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दुनिया मेरे आगे: आधुनिकता की किरचें

हम मेट्रो ट्रेन में सवार हैं और अब बुलेट ट्रेन में सवार होने को लालायित हैं। फिर ये सफाई के औजारों के रूप में कुछ छड़ों और जहरीली गैसों से भरे सीवर में जान जोखिम में डाल कर किसी इंसान के उतर कर सफाई करने की कवायदें क्या आदिम युग की याद नहीं दिलातीं?

Author October 9, 2018 2:47 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।(Express Photo by Manoj Kumar)

अनीता यादव

दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है, इसलिए यह उम्मीद स्वाभाविक हो जाती है कि यहां सब कुछ दुरुस्त होने या करने की व्यवस्था बेहतर होगी। बाकी मसलों पर बात और घमासान चलता रहता है। लेकिन कई ऐसे पहलू भी होते हैं, जिन्हें तात्कालिक महत्त्व का मान लिया जाता है और उन पर बहुत फिक्र नहीं जताई जाती। जबकि ऐसी बातों से शहर की सूरत बनती है और उनका असर कमोबेश लगातार कायम रहता है। करीब महीने भर पहले बीते बरसात की बात है। चालीस फुट चौड़ी सड़क को थोड़ी देर की मूसलाधार बरसात ने नहर में बदल दिया था। अपनी त्रिभंगी मुद्रा समेट कर बरसात खुद तो चली गई, पर पीछे लोगों के लिए दुश्वारियां बिखेर गई। गटर का पीला पानी नालियों के काले पानी संग हिल-मिल कर सड़क को कब्जे में कर चुका था। अगले दो दिन बारिश न आने के बावजूद वह काला-पीला जल मुस्तैदी से सड़क पर टिका रहा।

तीसरे दिन साइकिल पर बांस और लोहे की छड़ लिए एक दुबला-पतला नगर-निगम कर्मचारी आया। उसके आने के बाद चारों और तमाशबीन लोग जमा हो गए, जैसे वह अभी जादू करने वाला हो। कर्मचारी ने पहले अपनी पैंट की मोरी और शर्ट की आस्तीन को थोड़ा ऊपर चढ़ाया, पानी में धीमे कदमों से ‘ठिकाने’ को खोजा। फिर गटर का ढक्कन उठाने की पुरजोर कोशिश के बावजूद उससे वह ढक्कन नहीं खुला। वहां मौजूद लोग उसे यह करते हुए देख रहे थे, जरूरत समझ रहे थे, लेकिन वे केवल तमाशबीन बन सकते थे, मददगार नहीं। इन तमाशबीनों की दलील गजब है- ‘आखिर वह कर्मचारी इस काम के पैसे पाता है तो हम क्यों दखलअंदाजी करें… हमें कौन-से पैसे मिलेंगे!’ इस दलील से उपजी सोच सब पर तारी थी। बहरहाल, तमाम मशक्कत के बाद जैसे ही ढक्कन खुला आसपास के लोग दस फुट पीछे खिसक गए। बदबू के साथ पानी पर तैरते मल को देख लोगों के नाक-भौं सिकुड़ गए थे। मैं घर की बालकनी से यह सब देख रही थी। अन्य लोगों की तरह इस दृश्य ने मेरे मन को भी जुगुप्सा से भर दिया। लेकिन उस कर्मचारी का चेहरा देख कर नहीं लगा कि उसे गटर और उससे निकले गंदे बदबूदार पानी से घिन्न आई हो। आसपास के लोगों की प्रतिक्रिया और उनके भीतर उमड़ते भावों से बेखबर वह बारी-बारी से छड़ों को बदल कर पानी निकलने का रास्ता बनाने के अपने काम में मसरूफ था। गटर से निकली कीचड़ सनी ढेर सारी प्लास्टिक की पन्नियों का ढेर लग गया। इसके बावजूद किसी कलाकार की तरह उसके हाथों से संचालित होती छड़ें कमानी-सी तनी सफाई में तल्लीन थीं। अगले एक घंटे वह गली के सभी गटर को यों ही साफ करता रहा। ऐसे ही उस किशोर लड़के को देख मन पसीज उठता है जो रोज घरों से कूड़ा उठाता है। गीले और सूखे कूड़े को हाथों से अलग करता वह एक अलग ही लोक का प्राणी लगता है। दूसरों को असहज करने वाला उसका बदबूदार ठेला उसे कैसे सहज रख पाता होगा?

ये सवाल क्या कभी हम अपने आप से पूछते हैं? जहां कुत्तों और सूअरों को अपने पेट के लिए खाना खोजते नाक डुबाए देखा जाता है, एक आम इंसान अपनी सांस रोक ले, वहां ये इंसान कहे जाने वाले प्राणी ‘जी’ रहे हैं! दूसरी ओर हमें तो ऐसा लगता है मानो अपने घर से लेकर आसपास की जगहों पर गंदगी फैलाने का अधिकार ही मिला हुआ है। ये बातें न हमारे लिए सोचने का कोई मुद्दा हैं, न हमारी सरकारों के पास इसका कोई ठोस हल है। कीड़े-मकोड़ों की तरह जीवन बसर करने वाले इन कामगारों के बारे में कितना संजीदा और संवेदनशील है हमारा समाज? कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए हम हजारों मील की दूरी पाट कर ‘ग्लोबल’ यानी भूमंडलीकृत हो चुके हैं, ई-वाहनों पर निवेश दिनोंदिन बढ़ाया जा रहा है। हम एक आधुनिकता की चकाचौंध से तारी दुनिया के निवासी हैं। हम मेट्रो ट्रेन में सवार हैं और अब बुलेट ट्रेन में सवार होने को लालायित हैं। फिर ये सफाई के औजारों के रूप में कुछ छड़ों और जहरीली गैसों से भरे सीवर में जान जोखिम में डाल कर किसी इंसान के उतर कर सफाई करने की कवायदें क्या आदिम युग की याद नहीं दिलातीं? गटर या सीवर की सफाई के लिए उसमें उतरने वाले कितने लोग उससे निकलने वाले कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, मीथेन जैसी जहरीली गैसों के चलते हर साल मर जाते हैं, इससे हमें परेशानी नहीं होती। शायद हम इन खबरों पर गौर भी नहीं करते, क्योंकि हमें लगता है कि सीवर में उतरना और मर जाना उनकी ‘ड्यूटी’ है! काश कि हम बुलेट ट्रेन की सवारी का इंतजाम करने से पहले इन कर्मचारियों को एक निगाह उठा कर देख लेते, जो दिन-रात संक्रमण में ही जीते-मरते या दुख और ‘खुशी’ मनाते हैं तो हमें हमारी ‘ग्लोबल वास्तविकता’ इनकी आंखों में साफ झलकती दिख जाती! क्या यह कोशिश कर पाएंगे हम!

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