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दुनिया मेरे आगेः इस रात की सुबह जरूर होगी

पर इस बंदी की मार किन पर ज्यादा पड़ रही है! जिनकी कोई बड़ी महत्त्वाकांक्षा नहीं, जिनके बच्चे विदेश में नहीं हैं, न मुंबई, बंगलुरू, न नई दिल्ली। ये हवाई अड्डे नहीं जाते, रेल में भी सामान्य डिब्बे में सफर करते हैं, बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा दें वही बहुत।

Author Published on: May 1, 2020 12:16 AM
पर इस बंदी की मार किन पर ज्यादा पड़ रही है! जिनकी कोई बड़ी महत्त्वाकांक्षा नहीं, जिनके बच्चे विदेश में नहीं हैं, न मुंबई, बंगलुरू, न नई दिल्ली।

प्रताप राव कदम

सुबह बाद में होती है, पहले उसका बेटा उसे हमारे मुहल्ले में अपनी फटफटी से छोड़ जाता है। उसकी झाड़ू की खरखर से सुबह होती है। क्या नाम है उसका? नीम के झाड़ इधर बहुत हैं, एक पीपल और बरगद का भी। हरसिंगार, चंपा के भी एकाधिक। ये पेड़ हवा से अठखेलियां करते ढेर सारी पत्तियां बिखरा देते हैं। सूखी पत्तियां वह एक जगह इकट््ठा करती है, कचरे के साथ और उन्हें आग के हवाले करती है। कई बार उसके पास माचिस नहीं होती। पत्तियों के जलने से चड़चड़ की आवाज होती है। उसकी झाड़ू से खरखर की, पत्तियों की चड़चड़ की आवाज से सूरज आंख मलता है, सुबह होती है।

इस समय जब सब घरों में बंद हैं, लोग भरी दोपहर, काम के समय, सरी संझा इक्का-दुक्का ही नजर आते हैं, फिर इतनी सुबह तो और मुश्किल है। तब भी वह नमूदार होता है, बड़ा मेहनती है। मौसम कोई भी हो वह अपनी साइकिल, अखबार के साथ हाजिर। साइकिल पर अखबार की थप्पी है। घर-घर अखबार उछालता वह दृश्य से ओझल हो जाता है। थोड़ी देर में दूध की हांक लगाता है, दूधवाले का लड़का। पिता की हिदायत का पालन करते वह भगोनी के ऊपर छन्नी में दूध उंड़ेलता है। इधर पीछे ही उसका भैंसों का तबेला है। इस संकट काल में उसे ज्यादा ही जिम्मेदारी का अहसास है। मुस्तैदी से दूध पहुंचाता है। इस बात से कोई मतलब नहीं कि सप्ताह में दो-तीन बार उसकी भैंस ज्यादा पानी पी लेती है। इतने में बंसी आता दिखाई देता है। नल खोलने वाला। कहता है- ‘मेरे होते हुए कोई तकलीफ नहीं होगी।’ उसके चाय की व्यवस्था करता हूं। कहता है, बीमार रहा पिछले दिनों। अब ठीक हूं।’
कुछ आमदरफ्त शुरू होती है। पहले तो इस वक्त एक कबाड़ वाला नियमित अपने ठेले के साथ दिखता था। घड़ी मिला लो, सुबह आठ के आसपास। कहता, दस-ग्यारह बजे तक यह करता हूं, फिर कोई दूसरा काम। हांक लगाता- ‘जूना पुराना लोहा’। मुझे देखते ही कहता- ‘राम राम सर’ और मैं कहता, ‘कैसे हो चाचा?’ एक मुस्कान उसके चेहरे पर खिंच जाती। पर वे दिन हवा हो गए।

इतने में सामने का मालाकार गुड़हल के फूल दे जाता है। इन दिनों बेटी आई है। वह इन फूलों से अपने घने केश के लिए औषधि बनाएगी। फिर ‘सब्जी है’ की हांक लगाता सब्जीवाला आता है। हमेशा वह मुझसे कुछ राजनीति की बात करता है। मैं भी उसे परखता हूं। हांक लगा कर ही वह बस नहीं करता, उसके पास जितनी सब्जियां हैं, सबके नाम गिनाता है। मैं दो-तीन सब्जियां पसंद करता हूं और कहता हूं कि वहां रख दे और चारदीवारी पर रखे पैसे उठा ले। वह बचे पैसों का धनिया या नीबू वहां रख देता है। पूछता हूं उसके घर-परिवार के बारे में। चकित होता हूं, उसकी दिनचर्या पर- भोर में ही वह सब्जी मंडी पहुंच जाता है। उसकी तरह और भी वहां हैं। अपने-अपने इलाके के हिसाब से वे सब्जियां खरीदते या चिंदी पर लेते हैं। उन्हें याद होता है कि फलां गली की बहन ने अचार के लिए नीबू का कहा था, फलां ने आंवले के लिए, वो कोने वाले बाबूजी ने पुदीना के लिए और उन दादा ने हरे प्याज के लिए। सलाद का सामान और रोजमर्रा की तमाम सब्जियां, वह भी एक साइकिल पर! इतनी थैलियां कि गिनें तो दो अंकों में आएं, फिर साइकिल भी चलाना, है न सर्कस। एक तार पर साइकिल चलाते, संतुलन साधते हमने सर्कस में देखे हैं, पर ये जीवन के सर्कस में कितना संतुलन साधते चलते हैं, करिश्मा है! हमारा स्वाद वे जानते हैं। हमें इस तरह संबोधित करते हैं जैसे कोई अपने हों- भाभीजी, बहिन, भाई साहब, भाई, दादाजी, अम्माजी और हम उनका नाम तक नहीं जानते! कहां रहता है, कैसे रहता है, यह जानना तो दूर की बात। आजकल वह सब्जियों की जगह फल ला रहा है- केला, अंगूर, खरबूज… मंडी बंद है न!

पर इस बंदी की मार किन पर ज्यादा पड़ रही है! जिनकी कोई बड़ी महत्त्वाकांक्षा नहीं, जिनके बच्चे विदेश में नहीं हैं, न मुंबई, बंगलुरू, न नई दिल्ली। ये हवाई अड्डे नहीं जाते, रेल में भी सामान्य डिब्बे में सफर करते हैं, बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा दें वही बहुत। विदेश जाने का सपने में भी नहीं सोचते। बड़े-बड़े बंगले नहीं, ये दस गुणे दस की कोठरी में रहते हैं। पेट के गड्ढे को भरने के लिए दो जून के लिए बिखरे हैं जगह-जगह और हमारी सुख-सुविधा के लिए मुश्किल में भी जुटे हुए हैं। एक लांग शॉट कैमरे की जद में जब आते हैं तो चीटियों की तरह नजर आते हैं। सबसे ज्यादा मार बंदी की यही खा रहे हैं। एक छद्म उजागर होता है, एक अपराधबोध-सा होता है।

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