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दुनिया मेरे आगे: भूलते भागते क्षण

दुकानों की बात करूं तो समोसे की कुछ दुकानें और खुल गर्इं, लेकिन समोसे की पुरानी दुकान ‘प्रेम हलवाई’ अब भी प्रसिद्ध है। मुझे नहीं मालूम कि लोग इसे प्रेम की दुकान क्यों कहते हैं, लेकिन मैंने बचपन में इसके समोसे जरूर खाए हैं।

Author October 27, 2018 2:30 AM
प्रतीकात्‍मक फोटो

मोनिका अग्रवाल

सड़क के किनारे कुछ दुकानें हैं। लोग इसे चौक कहते हैं। सही भी है, क्योंकि चारों ओर छोटी-छोटी बहुत-सी दुकानें हैं। जैसे मिठाई और नाश्ते की, किराने की, दूध-दही की और एक दुकान तंबाकू-पान वाले की भी। पान की दुकान के ऊपर पीपल का एक बड़ा पेड़ है। दुकान वाले को पता है कि पेड़ की छाया की वजह से उसके ग्राहक उसके पास ही आएंगे। पश्चिम की तरफ एक प्याऊ और उससे सटा एक काफी पुराना उच्च विद्यालय। मैंने बचपन से लेकर आज तक इसके रूप में कोई परिवर्तन नहीं देखा। यह बात अलग है कि इस विद्यालय से निकले कितने ही विद्यार्थियों ने अपने जीवन में बेहतरीन परिवर्तन देख लिए होंगे। दुकानों की बात करूं तो समोसे की कुछ दुकानें और खुल गर्इं, लेकिन समोसे की पुरानी दुकान ‘प्रेम हलवाई’ अब भी प्रसिद्ध है। मुझे नहीं मालूम कि लोग इसे प्रेम की दुकान क्यों कहते हैं, लेकिन मैंने बचपन में इसके समोसे जरूर खाए हैं। प्रेम की दुकान के गरम समोसे मुंह में डालने से पहले सोचना जरूरी है, वरना जीभ और मुंह जल जा सकते हैं। प्रेम के समोसे के सामने अजीबोगरीब नाम वाले विदेशी रेस्टोरेंट के पकवान फीके लगते हैं।

दरअसल, प्रेम के समोसे में सिर्फ मसाले का स्वाद नहीं होता, बल्कि अपनेपन का अहसास भी होता है। मैंने बचपन से देखा कि लोगों और प्रेम का रिश्ता समोसे तक सीमित नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख, घर गृहस्थी की बातें, अड़ोसी-पड़ोसी की खबर भी सब लोगों को आसानी से उपलब्ध थी। एक खुशनुमा-सा अहसास। साथ ही सिर्फ एक दिन न दिखने पर प्रेम हलवाई का उनसे हालचाल पूछना! बताइए ऐसा कोई व्यापारी है आज के समय में! मैं बस बताना चाह रही हूं कि कितने लोग होते हैं आजकल अपनेपन से लैस ऐसी साधारण जिंदगी जीने वाले? ज्यादातर लोग हर अगले रोज, अगले महीने की चिंता और भागदौड़। लेकिन पहले लोग कम आमदनी के बावजूद जिंदगी को जीते थे। ग्रामीण इलाकों में तो आज भी ऐसा जीवन देखने को मिल जाता है। मैं बस आत्मसंतुष्टि की बात कर रही हूं। क्या हमारे पास ऐसी निश्छल संतुष्टि है? गांवों में लोग अब भी कम आमदनी में जीवन गुजारते हैं, लेकिन परिवार में बच्चों से लेकर बड़ों तक के साथ अपनापा साझा करते हैं। बड़े-बुजुर्ग आपस में पड़ोसियों के साथ मिल कर बातचीत में मशगूल होते हैं। हम उनकी जिंदगी से बस एक बात पर जीत जाते हैं वह है बुनियादी ढांचे का मुद्दा। मैं सहमत हूं इस बात से कि विज्ञान के सहारे शहरों में बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण हुआ है और सुख-सुविधा के तमाम साधन उपलब्ध हैं। लेकिन आज भी देहात में बैलों के गले से बंधी घंटी की आवाज, शहरों की सड़कों पर दौड़ते वाहनों की आवाज से ज्यादा अच्छी प्रतीत होती है। गांवों के विद्यालयों के घंटे बजते ही बच्चे दौड़ते-भागते अपने घर की तरफ चल देते हैं। कुछ बच्चे अपने पास दो-चार या दस पाकर ही खुद के इतना अमीर होने के ऐसे अहसास से भर जाते हैं, जो बड़े-बड़े रईसजादों को कभी महसूस नहीं हो सकता। लेकिन यही है वास्तविक संतुष्टि। सौ करोड़ कमा के भी और अधिक कमाने की अमीरों की लालसा के बरक्स।

बहरहाल, मुख्य सड़क होने के कारण चौक पर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यहां आने वाले ज्यादातर लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं। यहां जो भी चर्चा होती है लोगों के बीच में वह एक-दूसरे की जिंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर। कोई यह सवाल उठा सकता है कि वहां खाने-पीने की चीजें स्वास्थ्य के लिहाज से कितनी सुरक्षित होंगी। आज से डेढ़-दो दशक पहले क्या कोई जानता था कि हाइजीन क्या होता है? आज भी गांवों के लोग इसकी परवाह नहीं करते, लेकिन शहरों के लोगों से ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। मैंने भले ही पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से की हो, लेकिन मुझे अपनापन सिर्फ अपनी बोलचाल और भाषा में ही लगता है। आज बहुत सारे बदलाव आ गए हैं। जब हम अपनी नानी के घर जाते थे, तब वहां दरवाजे पर ढेर सारे फूलों के पेड़ थे। एक बहुत बड़ा नारियल का पेड़ था। अमरूद के पेड़ भी थे। आंवला और अनार भी थे। लेकिन तेजी से हुए बदलाव ने मेरी कितनी यादें मुझसे छीन ली हैं। वह आंवले का पेड़ कट चुका है। अमरूद का जिस पेड़ पर चढ़ने के बाद मैं खुद को बहुत ज्यादा प्रफुल्लित महसूस करती थी, अब वह भी नहीं है। उस घर में बसी मेरी अनगिनत यादें हैं। मेरी बचपन की यादें। लेकिन पिछली बार जब गई तो मैंने देखा कि वे पेड़ नहीं हैं। उनके नीचे बसने वाली मेरी यादें भी बिखर गर्इं। लेकिन मेरी उन यादों को कौन मिटा सकता है! मुझे अटूट प्रेम है अपनी धरती से… उस मिट्टी से, जिसमें लोटपोट होकर मैं बड़ी हुई। उस हवा से, जिसने हमेशा मुझे अपने आगोश में रखा और उस पानी से जिसने मेरी बचपन की यादों को सींचा।

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