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दुनिया मेरे आगे: बचपन के बिना

आज के पढ़े-लिखे माता-पिता चाहते हैं कि उनका लाडला अच्छी तालीम हासिल कर शोहरत और दौलत का मालिक बने। लेकिन इसके लिए बच्चों का अपने बचपन के तालाब में गोते लगाने का हक छीना जा रहा है।

Author October 24, 2018 2:51 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

बृजमोहन आचार्य

पिछले दिनों जयपुर जाना था तो किसी ट्रेन में आरक्षित सीट के लिए टिकट नहीं मिली। विकल्प के तौर पर मैंने कार से ही जाना तय किया। ड्राइवर धार्मिक प्रवृत्ति का था, तो सुबह होने की वजह से उसने कार में भजन-संगीत बजा दिए। बाद में दिन चढ़ने के साथ ही उसने भजनों को बंद कर गजल सम्राट जगजीत सिंह की गजलें बजार्इं। मेरे लिए तो मानो बिन मांगी मुराद थी यह। जगजीत सिंह के मूल रूप से राजस्थान के होने के कारण कम, लेकिन उनकी गायकी की वजह से मैं उनका मुरीद भी था। कार में लगे टेपरिकॉर्डर से उनकी गजल के बोल- ‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो, बचपन का सावन… वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी…’ शुरू हुए तो इस युवा जीवन में बचपन की याद आ गई। वे भी क्या दिन थे, जिनमें न कोई फिक्र और न रिश्तों का बंधन था। जब बरसात होती थी तो हम भी छतों पर जमा हुए पानी में कागज की नाव बना कर चलाते थे और तालाबों में पानी आने के बाद नहाने का आनंद खूब उठाते थे। जब मर्जी हुई, घर से निकल जाते थे और दोस्तों के साथ कब और कहां चले जाते थे, पता नहीं चलता था। एक प्रकार से घर की तरफ से कोई जिम्मेदारी कंधों पर नहीं डाली हुई थी। एक वजह यह भी है कि उस वक्त न तो टीवी चैनलों की बाढ़ थी और न इस समय जीवन को सबसे ज्यादा व्यस्त रखने वाला मोबाइल था। स्कूल से लौटने के बाद बस्ता रखा एक किनारे और निकल जाते थे घूमने।

लेकिन अब जमाना ऐसा आ गया है कि न तो कागज की कश्ती बरसात के पानी में तैरती नजर आती है और न ही वह बारिश का पानी कहीं सरोवरों में मिलता दिखता है। सरोवरों के पास बनी ‘आगोर’ पर कब्जा होने से पानी की आवक रुक गई है और कागज की कश्ती चलाने की उम्र वालों के हाथ में मोबाइल और टीवी का रिमोट आ गया है। इसके अलावा बच्चों के होश संभालने के साथ ही अभिभावक उन्हें पढ़ाई के बोझ से इतना दबा देते हैं कि उनका बचपन ही समाप्त होने लगा है। सुबह स्कूल जाने से लेकर वापस आने तक और इसके बाद ट्यूशन के चक्कर में बच्चे का बचपन गुम ही हो गया है। यह सही है कि बच्चे को जीवन में दौलत और शोहरत पाने के लिए छोटी उम्र से ही उसे पढ़ाई का ज्ञान कराना आवश्यक है। लेकिन अभिभावकों को इतना भी तानाशाह नहीं बनना चाहिए कि पढ़ाई के अलावा बच्चों को बाहरी ज्ञान से जरा भी वास्ता नहीं पड़े। पढ़ाई का बोझ और मोबाइल से व्यस्त होते जीवन के कारण ही आज स्थिति यह हो गई है कि अगर महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे से कागज की कश्ती का अर्थ भी पूछ लें तो वह बताने में असमर्थ ही होगा। हालात ये हो गए हैं कि स्कूल और ट्यूशन से आने के बाद बच्चे एक कमरे में कैद होकर रह गए हैं। इससे कम उम्र में ही बच्चों को कई बीमारियों और मोटापे ने घेर लिया है। लेकिन अभिभावक फिर भी उन्हें कमरे से बाहर निकलने के लिए बाध्य नहीं करते हैं।

आज तो बच्चे का जन्म होता है और सबसे पहले अभिभावक उसकी ‘जन्म-कुंडली’ बनवा कर उसके भविष्य के बारे में सोचने लगते हैं। उस बच्चे का बचपन कैसे बीतेगा, जवानी में वह क्या करेगा और अधेड़ होने पर उसे कोई बीमारी तो नहीं लग जाएगी… इन सब बातों को दरकिनार कर अभिभावक उसे ‘जन्म-कुंडली’ के अनुसार ही ढालने की तैयारी करने लगते हैं। उसे अंगे्रजी स्कूल में दाखिल कराया जाएगा और यार-दोस्तों के साथ मोहल्ले में निकलने से मना कर दिया जाएगा। विडंबना यह है कि हम आज अंधेरे में गुमनाम बचपन का भविष्य समझते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। बचपन की सुरक्षा के नाम पर दुनिया सहित भारत में तमाम सरकारी या गैर-सरकारी संगठन काम कर रहे हैं। लेकिन सच यह है कि घर की चारदिवारी के भीतर दिनोंदिन बचपन का दायरा सिकुड़ता जा रहा है।

आज के पढ़े-लिखे माता-पिता चाहते हैं कि उनका लाडला अच्छी तालीम हासिल कर शोहरत और दौलत का मालिक बने। लेकिन इसके लिए बच्चों का अपने बचपन के तालाब में गोते लगाने का हक छीना जा रहा है। इसमें होगा यही कि बच्चा वास्तविक जीवन से विमुख होकर केवल धन कमाने लायक रह जाएगा। उसके आसपास क्या हो रहा है, उसे इसका कोई ज्ञान नहीं होगा। बच्चा अपनी जड़ों से जुड़ा होगा, तभी वह भला-बुरा और बचपन की यादों को संजोए रखेगा, परिवार और समाज की बेहतरी के बारे में सोच सकेगा। लेकिन छीन लिए गए बचपन के साए में बड़ा हुआ बच्चा कैसे किसी के भी प्रति संवेदनशील हो पाएगा!

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