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दुनिया मेरे आगे: जिजीविषा की जंग

हमारे समाज में ज्यादातर लोग स्त्री को लेकर आज भी एक कुत्सित मानसिकता का शिकार हैं। जबकि स्त्री की हैसियत से एक समाज की हैसियत सहज ही मापी जा सकती है। प्राचीन काल से चली आ रही स्त्री को संबोधित करने वाली ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ जैसी बहुत-सी कहावते हैं जो इस बात का साक्ष्य हैं कि स्त्रियों की स्थिति कभी बेहतर थी।

Author October 13, 2018 2:47 AM
प्रतीकात्मक फोटो

यह शायद अलग बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि स्त्री सामाजिक रूप से इंसान ही है, भले ही अब तक की व्यवस्थाओं में यह संघर्ष और जद्दोजहद चल रहा है कि औरतों को एक मर्द के बरक्स बराबरी का अधिकार कब हासिल होगा। लेकिन इससे इतर संवेदनाओं की कसौटी पर स्त्री को देखने और समझने की कोशिशें चलती रही हैं। इस लिहाज से देखें तो मेरी दृष्टि में भी दुनिया की तमाम लिखी जाने वाली कविताओं के बरक्स स्त्री भी एक कविता है, सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली। स्त्री जो बदलाव का ही एक नाम है। जैसे स्वर का होना मुख से अबाध गति से बाहर निकलने वाले वायु द्वारा पहचाना जाता है, वैसे ही स्त्री का होना मां, सहचरी, पृथ्वी, प्राण, धरा, वसुंधरा, प्रिया, प्रेयसी आदि विशेषणों से निर्विवाद रूप से पहचाना जा सकता है। लेकिन जब कहीं इसके लिए ‘भोग्या’ शब्द का प्रयोग देखती हूं तो अफसोस होता है। इस शब्द से स्त्री होने का सही अर्थ विकृत हो जाता है, क्योंकि इससे स्त्री के वस्तु होने का बोध होता है जो उसे औरत तो दूर, मनुष्य भी नहीं रहने देता।

हमारे समाज में ज्यादातर लोग स्त्री को लेकर आज भी एक कुत्सित मानसिकता का शिकार हैं। जबकि स्त्री की हैसियत से एक समाज की हैसियत सहज ही मापी जा सकती है। प्राचीन काल से चली आ रही स्त्री को संबोधित करने वाली ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ जैसी बहुत-सी कहावते हैं जो इस बात का साक्ष्य हैं कि स्त्रियों की स्थिति कभी बेहतर थी। इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि स्त्री को लेकर हमारा समाज कभी भी एक संतुलित नतीजे तक नहीं पहुंचा। एक ओर उसे देवी कह कर पूज्या बताया गया तो दूसरी ओर वेश्या कह कर लांछित और प्रताड़ित किया गया। हर हाल में उसे मनुष्य न रहने देने का षड्यंत्र रचने वाला समाज ही खुद को उसके उद्धारक के रूप में भी पेश करता रहा। इससे स्त्री शोषण की स्थिति स्त्री-दृष्टिकोण से मारक और भयावह होने के बजाय स्वाभाविक लगने लगी। स्त्री होकर जीना दूभर हो गया और वह अति पिछड़ी हालत में जा पहुंची या पहुंचा दी गई। लेकिन उसकी दशा को सुधारने के सारे उपाय एक अधकचरे समाज की अधकचरी सोच की तरह ही सामने आए, जिससे न तो समाज का कभी भला हो सका और न ही उस स्त्री का या स्त्री जाति का, जो उसकी वास्तविक आधारशिला या नींव थी।

स्त्री की उपेक्षा का यह दंश समाज में उसे अपने जन्म से लेकर मरण तक भोगना पड़ा, जिससे उसकी स्थिति पशुओं जैसी दयनीय और मार्मिक बन गई। मनुष्य होने की बुनियादी शर्त उसकी अभिव्यक्ति या सोच पर किसी तरह के बंधन का न होना है। लेकिन स्त्रियों की सोच पर आदिकाल से ही कड़ा पहरा है। वर्जनाओं को सहन कर उसे ऐसा जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा, जिससे उसकी स्थिति गुलामों जैसी बदतर रही, भले ही ऊपर से उसे हर दौर में महिमामंडित किया गया।
यह चेहरा पिछड़े हुए आदिम समाज का ही नहीं, बल्कि उन समुदायों का भी है जो अपने को नितांत आधुनिक और प्रगतिशील मानते हैं। बल्कि इस मामले में कई समाज तो इतने पिछड़े हैं कि स्त्री के विकास के लिए जरूरी चीजों और पहलुओं का एक छोटा हिस्सा भी उन तक नहीं पहुंचता। खासतौर पर धार्मिक रूढ़ियों में कैद किसी भी समाज में स्त्रियों की यौनिकता को धर्म से जोड़ कर उन्हें इस हद तक शोषित की हैसियत में ला दिया गया है कि कहीं भी आजादी से उनका सांस लेना ही दूभर हो गया। कई समाजों में आज भी स्त्री पर्दे की वस्तु है, जिसके अधिकार घर-गृहस्थी चलाने, बच्चे पैदा करने और पुरुषों की खिदमत करने तक सीमित हैं।

अगर कभी स्त्री इस सबके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करती है तो उसे धर्म के विरुद्ध और समाज को नापाक या फिर अपवित्र करने वाली अपराधी मान कर दंडित किया जाता है। ऐसी खतरनाक मानसिकता वाले समाजों में स्त्री का पैदा होना सचमुच किसी ‘अपराध’ से कम नहीं, जिसमें उसके जीवन को नरक बनाने की सारी संभावनाएं मौजूद होती हैं। सवाल यह है कि दुनिया का कोई भी धर्म अगर स्त्री की आजादी से खतरे में पड़ता है तो उसे किस आधार पर मानवीय कहा जाएगा! ऐसी तमाम स्थितियों के बरक्स एक स्त्री का संघर्ष घड़ी के समय की तरह शाश्वत और नित्य है, जो कभी थमता या रुकता नहीं है। यों तो जीवन के हर एक घंटे अनेक स्त्रियां पैदा होती और मरती हैं, लेकिन स्त्रियों की जूझने की शक्ति और जिजीविषा उनके संघर्ष की तरह निरंतर है। अगर जीवन को भी हम एक कविता ही मानें तो उसकी एक-एक सांस पर स्त्री के जीवन का अशेष उधार होगा।

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