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दुनिया मेरे आगेः गंदी आदत

थूकने की संस्कृति के कई उदाहरण हैं जैसे अफ्रीका की मसाई जनजाति के लोग एक-दूसरे पर थूक कर अभिवादन करते हैं। हाथ भी मिलाया जाता है, तो पहले एक-दूसरे के हाथों पर थूका जाता है।

Author Published on: April 4, 2020 12:28 AM
थूकने की संस्कृति के कई उदाहरण हैं जैसे अफ्रीका की मसाई जनजाति के लोग एक-दूसरे पर थूक कर अभिवादन करते हैं।

नरेंद्र जांगिड़

भारतीय समाज में थूकने की आदत इतनी प्रबल और सर्वव्यापी है कि थोड़ी-थोड़ी देर बाद हम न थूकें तो बेचैनी होने लगती है, ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़ी-थोड़ी देर बाद हम अपना मोबाइल फोन न देखें तो परेशान हो जाते हैं। भारत में कहीं भी थूकना एक अधिकार जैसा माना जाता है। रुपए गिनते हुए, कॉपी-किताब के पन्ने उलटते समय, गाड़ी का शीशा चमकाने के लिए इससे बेहतर, सस्ता और सदा उपलब्ध होने वाला द्रव भला और कहां मिलेगा!

जब थूकने की तलब लगी हो तो उचित स्थान की तलाश करने का समय कहां होता है, कौन उठाए वॉश बेसिन या नाली ढूंढ़ने या उस तक चल कर जाने की जहमत। नई दीवार, सड़क या फर्श पर थूकने का आनंद ही कुछ अलग होता है! स्वच्छ भारत अभियान को स्वच्छंद भारत अभियान में तब्दील करने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है। पुराने जमाने में नवाबों के साथ नौकर पीकदान लेकर चलते थे, जो आज भी देश के कई संग्रहालयों में देखने को मिल जाते हैं। गुटका, खैनी, पान और तमाम तरह के पान मसाले चबाने की आदत थूकने की परंपरा को निरतंर समृद्ध बनाए हुई है। गुटका और पान मसाला कंपनियों द्वारा विज्ञापन भी इस तरह दिखाए जाते हैं मानो गुटका नहीं चबाया तो हमारा जीवन व्यर्थ है। और अगर चबा लिया तो फिर दुनिया आपके कदमों में होने से कोई नहीं रोक सकता! खैर, सरकार ने कानून बना कर विज्ञापन पर करोड़ों रुपए खर्च किए हैं, पर हालात जस के तस हैं। कैंसर का डर दिखाती गुटके के पैकेट पर छपी तस्वीरें भी पान मसाले की बिक्री कुछ कम नहीं कर पाईं। आखिर संस्कृति का जो मसला है, सदियों से पान और खैनी हमारी संस्कृति की पहचान रही है।

सरकारी दफ्तर, कचहरी, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सड़कें सब जगह पीक-चित्रकारी के दर्शन आसानी से सुलभ हो जाते हैं। किसी विदेशी को थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन हम भारतीयों के लिए यह चित्रकारी जीवन का बिल्कुल सहज अंग बन चुकी है।

मैं खड़ी बस, कार या बाइक के एकदम पास से गुजरने से हमेशा डरता हूं और इस डर की वजह है भारतीयों की थूकने की आदत। कुछ लोग चलती कार का दरवाजा खोल कर थूकने के अपने हुनर का शानदार सार्वजनिक प्रदर्शन भी करते हैं। कार-बाइक चलाते हुए अगर अगली बस की खिड़की से पीक के छींटे आप पर भी आते हैं तो जनाब, संस्कृति के लिए थोड़ा सहन करना सीखिए। कुछ लोग बस या रेल की यात्रा में खिड़की की सीट लेना ही पसंद करते हैं, ताकि पूरे सफर आराम से पीक थूक सकें और अगर दुर्योग से खिड़की सीट नहीं मिली तो वहां बैठे यात्री की यात्रा का खराब होना तय है।

थूकने की संस्कृति के कई उदाहरण हैं जैसे अफ्रीका की मसाई जनजाति के लोग एक-दूसरे पर थूक कर अभिवादन करते हैं। हाथ भी मिलाया जाता है, तो पहले एक-दूसरे के हाथों पर थूका जाता है। यहां तक कि नवजात शिशु को आशीष देने के लिए भी उस पर थूका जाता है। लेकिन वे जनजातीय लोग हैं और हम सभ्य लोग। पर हम अपने सभ्य होने का परिचय नहीं दे पाते और जाने-अनजाने मसाई जनजाति की तरह लोगों के कपड़ों और मुंह पर थूक के छींटे पड़ ही जाते हैं।

इस थूको संस्कृति के कारण ही भारत में थूक पर कहावतें भी खूब गढ़ी गईं। मसलन, आसमान पर थूकना, थूक कर चाटना, हथेली पर थूकना, थाली में थूकना, उपकार पर थूकना, गुस्सा थूकना, थूक निगलना वगैरह।

गांव देहात में किशोर कब बड़ों के साथ बैठे-बैठे पान मसाला खाने और उन्हीं की तरह थूकना चालू कर देते हैं, पता भी नहीं चलता। संस्कृति इस प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित हो जाती है। पर मेट्रो कल्चर ने तो लोगों के थूकने पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। जुर्माने की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका है, वरना पान-गुटखा-तंबाकू खाकर सर्वत्र थूकने को अपना मौलिक अधिकार समझने वाले लोग मेट्रो स्टेशनों और मेट्रो के डिब्बों का भी वही हाल कर देते, जो आम स्टेशनों और गाड़ियों का कर देते हैं।

पर जब हम थूकते हैं तो उसके साथ हमारे शरीर में उपस्थित जीवाणु भी वायुमंडल में आ जाते हैं और उसके आसपास से गुजरने वाले व्यक्ति को संक्रमित कर देते हैं। इस तरह सार्वजनिक स्थलों पर थूकने से टीबी जैसे घातक रोग फैलते हैं, जिससे थूकने को लेकर सावधानी की जरूरत है। नहीं तो हम कितना भी झाड़ू लगा लें, कुछ नहीं होगा, क्योंकि थूकने वालों की संख्या झाड़ू लगाने वालों से ज्यादा है। इसे रोकने के लिए सख्त कानून बनाना होगा। इसकी ब्रिकी और खरीद के साथ ही उत्पादन पर रोक लगानी होगी।

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