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दुनिया मेरे आगे: प्यास का पैमाना

संभवत पूरे देश में ही कोशिश नहीं हुई और हम बहते पानी के शोधन और संरक्षण को लेकर नाकाम रहे। कई जगहों पर नलकों में पानी बहना खुद ही बंद हो जाता है । वांछित मात्रा से ज्यादा पानी बहता है। नलके ऐसे होने चाहिए, जितनी जरूरत हो उतना पानी दें।

Author July 15, 2019 2:20 AM
उत्तर भारत के कई हिस्सों में भारी बारिश फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

संतोष उत्सुक

जिंदगी के पांच जरूरी तत्त्वों में से एक, पानी के लिए मारा-मारी और लड़ाई-झगड़े शुरू हो चुके हैं। देश के इक्कीस बड़े शहर पानी की तंगी की गली में फंसते जा रहे हैं। एक बाल्टी पानी के लिए कई घंटे लंबी लाइनें लग रही हैं। साफ पानी बांटने के लिए लॉटरी व्यवस्था का प्रयोग हो रहा है। एक ही पानी से पहले एक बंदा नहा रहा है, फिर दूसरा और तीसरा, फिर उसी पानी से कपड़े और बर्तन धोए जा रहे हैं। राजनीति की हवा भी जोरों से बह रही है। अनेक जगह जहां कुदरत की मेहरबानी से पानी अभी उपलब्ध है, पानी खुला बह रहा है, वहां संचित कोई नहीं कर रहा। हम स्थिति और गंभीर होने की प्रतीक्षा में हैं। बारिश साल दर साल कम होने लगी है। भूजल का स्तर हम रसातल से भी नीचे पहुंचाने की तैयारी में हैं।

देश के बांधों में जल भंडारण का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका देख कर केंद्रीय जल आयोग ने परामर्श दिया था कि जल का प्रयोग समझदारी से किया जाए। राज्य सरकारें जानती हैं कि इस पर कितना ईमानदारी से अमल हुआ। बांधों में पहाड़ी नदियों और बारिश से ही पानी आता है जो करार के तहत राज्यों में बंटता है। पानी न मिले तो किसान आंदोलन करते हैं। बांधों से अतिरिक्त पानी छोड़ने के कारण जल स्तर नीचे चला जाता है। मानसून ठीक न रहे तो नदियों के रास्ते के अवरोध पानी रोकने के कारण बांध में पानी कम रह जाता है।

इस मुश्किल समय में अनेक व्यवसायी पीने के पानी को कारोबार बना कर करोड़पतियों की जमात में शामिल हो चुके हैं। इसके लिए उन्हें सरकारी और राजनीतिकों को क्या देना पड़ता है, यह किसी को नहीं पता। लेकिन इतना तय है कि वे सरकार को कुछ नहीं देते। हमारा देश परंपरावादी, सामंतवादी देश है। यहां अनेक समूहों और जातियों के अपने-अपने कानून हैं पानी के प्रयोग के। पानी फिजूल जाने देंगे, लेकिन दूसरे समुदाय या जाति के लोगों को प्रयोग नहीं करने देंगे। क्या हम सुधरने वाले लोग हैं?

इस बारे गंभीर आरोप पानी के अतार्किक प्रयोग के हैं। विवाह और अन्य आयोजनों में आजकल पानी की छोटी बंद बोतल दी जा रही है। जरा-सा पानी पीकर बोतल रख दी जाती है। यह रुकना चाहिए और गिलास में उतना पानी ही दिया जाना चाहिए, जितनी प्यास हो। घर और दफ्तर में सभी के लिए यही प्रयोग शुरू हो तो और अच्छा है। जहां लागू हो सके, ड्रिप सिंचाई व्यवस्था अविलंब अपनाई जानी चाहिए। बारिश के पानी को बचा कर अन्यत्र प्रयोग करने का प्रावधान अधिकतर इमारतों में नहीं दिखता। सरकारी स्तर पर इसे एक बाध्यता के रूप में लागू किया जाए, ताकि व्यवसायिक हो या घरेलू, हर इमारत में बारिश का पानी बचा कर उसका प्रयोग करना सुनिश्चित हो। व्यापारी और उद्योग भी खूब पानी का प्रयोग करते हैं और कचरे से नदी को गंदा नाला बना देते हैं।

संभवत पूरे देश में ही कोशिश नहीं हुई और हम बहते पानी के शोधन और संरक्षण को लेकर नाकाम रहे। कई जगहों पर नलकों में पानी बहना खुद ही बंद हो जाता है । वांछित मात्रा से ज्यादा पानी बहता है। नलके ऐसे होने चाहिए, जितनी जरूरत हो उतना पानी दें। कार धोने के लिए ‘पानीरहित कार वाश’ बाजार में आ चुका है। उसे ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाने बारे में प्रोत्साहित किया जाए। घर के वाशरूम में शावर प्रयोग न कर, बाल्टी में पानी लेकर नहाएं ब्रश करते हुए नल न चलाएं, बलिक बाद में कुल्ला करें। सीवेज और नालों के पानी को शोधन संयंत्र के माध्यम से साफ कर बाग-बगीचे, धोने और रोजमर्रा के दूसरे कामों में प्रयोग किया सकता है। ‘आरओ सिस्टम’ बहुत पानी लेकर कम साफ पानी देता है। बेकार हुआ पानी सभी जगह फिर से प्रयोग नहीं किया जाता, जो होना चाहिए। शहरी आबादी खूब पानी चाहती है। चीनी मिलें, शीतल पेय, शराब बनाने और बोतलबंद पानी बनाने वाले खूब प्रयोग करते हैं। पहाड़ में तो सीधे नदी से जल खींच लेते हैं। व्यवसायियों और राजनेताओं का दबाव कानून को नए-नए दांव-पेचों में फंसा कर रखता है।

तालाब दफन करने के बाद अब फिर से खोदने की कोशिश हो रही है। इस बारे में राजनीतिक और प्रशासनिक भरोसे लिए और दिए जाने तत्काल रोके जाने चाहिए। परेशान होकर लोग जलदेव वरुण की शरण में जा रहे हैं, हवन-यज्ञ चल रहे हैं। इसमें लगे लोगों को लगता है कि इस तरह बारिश आ जाएगी और पानी की कमी दूर हो जाएगी। जापान में ‘हाथ साफ करने के सिंक’ प्रयोग किया जा रहा है जो टायलेट सीट के ऊपर लगा है, ताकि हाथ धोने के बाद पानी फ्लश के लिए इस्तेमाल हो जाए। इसके प्रयोग से बहुत पानी बचाया जा सकता है। कानून कम नहीं हैं, लेकिन समझदारी का कानून हर देशवासी द्वारा सबसे पहले अपने ऊपर लागू करने की जरूरत है। बचत की शुरुआत अपने घर से होती है।

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