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दुनिया मेरे आगे: बाजार की खुशी

बाजार और समाज की खुशी को जब समझने की कोशिश कर रहा था तो याद आया कि कुछ ही दिन बीते हैं मुझे जीवन के चौवनवें वर्ष में प्रवेश किए हुए, लेकिन बाजार की खुशी मेरे पास नहीं आई। शायद इसलिए कि मैं बाजार और उसकी खुशी का हिस्सा नहीं था।

Author November 1, 2018 4:10 AM
भारतीय बाजार।

खुशी की अपनी परिभाषा होती है। पहले खुशी मनुष्य की होती थी, लेकिन अब वह बाजार की हो गई है। यों दोनों एक-दूसरे से खुश हैं, लेकिन बीते दो दशक में बाजार ने खुश रहने का सलीका समाज को सिखा दिया है। बाजार बेजार न हो जाए, इसलिए वह नित नए इल्म खुशी के तलाश कर लेता है। इसमें सबसे मनभावन इल्म है छूट। दशहरा-दिवाली हो, होली-गणपति हो तो छूट, 15 अगस्त या 26 जनवरी पर भी छूट और इस छूट से समाज में बाजार खुशी का संचार करता है। समाज खुश तो बाजार खुश, क्योंकि छूट से बाजार बेजार नहीं होता, बल्कि तकरीबन पूरे साल किसी न किसी बहाने बाजार की रौनक कायम रहती है।

बाजार और समाज की खुशी को जब समझने की कोशिश कर रहा था तो याद आया कि कुछ ही दिन बीते हैं मुझे जीवन के चौवनवें वर्ष में प्रवेश किए हुए, लेकिन बाजार की खुशी मेरे पास नहीं आई। शायद इसलिए कि मैं बाजार और उसकी खुशी का हिस्सा नहीं था। यही सब सोचते-सोचते न जाने कब कई नई-पुरानी यादें आसपास पसर गर्इं। जब हम छोटे थे तो साल में एक बार दिवाली पर और एकाध बार किसी अन्य अवसर पर नए कपड़े पहनने को मिलते थे। इनको लेकर भी कई किस्म की बंदिशें थीं। अभी पहन कर रख दो, फलां की शादी में पहनने का काम आएगा। मन उदास हो जाता था। यह वह दौर था, जब बाजार की खुशी समाज की खुशी नहीं थी। समाज से बाजार कभी-कभी ऐसे ही तीज-त्योहारों पर खुश हो जाया करता था। वक्त रफ्ता-रफ्ता गुजरता गया। हम भी बच्चे से जवानी और जवानी से पिता की भूमिका में आ गए। लेकिन इस बदलते समय में बहुत कुछ बदल गया था। हम अपने पिता की तरह नहीं रह पाए, क्योंकि हम बाजार का हिस्सा बन चुके थे। तीज-त्योहारों पर मिलने वाले एकाध जोड़ी कपड़े से साल भर नवाब बन कर घूमने के दिन बिसर गए थे। अब कपड़े खरीदने का वक्त कोई भी हो सकता है। दोस्त की पार्टी में जाना है तो नए कपड़े और कॉलेज में किसी का विदाई समारोह होना तो है तो अलग कपड़े। कभी बच्चों को अपने पुराने दिन बताए भी तो उनका जवाब होता है- ‘पापा, आपके दिन गए। जमाना बदल गया है।’

हां, शायद जमाना बदल गया है। अब कोई अंतर देखना है तो बस इतना देख लीजिए कि अंधेरा होते ही आसमान पर चांद नमूदार होता है और रात ढलते ही सूरज की सुनहरी किरण से सबेरा, लेकिन जीवन एकरस होता जा रहा है। हम जिसे खुशी कहते हैं, वह बाजार के हवाले कर दी गई है। सजावट के नाम पर बाजार में पसरी रौनक को हम समेट कर ले आते हैं। बाजार को पता है कि समाज का रुख किस तरह मोड़ा जाए। इसके लिए उसके पास सबसे बड़ा गणित है समय की बचत। इस समय की बचत के चक्कर में परंपरा दरकिनार कर दी गई है। त्योहारों का मतलब होता था अम्मा और भाभी के हाथों की बनी गुझिया, नमकीन और किस्म-किस्म के देसी पकवान। चूल्हा न सही, गैस पर चढ़ी कढ़ाई से उठती महक जैसे उत्सव के आने की आहट होती थी। छोटे बच्चे झाड़ू-पोंछा लेकर घर की सफाई में जुट जाते थे। अधिक खर्च देख कर पिता का बीमार हो जाना जैसे उत्सव की परंपरा का हिस्सा है। तभी अम्मा की आवाज पीछे से आती- ‘अरे, मंझले तेरे बब्बा तो अब दिवाली के बाद ही उठेंगे, तू जा बाजार से आधा किलो मावा ले आ।’ अम्मा अपने आंचल में खोंसे रुपए निकाल कर देती। भाभी से आंख बचा कर कभी एकाध गुझिया पर हाथ फेर देने का अपना सुख था। चोरी पकड़ी जाती तो उनकी आवाज गरजती- ‘अरे पहले पूजा के लिए तो अलग करने देता! सब जूठा कर दिया!’

इस तरह के सारे मजे कहीं गुम हो गए हैं। खर्चे के डर से पिता न तो अब बीमार पड़ते हैं और न ही अम्मा-भाभी की कढ़ाई चूल्हे पर चढ़ती है, क्योंकि हमारे घर की खुशी अब बाजार की खुशी में है। पिता को नगद रुपए खर्च नहीं करना पड़ता है। ‘प्लास्टिक मनी’ से सारा इंतजाम हो जाता है। उन्हें खबर भी नहीं होती है कि जो कल पांच सौ रुपए के लिए भौंहें तान लेते थे, आज उनकी जेब से पांच हजार रुपए पार हो गया है। अम्मा और भाभी कभी-कभी कुड़कुड़ाती हैं कि बाजार के इन नए चोंचलों ने घर की मिठास खो दी है। बाजार के हाथों अम्मा-बाबूजी और भाभी परास्त हो चुके हैं। उन्हें भी यह लगने लगा है कि खुशी तो बाजार में बिक रही है। बाजार की शर्त यही है कि खुशी उसी के घर दस्तक देगी जिसकी जेब में दम होगा। बाजार निर्मोही है… निर्दयी है। उसे समाज की बुनियाद से नहीं, चमकते लोगों से वास्ता है, क्योंकि चमकते लोगों के जेब में ‘प्लास्टिक मनी’ है और इसी पैसे से बाजार की चमक है।

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