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दुनिया मेरे आगे: सूखती संवेदनाएं

बुजुर्ग दादा-दादी, माता-पिता को साथ रखना भी लोगों को बोझ लग रहा है। यह बेवजह नहीं है कि आज वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा और बच्चे या तो काम में या फिर खुद में गुम रहते हैं और ऐसे में घरों में हमारे बुजुर्ग अकेले रहने लगे हैं।

Author July 6, 2019 1:57 AM
अगर नाती-पोतों से दादी या नानी अपनी भाषा में बातें करती हैं, तब बच्चे मुंह बिचकाते हैं।

राज वाल्मीकि

कुछ दोस्तों के जमावड़े में मैंने शहरी आपाधापी के बीच लोगों के बीच सूखती संवेदनाओं की बात की तो उनमें से कुछ ने ऐसी बातों को बच्चों जैसी बातें या फिर हल्की-फुल्की बातें कहा। लेकिन क्या सचमुच अब इंसानी संवेदनाओं की अपेक्षा इतनी गैरजरूरी हो गई है? फिर ऐसा क्यों होता है कि जब हम पर कोई विपदा आती है तो हम दूसरों से संवेदनशील बर्ताव की अपेक्षा करने लगते हैं? दरअसल, समाज में संवेदनशीलता और आपसी सद्भाव-जुड़ाव की बातें बेमानी नहीं हो गई हैं, बल्कि हमारे भीतर की संवेदनाओं का दायरा सिकुड़ रहा है और इसका खमियाजा खुद हमें भी उठाना पड़ रहा है। लोगों के बीच बढ़ती दूरी, तनाव, टकराव, लड़ाई और यहां तक कि मामूली बातों के लिए हत्या जैसी घटनाएं यही बताती हैं कि किसी समाज में संवेदनाओं और सद्भाव की जगह सिकुड़ती है तो कैसी त्रासदी सामने आ खड़ी होती है।

मुझे लगता है कि हमारे शहरों की आम जिंदगी में धीरे-धीरे कुछ खत्म हो रहा है और हम सबकी जिंदगी चुपचाप बदलती जा रही है। इस तेजरफ्तार जिंदगी में या कहें बदलती जीवन शैली में कई कारक जिम्मेदार हैं, जिनकी वजह से न केवल परिवार सिकुड़ रहे हैं, बल्कि संवेदनाएं भी सूख रही हैं। आज लोगों के पास ज्यादा से ज्यादा कमाने की आपाधापी मची है। ऐशो-आराम के सभी साधन जुटाने हैं। ऐसे में समय की कमी होना स्वाभाविक ही है। इससे जो भी समय बचता है, उसे लोग टीवी और स्मार्टफोन को समर्पित कर देते हैं। टीवी तो पहले ही एक समय-खाऊ औजार के रूप में देखा जाने लगा था, अब स्मार्ट फोन और इंटरनेट उससे भी ज्यादा वक्त खाने वाले साबित हो रहे हैं। ये हमें एकांत प्रिय और स्वार्थी बना रहे हैं।

इस दौरान हमें पता भी नहीं चल पाता है कि इसी कारण कब हमारे रिश्तों में भी दरारें पड़ने लगी हैं। बुजुर्ग दादा-दादी, माता-पिता को साथ रखना भी लोगों को बोझ लग रहा है। यह बेवजह नहीं है कि आज वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा और बच्चे या तो काम में या फिर खुद में गुम रहते हैं और ऐसे में घरों में हमारे बुजुर्ग अकेले रहने लगे हैं। वृद्धों के प्रति आदर-सम्मान कम होता जा रहा है। इसका असर एकल परिवार पर भी पड़ रहा है। बच्चों के भीतर संवेदनाएं भरने वाले दादा-दादी और नाना-नानी से अब बच्चों का ज्यादा वास्ता नहीं रहा है। नतीजतन, रिश्तों की संवेदनाएं सूखती जा रही हैं। बच्चे भी स्व-केंद्रित होते जा रहे हैं। हम दादा-दादी और माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने से बच रहे हैं।

दूसरी ओर हमारी जीवन शैली ऐसी हो गई है, जिसमें तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। आय के साधन कम हैं और हमारी आधुनिक सुख-सुविधाएं पाने की ललक दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। कई बार लोग पड़ोसियों के पास ऐशो-आराम की चीजें देख कर खुद भी खरीद लेते हैं, भले ही उनकी आर्थिक क्षमता उतनी न हो। फिर उनकी आय का बड़ा हिस्सा किस्तें चुकाने में चला जाता है। आर्थिक तंगी हो जाती है। इससे भी परिवार में लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं। घर-परिवार में सुख-संतुष्टि न होने के कारण हम समाज से भी कटते जा रहे हैं। हमारे सामाजिक दायरे सिकुड़ते जा रहे हैं। हमारे पास किसी रिश्तेदार के घर आने-जाने और बोलने-बतियाने के लिए समय नहीं है। कोई काम पड़ने पर ही उनकी याद आती है। हमारे पास पड़ोसियों के लिए भी थोड़ा समय नहीं होता। इसलिए रिश्तों की मिठास कम होती जा रही है। कई बार हमारे पड़ोस में चोरी-डकैती, हत्या या मृत्यु जैसी घटना हो जाती है और हमें खबर नहीं होती।

हमारी ये संवेदनहीनता सार्वजनिक जीवन में भी देखने को मिलती है। सड़क पर कोई घायल व्यक्ति पड़ा हो तो हम उसकी मदद करने के बजाय उसे देखते हुए निकल जाते हैं कि कौन इसे अस्पताल ले जाने में समय खराब करे! जिनके पास समय होता भी है, वे बजाय उसकी मदद करने के, मोबाइल के कैमरे से वीडियो बनाने लगते हैं। सब कुछ पा लने की इस अंधी दौड़ में हमारी सहनशीलता बहुत कम हो गई है। जरा-सी बात के लिए, मसलन कई बार दस-बीस रुपयों के लिए भी लोग एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हो जाते हैं। सड़क पर जरा-सी गाड़ी टकराने पर भी लोगों के अहम टकराने लगते हैं और नतीजे में मारपीट, खून-खराबे से लेकर हत्या तक हो जाती है। ऐसे में चुनौती यह है कि हमारे अंदर से जो इंसानियत लुप्त होती जा रही है, उसे कैसे रोका जाए। कैसे यह सुनिश्चित किया जाए कि इंसान का इंसान से हो भाईचारा… हम पर मानवता हावी हो जाए। हमारे सामने एक भूखा हो तो हमसे भी न खाया जाए। लोगों के बीच अपनेपन की भावना हो। दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता जैसे बड़े-बुजुर्गों के प्रति मन में आदर-सम्मान की भावना हो। छोटों के प्रति स्नेह हो। लोग एक-दूसरे के प्रति सहज आत्मीयता दिखाएं। हमारे अंदर सहानुभूति, सम्मान और सहयोग की भावना विकसित हो और सूखती संवेदनाओं की फसल फिर से लहलहा उठे।

 

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