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दुनिया मेरे आगे: हम छत पर हैं

रिश्तों की दुनिया में आधे से ज्यादा दिक्कतों की वजह एक ही है कि मन को खोलते तो सब हैं, लेकिन मन की किताब को कम ही लोग पढ़ पाते हैं।

Author Published on: October 5, 2019 3:27 AM
जीवन का इतना रस देकर भी, खुशी के मोती लुटा कर भी छतें सदियों से वैसी ही निश्छल हैं।

पूनम पांडे

मीठी-मीठी गुलाबी सर्दी के संकेत आने लगे हैं। इसके साथ ही छत पर टहलना, ठहरना बहुत अच्छा लगने लगा है। कुछ दिनों के बाद से जनवरी तक हर जगह छतों पर खिलखिलाहट बिखरने लगेगी। ऐसा लगेगा कि छतें आबाद हो रही हैं। छतें सचमुच जीवन की कहानियां सुना कर जीवन जीने के लिए तैयार करती हैं। जीवन का इतना रस देकर भी, खुशी के मोती लुटा कर भी छतें सदियों से वैसी ही निश्छल हैं। एक यात्रा के दौरान कई शहरों में थोड़ी-थोड़ी देर ठहरते हुए वहां की अल्हड़ रवानगी को खूब महसूस किया। वहां की छतों पर जीवन का ताना-बाना पूरी मस्ती में तरंगित होता दिखा। ऐसा लगा कि पतंग उड़ाते बच्चों के साथ छत अपना घूंघट उठा कर लहालोट हो रही हो। संस्कृति की आबोहवा का पूरा रंग रास्ते भर छतों से हमारी तरफ छलकता हुआ दिखाई दिया और यात्रा पूरी करने तक धड़कनों में रहा भी। गांव और कस्बों में छतों पर उल्लास देख कर समझ में आता है कि जीवन की उमंग और तरंग किसी खास सुविधा की मोहताज नहीं है।

ऐसे नजारे देखने को मिल जाते हैं कि बड़ी मंगौरी तोड़ती, चिप्स-पापड़ सुखाती, बच्चों के साथ अठखेलियां करती, छत पर लगाए पौधों की हरियाली से सीमेंट की छत को बागबां कर रही महिलाएं ऊर्जा से भरी लगती हैं। भरपूर हवा और रोशनी में प्रकृति का संग कितना अनूठा लगता है! मनुष्य के दिमाग की बनावट ऐसी जटिल है कि आधुनिक जगत की निजता और मशीनीपन ने लुटेरे की तरह उसके बिंदास मन की तरंगों को छीन लिया है। महानगरों के ऊंचे अपार्टमेंट के अकेले बंद घरों में बोन्साई जैसे बच्चे ऐसी छत की दोस्ती का मजा कहां लूट पाते हैं! सुबह-शाम छतों पर दौड़ना कितनी ताजगी से भर देता है, यह वे क्या जानें जो कमरे में बैठ कर मोबाइल और टैब के शिकंजे मे फंसे हुए हैं।

प्रेम, आत्मीयता, आपसी जुड़ाव कितना महत्त्वपूर्ण होता है, इसे छत पर अधिक समय गुजारने वाले लोग बखूबी समझते हैं। लेकिन आज हमारे पास छत पर जाकर बैठने का समय ही कहां है! वे आत्मीय रिश्ते जो एक छत से दूसरी छत तक हवा के झोकों की तरह महसूस किए जाते थे, अब सोशल मीडिया के ‘स्माइली’ बन कर दम तोड़ रहे हैं। बरामदे और बालकनी के बाद भावों के संगम की तीसरी नदी है तो वह है छत! अकेलापन हर लेती छतें बहुत ही लावण्यमयी और बेहद मधुरिम भी हैं।

पहले सुबह से दोपहर और शाम से रात तक कितने ही बहाने होते थे कि हम कभी छत पर जा बैठते, कभी भोजन करने के बाद आराम भी फरमा लेते थे। परिंदों को दाना-पानी देने के लिए भी छत का एक हिस्सा हमेशा तय होता था। ‘छतें हमारे लिए मनोरंजन थीं और दीवारों से रहित अपने सरीखी दुनिया भी’, रामपुर के किले के पास ही बतियाते हुए एक महिला ने जब यह कहा तो बचपन की छत मुझे मेरे दिल में दिखाई दे गई।

रिश्तों की दुनिया में आधे से ज्यादा दिक्कतों की वजह एक ही है कि मन को खोलते तो सब हैं, लेकिन मन की किताब को कम ही लोग पढ़ पाते हैं। बादल को अगर पानी कह दिया जाए तो मन भीग नहीं जाता। हमारे बचपन की छत पर बैठने वाली बुआ-चाची छतों पर ही एक-दूसरे को साफ-साफ बताती थीं अपनी दबी हुई सिसकी का असली कारण। ओढ़ी हुई हंसी की असली वजह और इस तरह एक-दूसरे से जुड़ी रहती थीं छतों में। उनकी एक अपनी ही दुनिया होती थी।

काफ्का का दर्शन है या मार्खेज का जादुई यथार्थवाद या फिर ओशो का अनूठा चिंतन, हम सबके भीतर एक किताब होती है वह बात जो चैन से सोने नहीं देती। पेड़ों के झुरमुट से झांकती है, समंदर की लहर बन कर पैरों से टकराती है, ताक-झांक करती है, मन के दरवाजे पर खटखटाती है, मगर उस आवाज पर गौर न करने से वह किताब अपने पन्नों सहित हो जाती है बिल्कुल खामोश! अगर आप पैंतीस से चालीस की उम्र के आसपास हैं तो कहीं न कहीं, आपने भी अपनी किशोरावस्था के दौरान किसी छत पर मन की ऐसी ही चुप्पियों को मुखर होते हुए देखा होगा। एक बुजुर्ग दादी ने मुस्करा कर बताया- ‘काश! फिर से महफिल जमने लगें छत पर… फिर कुछ अपनापन लौट आए कि वे पल जिंदादिल लगें। यह एक अधूरी उम्मीद ही तो है, जिसके सहारे हम बूढ़े होकर भी बूढ़े नहीं होते।’

आजकल दुनिया में बहस के बीच होना इतनी बड़ी बात नहीं है, मगर उसमें न कूद पड़ना कहीं ज्यादा बड़ी बात है। इसीलिए उम्मीद और बुजुर्ग दादी की बातों में छत को खोजने का सिलसिला जारी रहेगा। महसूस करना होगा कि छत अपने को गंभीरता से नहीं लिए जाने का हिसाब मांगती है। कई बार थोड़ी देर के लिए चले जाना बहुत देर के लिए लौट आने की तैयारी के लिए बहुत जरूरी होता है। चले जाने से पैदा हुई एक खाली जगह में नई दुनिया बन कर लौट आने की गुंजाइश होती है। छतों का यह दर्शन बड़ा मनभावन है।

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