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दुनिया मेरे आगे: ‘मैं’ की बुनावट

मैं को अक्सर अहंकार का पर्याय भी माना जाता है। यह चतुर होता है और सूक्ष्म भी। इसकी तुलना अक्सर तिलचट्टे के साथ की जाती है जो कहीं भी छिप जाता है, ठंडे फ्रिज में भी और किसी गर्म, उमस भरे कोने में भी। इसकी तुलना ग्रीस के जल देवता प्रोटिअस से भी की जाती है जो पकड़े जाते ही अपना रूप बदल देता है।

Author August 10, 2018 2:08 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।(फोटो सोर्स- यूट्यूब)

कबीर के सबसे लोकप्रिय दोहों में से एक है: ‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं’। यहां हरि स्पष्ट रूप से रहस्यवादी दार्शनिक कवि का वह सत्य है, जिसे वह अलग-अलग समय में अपने शब्दों में व्यक्त करता रहा है। यही जीवन का अंतिम सत्य है जिसके आगमन से जीवन अर्थपूर्ण हो उठता है। खलील जिब्रान, रूमी या विलियम ब्लेक इसी के लिए अपने खास शब्दों का प्रयोग करते हैं और कोई दार्शनिक इसे ‘अन्य’ या ‘पावन’ शब्द से भी इंगित करता है। लेकिन मैं क्या है? मैं, व्यक्तिगत, एकवचन सर्वनाम, एक ऐसा शब्द है जिसका प्रयोग हम सबसे अधिक करते हैं। यह एक ऐसा केंद्र है, जिसके इर्द-गिर्द समूची भाषा का भवन निर्मित होता है। यह शब्द प्रत्यक्ष या अपने अतीत के अनुभवों, अध्ययन, इकट्ठा किए गए ज्ञान के रूप में भी आ सकता है। आत्म-प्रेम, प्रेम का सबसे प्राचीन रूप है और ऐसा कहा जाता है कि बाकी हर तरह का प्रेम इसी आत्म प्रेम की संशोधित अभिव्यक्ति भर होता है।

मैं को अक्सर अहंकार का पर्याय भी माना जाता है। यह चतुर होता है और सूक्ष्म भी। इसकी तुलना अक्सर तिलचट्टे के साथ की जाती है जो कहीं भी छिप जाता है, ठंडे फ्रिज में भी और किसी गर्म, उमस भरे कोने में भी। इसकी तुलना ग्रीस के जल देवता प्रोटिअस से भी की जाती है जो पकड़े जाते ही अपना रूप बदल देता है। एक तथाकथित संत जो अपने अहंकारी न होने और मैं से मुक्त होने का दावा करता है, उसके भीतर भी अपने संतत्व को लेकर भारी अहंकार हो सकता है। कोई समाज सेवी खुद को और दूसरों को यह भरोसा दिला सकता है कि वह सिर्फ परोपकार के लिए काम कर रहा है। पर यह संभव है कि उसे अपने काम से जो शोहरत और प्रसिद्धि मिल रही है, वही उसके अहंकार को पोषित कर रही हो। इन सभी बातों का यह अर्थ नहीं कि लोगों को भले काम नहीं करने चाहिए, उन्हें दूसरों की मदद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसमें भी अहंकार है। आशय यह है कि मैं के भाव, अहंकार की उपस्थिति को पहचानना आवश्यक है। नहीं तो खुद को और दूसरों को भी भ्रम में रखने का खतरा बना रहता है।

दरअसल, जिसे हम मैं कहते हैं वह स्मृतियों, अनुभवों, संस्कारों और संकलित ज्ञान का एक पुलिंदा भर होता है। किसी भी बाहरी और अंदरूनी चुनौती का प्रत्युत्तर इसी पुलिंदे से आता है। इसलिए हमारे प्रत्युत्तर अक्सर यंत्रवत, यांत्रिक होते हैं, उनमें कोई नवीनता नहीं होती। जिसे हम मन या चित्त कहते हैं, वह मैं का ही एक पर्याय है। मन के हठ, इसकी विचित्रताएं, पसंद और नापसंदगी- सब कुछ उन्हीं स्मृतियों से आता है जिन्होंने मैं को निर्मित किया है। हमारी कई उलझनें इस मैं की संरचना को न समझ पाने की वजह से ही हैं। थोड़ी सजगता जीवन को आसान बना सकती है। इसे देखा जा सकता है कि एक संसार हमसे बाहर है और ठीक वैसे ही एक और संसार सांस लेता है हमारे भीतर, खुद को व्यक्त करता है। इस भीतरी संसार और जो कुछ भी बाहर है, उनके बीच लगातार एक संवाद, द्वंद्व चलता रहता है। बाह्य आतंरिक में बदलता है और आतंरिक बाह्य को प्रभावित करता है। दोनों के बीच की यह क्रीड़ा ही जीवन है, जैसा कि हम इसे समझते हैं। कभी हमारे अपने मूड, भाव और विचार हम पर हावी हो जाते हैं और कभी बाहरी दुनिया हमें इतना प्रभावित कर देती है कि हम अपनी समझ खो बैठते हैं और इन्हीं प्रभावों के साथ प्रवाहित हो जाते हैं।

आतंरिक की समझ पर धर्म और अध्यात्म का इतना प्रभाव है कि वह हमारी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाया है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक इससे न परिचित है और न ही उसे इसमें दिलचस्पी रखने की जरूरत महसूस होती है। जीवन मानो हमें यह आजादी देता है कि हम चाहें तो बेहोशी या फिर अज्ञानता में उसके साथ भी रह सकते हैं जो अनावश्यक होता है और जो आवश्यक है उसकी अनदेखी कर सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, पर ऐसा है नहीं। शायद इसीलिए सुकरात ने करीब 2500 वर्ष पहले कहा कि एक अपरीक्षित जीवन जीने योग्य ही नहीं। यह बात सौ फीसदी सच लगती है, खासकर आज के माहौल में जब समूचा वैश्विक समाज एक तरह के विभ्रम और उलझन में जी रहा हो, जब कौमें और जाती तौर पर भी इंसान अंधाधुंध हिंसा और इसके स्थूल और सूक्ष्म अभिव्यक्तियों में लिप्त हो गया हो। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इन सभी चीजों की जड़ें हैं कहां!
सूचना के लगातार हो रहे विस्फोटों के बीच हम सूचनाओं को ही ज्ञान समझ बैठे हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट का हम उपयोग नहीं कर रहे; ये ही हमारा उपयोग कर ले रहे हैं! सूचनाओं को ज्ञान और ज्ञान को प्रज्ञा समझ लेना एक सामान्य भूल है, जिसका हम सभी शिकार हो चुके हैं। वैज्ञानिक शोध, अध्यात्म, आपसी संबंधों, साहित्य और संस्कृति का उथलापन यही संकेत देता है कि हम अब भोग, चीजें बटोरने और धनलोलुपता के अलावा हर चीज को गौण मानने लगे हैं। हमारा समय लगातार हमारे सामने गंभीर सवाल रखता जाता है, पर हम अपने उथलेपन में फंस कर या तो उनका जवाब नहीं दे पाते या फिर आधे-अधूरे जवाबों के साथ संतुष्ट रह जाते हैं।

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