ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: मौसम की मार

किसी ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि पचास डिग्री सेल्शियस गरमी के बाद एयरकंडीशनर काम करना बंद कर देते हैं, बावन डिग्री तापमान होने के बाद चिड़ियां मर जाती हैं, पचपन डिग्री तापमान होने पर इंसान का खून उबल जाता है और वह मरने की हालत में पहुंच जाता है।

Author Published on: June 18, 2019 5:43 AM
देश के कई हिस्सों में गर्मी बरपा रही कहर। (फोटो: फाइनेंनशियल एक्सप्रेस)

अमरेंद्र कुमार राय

प्राथमिक विद्यालय में एक कविता पढ़ी थी- ‘एक बार छिड़ गई बहस, हवा और सूरज में, कौन अधिक बलवान, शक्तिशाली है हममें-तुममें।’ बहस हो ही रही है कि हवा की नजर एक व्यक्ति पर पड़ जाती है। फिर हवा और सूरज बारी-बारी से उस व्यक्ति पर बल दिखाते हैं। हवा की रफ्तार का तो बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता, लेकिन सूरज की गरमी की वजह से वह व्यक्ति बुरी तरह त्रस्त हो जाता है और अपने शरीर से ज्यादातर कपड़े उतार कर आखिर एक पेड़ की छांव में जाकर बैठ जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि सूरज जीत चुका था। हवा ने भी मान लिया कि सूरज उससे ज्यादा ताकतवर है।

वह कविता अब वर्षों बाद याद आई। साढ़े नौ बजे घर से दफ्तर के लिए निकला तो सोचा, जूता-मोजा पहनने से गरमी ज्यादा लगती है, इसलिए चप्पल पहन ली। मोटरसाइकिल पर बैठा तो थोड़ी ही देर बाद लगा कि गलती हो गई। शरीर का जो भी अंग खुला था, जलने लगा। पांव, हाथ, नाक- मुंह सब। जिस तरफ धूप थी, उधर तपन ज्यादा थी। बल्कि अपनी ही परछार्इं से थोड़ा आराम मिल रहा था। लगा, आज फिर सूरज और हवा ने जोर-आजमाईश करने की ठान ली है। हवा तो तेज चली नहीं, हो सकता है कि सूरज ने कहा हो कि पिछली बार तुमने पहले अपना जोर दिखाया था, इस बार मैं पहले अपनी ताकत दिखाऊंगा। और वह दिखा रहा है। शाम होते-होते पता चल गया कि दिल्ली में अब तक का सबसे ज्यादा गरम दिन रहा। पारा 48 डिग्री सेल्शियस तक पहुंच गया।

दिल्ली में करीब पैंतीस साल से रह रहा हूं, पर ऐसी गरमी इससे पहले कभी महसूस नहीं की। लेकिन कुछ दिन पहले एक सुबह दरवाजा खोलते ही तपिश महसूस हुई थी। हालांकि तब सूरज की किरणों में तीखापन कम था। ऐसी गरमी एक बार वर्धा में महसूस की थी। वहां एक कार्यक्रम में शरीक होने गया था। विश्वविद्यालय के गेट पर बैठ कर चाय पी रहा था कि एक साहित्यकार मित्र आए और उन्होंने बताया कि यहां गरमी बहुत पड़ती है। सूरज उगने के साथ ही यहां बैठना मुश्किल हो जाता है। मैंने गौर किया कि वाकई वहां सामान्य से अधिक गरमी थी। विश्वविद्यालय परिसर के ज्यादातर मकान दोमंजिला या उससे ज्यादा ही थे। शायद वहां की भीषण गरमी को देखते हुए ही यह व्यवस्था की गई होगी। नीचे के कमरों में ताप कम पहुंचता है। गरमी इतनी थी कि कार्यक्रम में जाने से पहले मैंने दोपहर का खाना न खाने में ही भलाई समझी। वहां कुछ दिन और रुकने का मामला था। लेकिन गरमी देख कर मैंने वहां न रुकने का ही फैसला किया।

इसी तरह, एक बार पत्रकारिता की एक यात्रा के दौरान जोधपुर होते हुए जैसलमेर गया था। शाम को पुरानी दिल्ली से एक ट्रेन चलती थी। वह सुबह जोधपुर पहुंचाती थी। जोधपुर से भी रात को एक ट्रेन चलती थी जो सुबह जैसलमेर पहुंचाती थी। जैसलमेर पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं हुई। एक जगह रास्ते में दोपहर का खाना खाने के लिए टेंट लगा कर इंतजाम किया गया। वहां इतनी गरमी थी कि पसीना पोंछना और खाना लगभग नामुमकिन था। वहां से आगे बढ़े तो पानी और ठंडे पेय की ढेर सारी बोतलें बस में भर ली गर्इं। लोग कहने लगे कि इतने की क्या जरूरत है! लेकिन करीब चार-पांच घंटे के भीतर ही सारा पानी और ठंडे पेय की बोतलें खाली हो गर्इं। सबका गला सूखने लगा।

बहरहाल, गंतव्य पर पहुंचने पर जान में जान आई। वर्धा और जैसलमेर में तो गरमी एक सामान्य तथ्य है। कहीं पहाड़ी इलाका है तो कहीं रेगिस्तानी। मगर दिल्ली क्यों इतनी तप रही है? ऐसी हवाई बातें बताई गर्इं कि पाकिस्तान से गरम हवाएं आ रही हैं। यह कोई नहीं बता रहा कि अगर हवा पश्चिम से आएगी तो मैदानी इलाकों की हवा में तपन ज्यादा होती ही है। यह भी बताना जरूरी नहीं समझा गया कि दिल्ली जैसे शहरों में जितने एयरकंडीशनरों का इस्तेमाल हो रहा है, उनसे निकली हवा इस गरमी को और ज्यादा मारक बनाने में क्या भूमिका निभा रही होगी।

इसके अलावा, हम जो पेड़ काट रहे हैं, उसकी वजह से न केवल दिल्ली, बल्कि पूरी दुनिया में गरमी बढ़ रही है। कुछ दिन पहले किसी ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि पचास डिग्री सेल्शियस गरमी के बाद एयरकंडीशनर काम करना बंद कर देते हैं, बावन डिग्री तापमान होने के बाद चिड़ियां मर जाती हैं, पचपन डिग्री तापमान होने पर इंसान का खून उबल जाता है और वह मरने की हालत में पहुंच जाता है। जंगलों को काटना इसकी सबसे बड़ी वजह है। क्या हम अभी भी चेतेंगे? इसमें दी गई जानकारी जितना तथ्य है, उससे ज्यादा यह चेतावनी कि अगर हमने प्रकृति की अनदेखी और पेड़ों का कत्लेआम जारी रखा तो आने वाले दिनों की कल्पना करना हमारे लिए मुश्किल नहीं होना चाहिए।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। जनसत्‍ता टेलीग्राम पर भी है, जुड़ने के ल‍िए क्‍ल‍िक करें।

Next Stories
1 सिनेमा के सहारे
2 दुनिया मेरे आगे: जड़ता की दीवारें
3 दुनिया मेरे आगे: नशे की राह
ये पढ़ा क्या?
X