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दुनिया मेरे आगे: प्रतिभा का पाठ

यह समझना आवश्यक है कि हम, शिक्षक और अभिभावक, भी बच्चे के साथ-साथ सीख सकते हैं और दोनों ही जीवन की गुत्थियां सुलझाते हुए आगे बढ़ सकते हैं। हम बड़े लोगों के पास कुछ ऐसा नहीं है जो बहुत खास हो और उसे हमें बच्चे को सिखाने की जरूरत हो। उसकी मासूमियत के सामने हमारा समूचा ज्ञान निरर्थक ही नहीं, खतरनाक भी है!

Author October 31, 2018 2:43 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्टाय फार्म में पढ़ने वाले बच्चों में से एक बहुत ही उपद्रवी और अनुशासनहीन था। मजबूर होकर महात्मा गांधी ने एक दिन उसे छड़ी से मारा। बाद में उन्होंने लिखा कि उस बच्चे को मारते वक्त वे भीतर तक कांप गए थे; उन्हें तुरंत अहसास हुआ कि उन्होंने बच्चे को ‘ठीक’ करने के इरादे से नहीं, बल्कि अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए मारा था। गांधीजी लिखते हैं कि वह बच्चा ही मेरा शिक्षक बन गया, क्योंकि उसने ध्यान दिलाया कि मैं क्रोध करता हूं। गांधीजी के इस वक्तव्य को किसी भी विचारक की शिक्षा संबंधी गंभीरतम अंतरदृष्टियों में शामिल किया जा सकता है। यह पूरी बात गांधीजी की जीवनी लिखने वाले फ्रांसीसी लेखक लुई फिशर ने बताई है। यानी सजा अक्सर अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए दी जाती है, न कि बच्चे को पढ़ाने या सुधारने के लिए। इसकी जड़ में स्वार्थ-केंद्रित भावना होती है।

परंपरागत शिक्षा का आधार हमेशा से सजा और ईनाम रहा है। घरों और स्कूलों में भी इसी आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती रही है। लंबे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए धमकी, जोर-जबर्दस्ती, शारीरिक दंड और लालच का इस्तेमाल किया जा रहा है, बिना यह जाने और सोचे कि उसका बच्चे के कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे इन रास्तों को अपना कर हम अंतत: एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं। जो बच्चा ईनाम के लालच में पढ़ेगा, वह बड़ा होकर इसी लालच में अपना काम भी करेगा। जो बच्चा भय के कारण पढ़ेगा, उसका डर जीवन के कई क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से व्यक्त होगा। जब वह सरकारी अधिकारी बनेगा तो इसी ईनाम की अपेक्षा करेगा। ‘कुछ हमें दो, अतिरिक्त कुछ… तभी हम ये काम करेंगे’। बुनियादी रूप से यही भ्रष्टाचार की मौलिक, स्थूल परिभाषा है। डांटने-डपटने, सजा देने और सिखाने के बीच के फर्क को जानना जरूरी है। किसी खतरे के आने पर चीखना, डांटना, डपटना जरूरी भी है। पशु-पक्षी भी खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं। बिजली के सॉकेट या आग के पास जाते इंसानी बच्चे को तेज आवाज में समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे वहां से जबरन हटा कर उसके रोने को बर्दाश्त करना क्रूरता है। बच्चे या विद्यार्थी को मार-पीट या डांट-धमका कर एक बार काबू में किया जा सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है।

यह समझना आवश्यक है कि हम, शिक्षक और अभिभावक, भी बच्चे के साथ-साथ सीख सकते हैं और दोनों ही जीवन की गुत्थियां सुलझाते हुए आगे बढ़ सकते हैं। हम बड़े लोगों के पास कुछ ऐसा नहीं है जो बहुत खास हो और उसे हमें बच्चे को सिखाने की जरूरत हो। उसकी मासूमियत के सामने हमारा समूचा ज्ञान निरर्थक ही नहीं, खतरनाक भी है! क्या हम इस बात का विशेष ध्यान रख सकते हैं कि हमारे संस्कार, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उस तक संप्रेषित न हो जाएं? हमारे पास बस कुछ अधिक तकनीकी जानकारी, किसी खास विषय संबंधी सूचनाएं हैं जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से, समझदारी के साथ देते रहना चाहिए। शिक्षा विद्यार्थी और शिक्षक की साझा सहयात्रा है, जिसमें किसी विषय, जीविका और जीवन- सभी के बारे में साथ-साथ सीखा जाना चाहिए।

ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के अलावा शिक्षण के बारे में अनभिज्ञ होते हैं और उनमें अपने काम के लिए उत्कटता का अभाव होता है। देश में शिक्षा प्रणाली पर नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बेहद पुराने तरीके आजमाए जा रहे हैं- रटो और परीक्षा में उगल दो। कितना सीखा-जाना, क्या नया करने की प्रेरणा मिली, इसका महत्त्व नहीं होता। कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल ही शिक्षा है। यह कोशिश नहीं की जाती कि विद्यार्थी सही अर्थ में अपनी रुचि और प्रतिभा का पता कर सके।

तथाकथित ‘समस्या से पीड़ित’ और ‘अनुशासनहीन’ बच्चों के साथ संवाद टूट जाता है और चूंकि वे ‘सुनते ही नहीं’ इसलिए उनके साथ संवाद नहीं बन पाता। ऐसे बच्चों से अध्यापकों को संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्हें खेल में लगाना भी उपयोगी हो सकता है। ऐसे मामलों में घर-परिवार के सदस्यों से बात करना जरूरी है। यह भी जरूरी है कि कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दबाव कम करके उन्हें दूसरी गतिविधियों में लगाया जाए। जो बातें अध्यापकों पर लागू होती हैं, वही अभिभावकों और माता-पिता पर भी। लेकिन वास्तविक काम उस अध्यापक या अभिभावक को खुद करना होगा, जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह जानता है कि बच्चों के ऐसे व्यवहार का कोई गहरा कारण है और इसलिए उनको पढ़ाने का भी एक खास तरीका जरूरी है। जब एक ‘स्पेशल एजुकेटर’ आक्रामक मानसिक रूप से अक्षम बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है? शारीरिक दंड की एक स्नेहपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अगर शारीरिक दंड जरूरी लगे, तो यह उनके लिए होना चाहिए जो इसके हिमायती हैं!

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