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दुनिया मेरे आगे: पढ़ाई के पैमाने

दूसरी मुश्किल यह है कि शिक्षक का मूल विषय कुछ और होता है और वह पढ़ाता कोई और विषय है। फिर इस क्रम में जब प्रशिक्षण की बात आती है तो उसे किसी और विषय के प्रशिक्षण में भेज दिया जाता है।

Author October 26, 2018 2:45 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (Source: Agency)

प्रेरणा मालवीया

पिछले पंद्रह सालों के दौरान जब भी मुझे किसी स्कूल के शिक्षक और विद्यार्थियों से मिलने और बातचीत करने का मौका मिला तो उनसे समझने की एक नई दृष्टि मिली, मेरे अनुभवों में एक नई कड़ी जुड़ी। शिक्षकों के प्रशिक्षण से संबंधित एक अहम बात मैंने यह महसूस की कि राज्य स्तर से प्राप्त प्रशिक्षण जब आगे यानी जिला, प्रखंड या क्लस्टर स्तर पर पहुंचता है तो उसकी गुणवत्ता में काफी फर्क आ जाता है। यह फर्क अवधारणा और विचार दोनों स्तर पर साफ दिखाई देता है। किसी संदर्भ में प्रशिक्षण के सुगमकर्ता ने किसी संदर्भ में कोई उदाहरण सामने रखा होगा, लेकिन वहां मौजूद हर व्यक्ति ने उसे अपने ढंग से समझा होगा। जाहिर है, जब वे देने की भूमिका में होते हैं तो उसके भिन्न अर्थ हो जाते हैं। सवाल है कि प्रशिक्षण को लेकर इस कदर उदासीनता क्यों दिखाई देती है! यह समझने के लिए मैंने शिक्षकों से अनौपचारिक रूप से अलग से बात की। एक मुख्य समस्या यह सामने आई कि दो तरह के शिक्षक हैं। एक, सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचे हुए, दूसरे हाल ही में नियुक्त हुए। दोनों के लिए प्रशिक्षण का एक ही मॉड्यूल और विषय वस्तु। क्या इस तरह के प्रशिक्षण से दोनों की अपेक्षाएं अलग नहीं होंगी, क्योंकि दोनों के अनुभवों में फर्क है।

दूसरी मुश्किल यह है कि शिक्षक का मूल विषय कुछ और होता है और वह पढ़ाता कोई और विषय है। फिर इस क्रम में जब प्रशिक्षण की बात आती है तो उसे किसी और विषय के प्रशिक्षण में भेज दिया जाता है। कई बार तो यह भी हुआ कि जिस विषय का प्रशिक्षण हो रहा है, उस विषय के शिक्षक स्कूल में मौजूद हैं। मगर प्रशिक्षण सूची में नाम आ जाने के कारण अन्य विषय के शिक्षक को हिस्सा लेना पड़ा। इस मसले पर आला अफसरों को कोई हल निकालना चाहिए। अगर कोई शिक्षक बेमन से प्रशिक्षण में हिस्सा ले रहा है तो इसका असर उसकी सक्रियता पर भी पड़ता है। एक पहलू यह भी है कि अमूमन हर साल प्रशिक्षण होते हैं और कई बार एक या दो बार से ज्यादा। सवाल है कि एक कमरे में बैठ कर विचार-विमर्श करने से बेहतर क्या यह नहीं हो सकता कि कुछ स्कूलों में व्यावहारिक गतिविधियों के साथ इस पर बात की जाए। मसलन, भाषा को वर्ण से न पढ़ा कर संदर्भ से पढ़ाने की बात की जाती है। उदाहरण के तौर पर कहानी या कविता से शुरुआत की जा सकती है। इस दौरान जो गतिविधियां हों, उन्हें बाकी शिक्षक गौर से देखें और फिर प्रश्नोत्तर के जरिए उस पर अपनी राय साफ करें। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी अवधारणा को कैसे कक्षा में ले जाया जा सकता है। इसमें एक और अच्छी बात यह होगी कि व्यावहारिक रूप से आने वाली मुश्किलों पर भी खुल कर और ठोस बातचीत हो पाएगी। मेरे खयाल से यह तरीका ज्यादा सार्थक और रुचिकर हो सकता है। लेकिन अब तक मैंने जितना देखा-समझा है, उसके मुताबिक प्रशिक्षण के दौरान किसी विषय पर समग्र चर्चा का अभाव अखरने वाला है। आमतौर पर यही होता है कि किसी विषय-वस्तु पर जब समूह कार्य और प्रस्तुतीकरण हो जाता है तो उसके बाद शिक्षकों की ओर से उसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जाता। यानी यह एकतरफा प्रस्तुति होकर रह जाता है। एक विषय पर प्रशिक्षण में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों की राय सामने आ जाने के बाद सुगमकर्ता को सत्र का व्यवस्थित समेकन करना चाहिए। ऐसा नहीं हो पाने की वजह से प्रशिक्षण के बाद भी कई शिक्षकों के मन में यह भ्रम बना रह जाता है कि उन्हें करना क्या है।

प्रश्नों को कब किस ढंग से रखा जाए, यह भी एक कला है। मुझे निजी रूप से लगता है कि हम कर कुछ और रहे हैं और परिणाम कुछ और सामने आ रहे हैं। इसके लिए जिम्मेदारी शिक्षकों की नहीं बनती, बल्कि जरूरत उस प्रक्रिया में बदलाव की है, जिसकी वजह से ऐसा होता है। ऐसी तमाम चीजें हैं जो किसी प्रशिक्षण को बेहतर और प्रभावी बनाती हैं। अगर हर पहलू पर व्यवस्थित रूप से काम किया जाए तो उन समस्याओं का हल निकाला जा सकेगा, जो अब तक सामने आती रही हैं। मौजूदा हालात के बने रहते शिक्षा के स्तर में बहुत कुछ बदलाव की गुंजाइश फिलहाल नजर नहीं आती। लेकिन अगर यही स्थिति कायम रही तो शिक्षा महज एक औपचारिकता के रूप में बनी रहेगी। जबकि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना समूची पद्धति की प्राथमिकता होनी चाहिए। यह अगर मौजूदा ढांचे में हो पाता है तो ठीक, अन्यथा इसका कोई और विकल्प खोजने में संकोच नहीं करना चाहिए। मूल मकसद प्रशिक्षण और उसके जरिए शिक्षा को ज्यादा प्रभावी बनाने का होना चाहिए, ताकि यह शिक्षक और विद्यार्थियों के भीतर रुचि पैदा करे और गुणवत्ता आधारित शिक्षा का समाज बने।

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