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दुनिया मेरे आगे: पानी पर लिखी कहानी

आज जरूरत है प्रकृति के प्रति जुनूनी समर्पण की। अच्छी बारिश के बाद तस्वीर में मौजूद अधिकतर लोगों को याद नहीं रहता कि उस पौधे का क्या हाल है। त्योहार की तरह पेड़ लगाने वालों को समझना होगा कि यह सिर्फ साल में एक बार किया जाने वाला काम नहीं है।

Author Published on: September 16, 2019 2:51 AM
उत्तर भारत में मूसलाधार बारिश के दौरान की तस्वीर (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

रजनीश जैन

‘पानी का न रंग है, न स्वाद, न सुगंध और न इसे परिभाषित किया जा सकता है। यह जीवन के लिए केवल जरूरी नहीं, खुद जीवन है। यह हमें उन तृप्तियों से भर देता है जो इंद्रियों के आनंद से अधिक है।’ फ्रेंच लेखक अंटोनिओ डे सेंट की पंक्तियां पानी के रहस्य से हमारा परिचय करा देती है। कहना न होगा कि यह रहस्यमय जल हमें इतनी प्रचुरता में मिला था कि हम इसकी कद्र करना भूल गए। जो भी चीज मनुष्य को इफरात में मिलती है, उसके प्रति वह उदासीन हो जाता है। पिछले तीस-चालीस वर्षों में ही पीने के पानी का संकट विकराल रूप ले चुका है। अखबारों के अंचल के पन्नों और शहरी खबरों में इस भयावह समानता को महसूस किया जा सकता है। इन्हीं समाचारों के बीच कभी-कभी मानसिक दिवालिएपन की झांकी भी नजर आ जाती है, जहां वर्षा के लिए जानवरों के विवाह कराए जाने के हास्यास्पद टोटके आजमाए जाने का जिक्र होता है।

प्रकृति के प्रति उदासीनता के परिणामों का असर नजर आने लगा है। भूजल स्तर हर गुजरते साल के साथ नीचे उतर रहा है। किसी ने कभी कहा होगा कि तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा। वे पूरी तरह गलत नहीं थे। हमारे ही देश के दो राज्य जिस तरह पानी के बंटवारे को लेकर एक दूसरे के खिलाफ तलवारेें ताने हुए हैं, उससे डरावने भविष्य की स्पष्ट तस्वीर उभर आती है। इन दिनों एक तस्वीर लगातार सामने आ रही है। एक नन्हे पौधे के इर्द-गिर्द खड़े करीब पचास लोग वृक्षारोपण की रस्म अदायगी करते कैमरे की तरफ झांकते हैं। इनमे से कितने पर्यावरण को लेकर गंभीर हैं, उस फोटो को देख कर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

आज जरूरत है प्रकृति के प्रति जुनूनी समर्पण की। अच्छी बारिश के बाद तस्वीर में मौजूद अधिकतर लोगों को याद नहीं रहता कि उस पौधे का क्या हाल है। त्योहार की तरह पेड़ लगाने वालों को समझना होगा कि यह सिर्फ साल में एक बार किया जाने वाला काम नहीं है। पर्यावरण के प्रति जागरूकता हमारी जीवन शैली होना चाहिए, तब जाकर हम आगामी पीढ़ी के लिए बेहतर परिस्थितियां निर्मित कर पाएंगे। जल संकट और कुछ नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन शैली और रहन-सहन के बदलते स्वरूप का नतीजा भर है। हमारी पीढ़ी को यह कटु सत्य स्वीकार लेना चाहिए कि उनके समय में पानी एक उत्पाद की तरह बिकना शुरू हो गया है। तरक्की का यह सोपान मानव जाति को किस स्थिति से रूबरू कराएगा, सिर्फ कल्पना की जा सकती है। पानी की समस्या पर पर्यावरणवादियों और चिंतकों के अलावा फिल्मकारों ने भी अवर्षा को केंद्र में रख कर पानी के महत्त्व को आवाज देने का प्रयास किया है। ख्यात फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास ने पचास वर्ष पहले महसूस कर लिया था कि पानी का दुरुपयोग और अभाव हमारे जीवन को गहरे तक प्रभावित करने वाला है। इसी संकट को केंद्र में रख कर उन्होंने फिल्म ‘दो बूंद पानी’ (1971) निर्मित और निर्देशित किया। उसका कथानक और संदेश उस दौर से ज्यादा आज प्रासंगिक है।

आरके नारायण के उपन्यास पर आधारित ‘गाइड’ (1965) में अवर्षा कथानक के केंद्र में है। एक चोर परिस्थितिवश साधु बन जाता है, लेकिन गांव वालों की अपने प्रति अगाध श्रद्धा के चलते वर्षा के लिए बारह दिन के उपवास की तपस्या कर बैठता है। इधर भूख से उसकी मृत्यु होती है और उधर गांव में झमाझम बारिश शुरू हो जाती है। यह फिल्म देव आनंद को बतौर अभिनेता, विजय आनंद को बतौर निर्देशक और एसडी बर्मन को बतौर संगीतकार तब तक अमर रखेगी, जब तक इस धरा पर सिनेमा मौजूद रहेगा! अमोल पालेकर निर्देशित अपने आप में अनूठी फिल्म ‘थोड़ा-सा रूमानी हो जाए’ (1990) पानी को जीवन के कई प्रतीकों में बांधती है। जीवन में उत्साह और आत्मविश्वास का खत्म हो जाना एक तरह से प्रकृति का पानीविहीन हो जाना है। कविताई शैली में बोले गए संवादों की वजह से नाना पाटेकर और अनिता कंवर की केंद्रीय भूमिका वाली इस फिल्म में भी भारी सूखे के बाद बारिश का आना जीवन में आशा के संचार का प्रतीक बन कर उभरा है।

कल्पना कीजिए कि फिल्म ‘लगान’ (2001) से भारी सूखा झेल रहे गांव वालों की त्रासदी को निकाल दिया जाए तो फिल्म में क्या बचेगा! ‘लगान’ अपनी मंजिल से ही भटक जाएगी। फिल्म की शुरुआत में घुमड़ते बादलों का आकाश में जुटना एक उम्मीद जगाता है और गीत खत्म होते-होते उनका गायब हो जाना साफ कर देता है कि इस बार की अवर्षा उनकी जिंदगी के मायने बदल देने वाली है। पानी पर लिखे फिल्मी कथानकों का अंत भले ही सुखांत रहा हो, लेकिन वास्तविक जीवन में परिस्थितियां इस तरह के मौके कम ही देती है। पर्यावरण और प्रकृति के प्रति नजरअंदाजी की कीमत वर्तमान और आगामी दोनों पीढ़ियों को महंगी पड़ने वाली है। यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए उतना बेहतर होगा।

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