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दुनिया मेरे आगे: छवि के बरक्स

आंकड़ों को देखें तो वित्तीय वर्ष 2017-18 की नीति आयोग की उस रिपोर्ट को भी देखना पड़ेगा, जिसमें कहा गया है कि बिहार सरकार ने स्वास्थ्य पर 6,668 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि उसी अवधि में केरल सरकार ने इससे ज्यादा रुपए खर्च किए।

Author July 3, 2019 1:32 AM
चमकी बुखार से अभी तक बिहार में 130 मौतें हो चुकी हैं। (EXPRESS PHOTO)

आलोक रंजन

देश के किसी भी हिस्से में मेरी पहचान एक बिहारी की है। यह पहचान मैं चाहूं या न चाहूं, मुझसे जुड़ी ही रहेगी। इस पर गर्व करने या इससे उपजी शर्म में गड़ जाने वाली स्थिति से अलग मुझे अपना यह राज्य प्रिय है। इसके बावजूद जब भी मैं अपने बिहारी होने का जिक्र करता हूं तो अन्य राज्यों या जगहों के लोग उससे बिहार की दुर्दशा जरूर जोड़ते हैं। बेशक पहली ही मुलाकात हो, लेकिन लोग अशिक्षा, भ्रष्टाचार, अराजक सामान्य जीवन और गरीबी से मेरी पहचान जोड़ना नहीं भूलते। अपने राज्य से कितनी भी मुहब्बत हो, लेकिन इन बातों से इनकार नहीं किया जा सकता।

दशकों से बिहार अपनी इन पहचानों से जूझ रहा है और यह स्वीकार करना बिल्कुल आसान है कि जूझते हुए भी यह राज्य इन मामलों में असफल रहा है। लोग एक खास नेता का नाम लेकर उन्हें भ्रष्टाचार के नायक के रूप में लगभग चिढ़ाने के लहजे पर उतर आते हैं। ऐसे लोगों को सामाजिक न्याय जैसी चीजों से कोई सरोकार नहीं रहता। हालांकि एक बड़ी और जरूरी बात यह है कि जिन मुद्दों पर बिहार को कोसा जाता है, कमोबेश ऐसे मुद्दे हर राज्य में मौजूद हैं, लेकिन बिहार की बुरी स्थिति देश के अन्य भागों के लोगों को गहराई से अपील करती है। कुछ अच्छा हो जाना वहां के लिए बड़ी बात हो सकती है, लेकिन देश के अन्य हिस्सों के लिए यह कोई खबर नहीं।

बिहार के बारे में यह सब अप्रिय तो लगता है, लेकिन ये बातें मुझे खास प्रभावित नहीं करतीं। मुझे बस इस राज्य की उस आग के खत्म हो जाने का दुख होता है, जिसके लिए यह अतीत से लेकर हाल के इतिहास तक में प्रसिद्ध रहा। यहां प्रतिरोध का स्वर बहुत मजबूत रहा था। स्थानीय संस्कृति में सामंतवाद था तो उसके प्रतिकार की बात भी थी। सामंतवाद तो नहीं मिटा, लेकिन प्रतिकार की शक्तियां जरूर कमजोर पड़ गर्इं। बिहार में आपसी सौहार्द का माहौल तेजी से बिगड़ा है। कुछ गिने-चुने उदाहरणों को छोड़ कर यह इसकी पहचान नहीं थी। फिर एक बात और दुखी करती है कि देश के दूसरे राज्य जब संकटग्रस्त होते हैं, तो वहां के लोग और वहां से बाहर रहने वाले भी बड़ी शिद्दत से अपने राज्य के साथ खड़े होते हैं। बिहार शायद देश का एकलौता राज्य होगा जहां ऐसा देखना असंभव के स्तर की बात है। लेकिन मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में फैले एक्यूट इन्सेफ्लाइटिस सिंड्रोम के मामले में यह बात उलट गई। बिहार के लोगों ने इसके माध्यम से अपने भीतर सोई उस आग को जगा लिया जो कहीं राख की तहों में दब गई थी।

एक-दूसरे से जुड़ कर कैसे एक बड़ी बीमारी से जूझते समाज को जगाया जाता है, उसकी मिसाल बने लोग उस आग के वाहक हैं। थोड़े दिनों पहले तक ये लोग एक-दूसरे को भले नहीं जानते हों, लेकिन एक-एक से जुड़ कर कड़ी बनी और उस कड़ी ने कमाल का काम किया। तारीफ की बात यह है कि ये लोग बिहार को, उसकी स्थानीयता को और उसके लोगों को जानते हैं जो बाहर काम करने गए हैं। इन सबको यह पता है कि यहां कम संसाधनों में ही बेहतरीन काम करना पड़ेगा। वहां काम कर रहे लोगों की कार्यप्रणाली को देखने पर इसका इल्म हो जाता है। वे खराब पड़ी मशीनों को बदलने के बजाय उन्हें ठीक कर रहे थे। बड़े-बड़े हवाई कामों के बजाय मुजफ्फरपुर के अस्पताल के परिसर में परिजनों और रोगियों की सुविधा बहाल कराने पर जोर था। सबकी जड़ में था बिहारीपन, जो कम संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना जानता है। सोशल मीडिया पर उन्होंने जरूरी पैसे जुटाने के लिए अपील की। इसमें सबसे प्रशंसनीय बात यह रही कि जरूरत भर का पैसा मिल जाने के बाद इन्होंने लोगों से सहायता लेना बंद कर दिया, साथ ही उन पैसों के खर्च की मदों को सार्वजनिक किया।

आपदाओं के समय अक्सर यह देखा जाता है कि पैसे खूब आते हैं, लेकिन जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचते। यहां बात उलट थी। निश्चित रूप से ये स्वयंसेवक सरकार का काम नहीं कर सकेंगे, लेकिन अपने आत्मबल और जुड़ाव से उन्होंने बिहार के नए तेवर को सामने रखा है। सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन स्वास्थ्य के प्रति उसका रवैया दुखद ही है। सवा सौ बच्चों से ज्यादा के मरने के सरकारी आंकड़ों को देखें तो वित्तीय वर्ष 2017-18 की नीति आयोग की उस रिपोर्ट को भी देखना पड़ेगा, जिसमें कहा गया है कि बिहार सरकार ने स्वास्थ्य पर 6,668 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि उसी अवधि में केरल सरकार ने इससे ज्यादा रुपए खर्च किए और वहां की आबादी बिहार की लगभग एक तिहाई है। इस आंकड़े के साथ उनके काम को देखिए, गर्व होगा!

 

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