंद है।

सच यह है कि समझदार प्रेमी शहर की लड़की की जरूरतों और इच्छाओं को देखते हुए उसे जबरन गांव नहीं ले जाता। हां, गांव के संपर्क में रहा सकता है। घर वाले भी खुश और प्रेमिका या बीवी भी खुश। जो ऐसा नहीं कर पाते, वे दर्द, क्षोभ और बदला लेने के भाव वाले गीत गाते रह जाते हैं। मेरी राय यह है कि लड़कियों से अनुरोध मत कीजिए कि वे मौका दें, बल्कि अपने गांव का माहौल दुरुस्त करने की जरूरत है। अपने घर में मर्द-औरत की गैरबराबरी को दूर कर लिया जाए, लड़कियों और बहुओं को स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय जाकर उच्च शिक्षा और रोजगार हासिल करके खुदमुख्तार बनने, अच्छी सेहत के लिए सुबह टहलने के मौके और आजादी मुहैया कराएं..! उन्हें सिर्फ अपनी जरूरत का सामान सौंदर्यबोध का आनंद लेने का साधन और बच्चे पैदा करने की मशीन न समझें।

महिलाओं को ये खेत, नदियां, झरने, पहाड़, फूल, दरख्त को देखने और उनकी खूबसूरती के एहसास से दूर रखा जाता है। सवाल है कि क्या प्रकृति को देखते रहने का हक सिर्फ मर्द को है? क्या तालीम और रोजगार हासिल करने का हक सिर्फ मर्द को है? इस तरह के पुरुषवादी, पितृसत्तात्मक और गैरबराबरी वाली सोच और माहौल को खत्म करना होगा। लड़कियां बेवफा नहीं होतीं। लड़कों की सोच सीमित है, जिसे बड़ा बनाने की जरूरत है। लड़कियां भी प्यार करना चाहती हैं, लेकिन अब अपनी शख्सियत और इच्छाओं के दमन की कीमत पर नहीं।

मेहजबीं

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