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दुनिया मेरे आगे: शायद का चंगुल

बहुत कम लोगों को पता होगा कि ज्योतिषी भी ‘शायद’ की पोटली समेटे हुए होते हैं। जजमान अपनी दीन-हीन या महीन दशा के फलीभूत ज्योतिषी के मत्थे चढ़ जाता है।

Author Updated: August 31, 2019 5:10 AM
बहुत कम लोगों को पता होगा कि ज्योतिषी भी ‘शायद’ की पोटली समेटे हुए होते हैं।

विप्रम

शायद उसने… शायद मम्मी ने… शायद पापा ने..! कभी-कभी डॉक्टर से सुनने को मिलता है- ‘रिपोर्ट आने दीजिए। शायद एलर्जी है। हो सकता है कोई संक्रमण हो।’ रोजमर्रा की हमारी जिंदगी में न जाने कितने ‘शायद’ ने क्या कुछ घोल रखा है या इसने क्या कुछ से बावस्ता नहीं कराया! फिर भी यह ‘शायद’ हमारी जुबान से उतरता नहीं। पहले ‘शायद’ के कोई मायने नहीं समझे जाते थे। यों भी यह आम प्रचलित भाषा का शब्द नहीं माना जाता। इसके स्थान पर पहले ‘संभव है’ का प्रचलन था। ‘अनुमान’ का प्रयोग श्रेष्ठ माना जाता था। यह तो मौसम विभाग की अजब-गजब भविष्यवाणी ने ‘संभव’ शब्द की गरिमा को क्षीण कर दिया! गलत अनुमान बता कर ‘शायद’ के दरवाजे खोल दिए गए।

यानी यह कहा जा सकता है जब से वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी खरी न उतरी, तुक्के-अटकलों पर टिकने लगी, तब से यह ‘शायद’ अपने जोर के साथ चलन में आया और ‘संभव-अनुमान’ के प्रयोग की संस्कृति धूमिल हो गई। इसीलिए ‘शायद’ ने अपने बाजार भाव बढ़ा लिए। अब तो प्रतिस्पर्धा की दौड़ में हर कोई इसी की डोर थामे आगे बढ़ा जा रहा है। स्पर्धा का बीजगणित भी यही कहता है ‘शायद’!

कुछ दिन पहले की बात है। नुक्कड़ वाले डॉक्टर से हमने दवा ली। उसने एक दिन की दवा दी थी। दूसरे दिन हम फिर गए, तब दवा कुछ बदल कर दी गई। कुछ फायदा न हुआ तो हमसे रहा न गया और पूछ लिया- ‘डॉक्टर साहब! दवा का कुछ फर्क नहीं पड़ा। आखिर मुझे हुआ क्या है?’ डॉक्टर ने गंभीर मुद्रा में कहा- ‘देखते हैं। शायद वायरल है!’ हम आश्चर्य में पड़ गए, जबकि गंभीर हमें होना चाहिए था। अगले दिन हमने एक अन्य डॉक्टर के क्लीनिक जाना उचित समझा। सोचा कि यहां शायद जल्दी आराम मिल जाएगा। कभी-कभी सस्ता डॉक्टर काम नहीं आता। बल्कि वह बीमारी लंबी खींच देता है। खैर, हमने नए डॉक्टर से भी पूछा कि हमें हुआ क्या है, तब डॉक्टर साहब ने कहा- ‘कोई खास तकलीफ नहीं है आपको। मैंने कुछ जांच लिख दी हैं। देखते हैं, क्या निकलता है!’

हम समझ गए। घुमा-फिरा कर यहां भी ‘शायद’ का ही दौर चल निकला। अब ‘शायद’ का क्या इलाज हो? जीवन के हर मोड़ पर शायद ही शायद हो तब सही-गलत क्या सोचना! कभी हकीम-वैद्य नब्ज देख कर ही बता दिया करते थे कि मरीज को हुआ क्या है। आज के मेट्रो के जमाने में डॉक्टर अनुमान लगाते हैं। हजारों रुपए जांच में खर्च कराने के बाद पता चलता है कि माजरा क्या है या बीमार को रोग क्या है! जबकि हकीम-वैद्य मरीज के हाथ की नस पकड़ कर ही बता देते हैं कि उसने पिछली रात खाने में क्या खाया था। आयुर्वेद में ‘कहा जा सकता है’ शब्दावली नहीं चलती।

दरअसल, ‘शायद’ की महिमा अपरंपार है। हमारे रोजमर्रा के जीवन में इसके बिना कोई काम पूरा नहीं होता। एक विद्यार्थी अपनी मेहनत को शायद के पैमाने से ही आंकता है। इसी में अपने परीक्षाफल का पूरा आकलन कर घर वालों को समझा देता है। अब तो ऐसा लगता है कि ‘शायद’ में ही सारी दुनिया समा रही है। हम कह सकते हैं कि वे जमाने लद गए, जब संभव-असंभव में जीते थे हम। अनुमान लगाना अब पिछड़ गए लोगों का काम रह गया है। अब तो केवल ‘शायद’ ही काम का है।

देखा जाए तो ‘शायद’ एक विकास की ओर इंगित करता है। इसके सहारे आगे बढ़ने वाले अच्छे-बुरे कयास-प्रयास लगा कर क्या कुछ नया कर जाते हैं, यह अवश्य ही विचारणीय है। प्रयत्नशील लोग समझ लेते हैं कि अगली बार शायद कुछ नया हो जाए। यह तो समानता का जमाना आ गया। लड़का-लड़की दोनों एक समान। पहले तो ‘शायद’ की ही अटकल में लड़कियां होती जाती थीं, जिससे देश का स्त्री-पुरुष अनुपात अच्छा तो नहीं, लेकिन संतोषजनक दिखता था।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि ज्योतिषी भी ‘शायद’ की पोटली समेटे हुए होते हैं। जजमान अपनी दीन-हीन या महीन दशा के फलीभूत ज्योतिषी के मत्थे चढ़ जाता है। पूरी कृपादृष्टि इस शायद के चारों ओर घूम जाती है। मजे की बात कि कोई इन ज्योतिषी महोदय से पूछ कर देखे कि महाराज, आज आपके पास कितने जजमान आएंगे, इस सवाल का उत्तर शायद वे सीधा-सीधा न दें, बल्कि घुमा-फिरा कर दें। हो सकता है कुछ भी न बताएं। यहां भी सब ‘शायद’ के घुमाव हैं। अनिश्चितता को दर्शाने वाला यह शब्द आम बोलचाल की भाषा में इतना घुलमिल गया है कि इसके चंगुल से निकलना मुश्किल है। हर कोई इसी ‘शायद’ के पीछे लगा हुआ है। पुरानी हिंदी फिल्म का एक गाना याद आ रहा है। बोल उसके कुछ यों हैं – ‘शायद तेरी शादी का खयाल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पर बुलाया है।’

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