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दुनिया मेरे आगे: पूर्वाग्रहों के पाठ

क्यों इस पर्व को केवल आदिवासी समुदाय का पर्व बताया जाता है? इस बात से किसी को इनकार नहीं होगा कि भारत देश केवल हिंदू धर्म को मानने वालों का ही नहीं है, बल्कि तमाम दूसरे धर्मों और समुदायों का भी है।

Author Published on: August 30, 2019 2:08 AM
भगोरिया त्योहार मनाते समुदाय के लोग। फोटो सोर्स: khargone.nic.in

अमित चमड़िया

कक्षा तीन में एक शिक्षक ने दिवाली पर निबंध लिखवाया। उस निबंध की पहली पंक्ति कुछ इस प्रकार थी- ‘दिवाली भारत देश का एक प्रमुख पर्व है।’ यों यह पंक्ति हिंदी निबंध की किताबों में आमतौर पर लिखी हुई मिल जाती है, लेकिन जब ईद या गुरुपर्व पर निबंध लिखवाए जाते हैं तो पंक्ति कुछ इस प्रकार होती है- ‘ईद मुसलिम समुदाय का प्रमुख त्योहार है या गुरुपर्व सिख धर्म को मानने वाले लोगों द्वारा मनाया जाता है।’ मुझे भी अपने स्कूल में इन त्योहारों के बारे कुछ इसी तरह की बात सिखाई गई थी। आज भी लाखों बच्चे इसी तरह के निबंधों की किताब पढ़ रहे हैं या उनकी कक्षा में उनके शिक्षक द्वारा इसी तरह की पंक्तियां इन त्योहारों के बारे लिखवाई जा रही हैं। कक्षा तीन के बच्चों के लिए इसमें कुछ भी असामान्य जैसा नहीं है, पर हम ‘स्वाभाविक तरीके’ से या ‘सहजता’ से बहुत कुछ बच्चों को गलत बातें बता देते हैं। त्योहारों के बारे में इस तरह की बातें कुछ इसी तरह की हैं।

भारत बहुलतावादी संस्कृति का परिचायक है। जब हम दिवाली को भारत देश का प्रमुख पर्व बताते हैं तो हम ईद और गुरुपर्व को भी क्यों नहीं भारत के एक प्रमुख त्योहार के रूप स्वीकार करते हैं। अगर हम एक पर्व को किसी खास धर्म से जोड़ते हैं तो फिर यही काम दिवाली पर निबंध लिखते समय क्यों नहीं होता है! इस पर्व के संदर्भ पर हम यह नहीं लिखते हैं कि दिवाली हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भी तथ्य है कि समूचे देश में हर जगह दिवाली नहीं मनाई जाती है। हमारे स्कूल की किताबें कई बार हमें प्रत्यक्ष या फिर परोक्ष रूप से भेदभाव करना सिखाती हैं। आदिवासी समुदाय के पर्व, जैसे- सरहुल, भगोरिया आदि के बारे में जब हम पढ़ते हैं तो यह क्यों नहीं बताया जाता है कि ये उत्सव भी भारत देश के प्रमुख त्योहार हैं? क्यों इस पर्व को केवल आदिवासी समुदाय का पर्व बताया जाता है? इस बात से किसी को इनकार नहीं होगा कि भारत देश केवल हिंदू धर्म को मानने वालों का ही नहीं है, बल्कि तमाम दूसरे धर्मों और समुदायों का भी है। आदिवासी बच्चे या गैर-हिंदू बच्चों की मन:स्थिति के बारे में सोचने की जरूरत है कि जब उनकी ही कक्षा में उनके त्योहार को देश का त्योहार नहीं बताया जाता है और किसी खास त्योहार को देश का त्योहार बताया जाता है तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा।

एक निजी स्कूल की कक्षा आठ में पढ़ने वाले एक छात्र से मैंने पूछा कि तुम्हारा स्कूल क्यों बंद है, तो उसका जवाब था-‘मुझे नहीं मालूम।’ मेरे बहुत जोर देने पर उसने कहा कि मुसलिम समुदाय का कोई त्योहार है, इसलिए बंद है। प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि स्कूल ईद के अवसर पर बंद था। अब इस तरह के निबंध को बच्चे पढ़ेंगे तो उस छात्र की तरह अन्य को भी स्कूल के बंद होने का कारण नहीं पता होगा।

मामला केवल किताबों तक ही सीमित नहीं है। हाल ही में झारखंड की राजधानी रांची के एक पुलिस थाने में मेरा जाना हुआ। वहां पता चला कि थाने में अभी-अभी पूर्णिमा का हवन समाप्त हुआ है। कैसे हम सरकारी प्रतिष्ठानों में किसी खास धर्म को इस तरह से मनाने की इजाजत देते हैं। जबकि भारत के संविधान में यह बात स्पष्ट रूप से दर्ज है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। तो किसी खास धर्म की पहचान को मुख्य बना कर पेश करना क्या संविधान का उल्लंघन नहीं है? संविधान के उल्लंघन पर किस-किस तरह के कानूनी प्रावधान लागू होते हैं?

हम अक्सर इस बात को टेलीविजन पर देखते हैं कि शिलान्यास आदि के मौके पर या कार्यक्रमों में सरकारी अधिकारी या नेता हिंदू रीति-रिवाज से पूजा करते हैं। दूसरी ओर, वही सभी स्तंभों की ओर से धर्मनिरपेक्ष होने का दावा भी किया जाता है। क्या ऐसी स्थिति में अन्य धर्मों के प्रति समान स्तर पर सम्मान की भावना और व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है? निजी मान्यताओं से कुछ भी बाधित नहीं होना चाहिए। एक उदाहरण दिल्ली के पटेल चौक मेट्रो स्टेशन पर देखा जा सकता है, जहां ‘भगवद्गीता’ किताब को लोगों के देखने के लिए रखा गया है। क्या सरकार और उसकी किसी एजेंसी के द्वारा एक खास धर्म के प्रति इस तरह के सार्वजनिक व्यवहार अन्य समुदायों के बीच बहिष्करण का अहसास नहीं करेंगे? जब इस तरह की सामग्रियां हम बचपन में ही पढ़ने लगते हैं तो बड़े होने पर वही भेदभाव रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल होना स्वभाविक है। हमारे स्कूल की किताबों में बड़े बदलाव की जरूरत है और यह बात बच्चों को बतानी होगी कि क्यों निबंधों में इस तरह की पंक्तियां उचित नहीं हैं। तभी शायद हम सही शिक्षा बच्चों को दे पाएंगे और सही अर्थों में एक मजबूत भारत का पाठ तैयार कर पाएंगे।

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