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दुनिया मेरे आगे: निराला वाद्यवृंद

इंजन और डिब्बे समवेत स्वर में दुहरा रहे हैं- चल कलकत्ते छह-छह पैसे, चल कलकत्ते छह-छह पैसे। शोर बढ़ता जाता है। गाड़ी किसी पुल से गुजरते हुए धड़क-धड़क चीखने लगती है।

Author Published on: August 5, 2019 1:56 AM
कानों में आवाज आती है- ‘बस हो गया सर’।

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

किसी प्रतिष्ठित अस्पताल के नवीनतम उपकरणों से सुसज्जित रेडियोलॉजी विभाग में एमआरआइ मशीन के प्रकोष्ठ में प्रवेश करने से पहले कौन सोच सकता है कि अंदर वाद्यवृंद प्रस्तुति होगी। वाद्यवृंद भी कैसा! आकाशवाणी के वाद्यवृंद जैसा नहीं जिसमें सितार, जलतरंग, वायलिन, बांसुरी, तबला और मृदंग जैसे सुपरिचित वाद्य हों। यहूदी मेन्युहिन द्वारा निर्देशित फिलहार्मोनिक आॅर्केस्ट्रा जैसा भी नहीं, जिसमें साजों की संख्या से ही श्रोता-दर्शक आतंकित हो जाएं। यह वाद्यवृंद निराला है। पहले सुनी हुई तरह-तरह की ध्वनियों का अद्भुत संगम। ऐसा संगम, जिसमें इंसानी संगीत के साजों के स्वर-ताल प्रकृति के बदलते स्वरूपों के नितांत मौलिक संगीत में घुलमिल जाते हैं। शायद असाध्य रोगों की आशंका से सहमे हुए श्रोता के दिल की धड़कनें भी इस अनोखे वाद्य संगीत में घुली-मिली रहती हैं। लेकिन इस नादब्रह्म को सब कहां पहचान पाते हैं!

इस निराले संगीत को पसंद करने की मन:स्थिति बने भी तो कैसे, जब गंभीर बीमारियों की पहचान और निदान मात्र घोषित लक्ष्य हों। सुर और ताल के इस अद्भुत संयोग का आनंद लेने की पहली शर्त है कल और काल की चिंता से मुक्ति। लेकिन आशंकित, कराहते रोगी को तो घड़ी, अंगूठी आदि आभूषण उतारते ही उस दिन का डर सताने लगता है ‘जब लाद चलेगा बंजारा’! यह हताश मन:स्थिति और सघन हो जाती है जब सामान्य कपड़े उतार कर, एक चोगा पहना कर, अर्थी जैसे लंबे से तख्ते पर लिटा कर निर्देश दिया जाता है कि अब सांस बांध कर रखो। मशीन के अंदर धकेल दिए जाने के पहले मिला यह आश्वासन झूठा-सा लगता है कि प्रकोष्ठ के अंदर परेशानी होने पर घंटी बजा कर आॅपरेटर को सचेत कर सकते हैं। इधर रोगी के मन में डर की घंटी बजनी शुरू होती है, उधर वह अर्थीनुमा तख्ता हरकत में आ जाता है। विद्युत शवदाह के धधकते प्रकोष्ठ में भस्म होने के लिए आगे सरकती अर्थी की याद दिलाता तख्ता जैसे ही एमआरआइ प्रकोष्ठ के अंदर दाखिल होता है, वाद्यवृंद उठान लेता है- पास आ रहे फौजी बूटों की ठक-ठक ध्वनि के रूप में। फिर वह ‘ठक-ठक’ ताबूत को जड़ने के लिए ठोंकी जाती आखिरी कीलों की भयावह ध्वनि में बदल जाती है।

कौन-सी ध्वनि कितनी देर बजी, इसका अनुमान कौन लगाए, जब समय खुद सहम कर थम गया हो। तभी ताबूत पर ठुकती कीलें काली घटाओं से बेतहाशा बरसती बूंदों में बदल जाती हैं।  तड़-तड़-तड़ की जोरदार आवाज प्रकोष्ठ के अंदर बादल-फोड़ वृष्टि का आभास कराए, इसके पहले ही अचानक मरघट की शांति छा जाती है। इस बार रीं-रीं-रीं की ध्वनि आती है। कोई नौसिखिया सारंगी या वायलिन बजाना सीख रहा है। पर वाद्यवृंद का कोई स्वर, कोई ताल देर तक नहीं टिकता। सारे कलाकारों को समान अवसर देने वाला सहृदय निर्देशक फिर इंसानी साज छोड़ कर प्रकृति को इशारा करता है। अब सैकड़ों मेंढ़क जोर से टर्राने लगते हैं और प्रकोष्ठ के अंदर फैले धुंधलके में हजारों झींगुर एक साथ बोल पड़ते हैं। मेंढ़कों और झींगुरों की जुगलबंदी वेगवती होती जाती है, जैसे किसी संगीत सभा में प्रख्यात सितारवादक और मशहूर तबलावादक के बीच श्रोताओं को मुग्ध कर लेने की होड़ मच गई हो।

लेकिन चरमोत्कर्ष के पहले ही क्षण भर की सघन चुप्पी छा जाती है। इस बार कोई पत्थर का कारीगर बिजली की धारदार मशीन से संगमरमर काटने लगता है- किर्र-किर्र-किर्र। पिघले सीसे की तरह कानों में गिरती इस ध्वनि का आघात कम करने के लिए सीमेंट बालू के मिश्रण को जमीन पर अपनी करनी से फैलाता हुआ राजमिस्त्री आ जाता है। हल्की किर्र-किर्र अब भी बनी रहती है। पर क्षण भर में फिर छा जाती है सघन शांति। अरे! क्या यह मशीन चुपचाप भी काम कर सकती है? लेकिन तभी दूर से सीटी देते हुए रेल के पुराने स्टीम इंजन के आने की छुक-छुक ध्वनि लगातार तेज होती जाती है। और तेज, और तेज।

इंजन और डिब्बे समवेत स्वर में दुहरा रहे हैं- चल कलकत्ते छह-छह पैसे, चल कलकत्ते छह-छह पैसे। शोर बढ़ता जाता है। गाड़ी किसी पुल से गुजरते हुए धड़क-धड़क चीखने लगती है। श्रोता को लगता है कि उसे रेल की पटरी पर बांध दिया गया है और यह तूफान मेल उसे कुचल डालेगी। पर एक बार फिर अचानक पूर्ण विराम। चीं-चीं करके ब्रेक लगने तक की भी आवाज नहीं। और यह लो, ताबूत में कीलें फिर से ठोंकी जाने लगती हैं। पांच-छह कीलें। बस! फिर विराम । कुछ क्षणों के बाद वह अर्थीनुमा तख्ता अपने सवार के साथ वापस बाहर सरकने लगता है। प्रकोष्ठ के अंदर का धुंधलका पीछे छूट जाता है। बाहर के प्रकाश में रोगी के दिल की बढ़ी हुई धड़कन काबू में आने लगती है। कानों में आवाज आती है- ‘बस हो गया सर’। अर्थी पर लेटा शरीर तो फिर हरकत में आ जाता है, लेकिन मन में एमआरआइ वाद्यवृंद के अद्भुत स्वरों का निनाद गूंजता रह जाता है।

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