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दुनिया मेरे आगे: जाल, पाल, चप्पू और नावें

मछुआरे इतने सवेरे ही अपने जाल, पाल, चप्पू और खाने का सामान नावों में लाद कर ‘सागर यात्रा’ पर जाने की तैयारी करने लगे हैं। दूर तक अथाह जलराशि पर तैरती पालयुक्त नौकाओं की आकृतियां फैलते उजास के साथ धीरे-धीरे उभर रही थीं।

सुधीर विद्यार्थी

कुछ समय पहले तिरुवनंतपुरम से कन्याकुमारी के लिए निकला तो केरल हिंदी विद्यापीठ से एक युवा मित्र को साथ ले लिया। दूर तक समुद्र की विस्तारित विशाल अथाह जलराशि। चट्टानों से टकरा कर उछलती-गिरती लहरें। नावों को समुद्र के थपेड़ों से बचा कर ले जाते मछुआरों की आकृतियां। कोई ऊंची लहर आती तो हमें लगता कि नाव अदृश्य हुई, पर कुशल और अनुभवी नाविक पलक झपकते ही उसे बचा कर निकाल ले जाते। सागर पर उनके विजय-संघर्ष का यह दृश्य सचमुच बहुत रोमांच से भरा था। किनारे पर लकड़ी के लट्ठों की सैकड़ों नावें पड़ी थीं, जिन पर मछली पकड़ने के जाल और पाल रखे हुए थे। कुछ देर तक समुद्र को चुपचाप उमड़ते हुए देख कर रामकुमार कृषक की एक कविता की पंक्तियां याद आर्इं- ‘क्या जानूं क्यों उमड़ा होगा पहली-पहली बार समुंदर, बूंद बराबर रह जाता हूं देख तेरा विस्तार समुंदर।’ वहां से विवेकानंद रॉक तक का सफर संक्षिप्त लेकिन मन में सिहरन भर देने वाला था।

हवाएं इतनी तेज थीं कि ठहरना मुश्किल हो रहा था। वहां स्वामी विवेकानंद का भव्य स्मारक था, लेकिन उनका ज्ञान और दर्शन दुकानों के सामानों में तब्दील किया जा चुका है। उनके नाम और चित्रों के स्टीकर, बिल्ले, तस्वीरें और मॉडल के अलावा उनकी तस्वीरों वाली बनियान बेची जा रही थी। लौटने के बाद भी वहां की तस्वीरें दिमाग में घूम रही थीं। देर शाम हम सूर्यास्त देखने समुद्र के किनारे-किनारे दूर तक निकल गए, लेकिन पहाड़ की ओट हो जाने के कारण ठीक से समुद्र के जल में डूबता सूरज देखना संभव नहीं हो पा रहा था। अंधेरे ने अपनी काली चादर फैलानी शुरू कर दी थी और समुद्र की उठती लहरों ने भी जोर पकड़ लिया था। समुद्र के पानी को छूकर आती हवा ने हमारे चेहरों और हथेलियों पर अपना प्रभाव छोड़ दिया था। हम देर तक पानी के बहुत नजदीक बैठे लहरों में धरती को छूने की होड़ को एकटक निहार रहे थे, मानो इस तरह समुद्र की अठखेलियों का रोजनामचा लिखने की तैयारी कर रहे हों। आठ-दस साल का एक बच्चा बार-बार हमारे पास आकर जिद करने लगा कि मैं उससे कुछ सीपियां खरीद लूं। उसे चार रुपए देकर कुछ शंख और सीपियां हमने रूमाल में बांध लीं। हालांकि समुद्र को देखने और महसूस करने में ऐसे मग्न हुए कि वहां से निकलते हुए वह रूमाल वहीं छूट गया। एक दुकान पर खड़े कुछ और खरीदारी कर रहा था कि सीपियों वाला वह लड़का दौड़ता हुआ आया और बोला- ‘आप यह रूमाल वहीं भूल आए थे। मैं आपको देर से तलाश कर रहा हूं।’

मैं हैरान-सा उस लड़के को देखता रह गया। हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसमें वह लड़का और उसकी वह बात हैरान ही कर सकती है। लेकिन फिर लगा कि कहीं कुछ बचा हुआ है। हम ही ठीक से खोज नहीं पाते शायद! सुबह सूर्योदय देखने के लिए समुद्र के तट पर सब तरफ हलचल थी। मछुआरे इतने सवेरे ही अपने जाल, पाल, चप्पू और खाने का सामान नावों में लाद कर ‘सागर यात्रा’ पर जाने की तैयारी करने लगे हैं। दूर तक अथाह जलराशि पर तैरती पालयुक्त नौकाओं की आकृतियां फैलते उजास के साथ धीरे-धीरे उभर रही थीं। पूरी दृश्यावली में बेखौफ मछुआरों की उपस्थिति मनुष्य के जीवन संघर्ष का अनोखा चित्र रच रही थी। तीन-तीन, चार-चार की गिनती में लट्ठों पर बनी नावों में सवार होकर मछुआरे निकल रहे थे। किसी से पूछा तो पता चला कि वे पूरा दिन सागर की बेचैन लहरों पर बिता कर ही घर लौटेंगे। अपने परिवार-बच्चों का पेट भरने के लिए वे हर रोज इसी तरह खतरों से लड़ रहे हैं।

संघर्ष की यही विरासत वे अपने बच्चों को सौंप कर जाएंगे। कुछ मछुआरों के साथ छोटी उम्र के सदस्य भी हैं। वे भी पाल और मछलियां संभालते हुए लहरों से मोर्चा लेने का अभ्यास कर रहे थे। यह समुद्र के स्वाद और उसकी रंगत को जानने की प्रक्रिया है। समुद्र की सतह से धीरे-धीरे उभरते लाल गोलाकार सूर्य का अद्भुत दृश्य, मानो वह समुद्र के पानी में रात भर स्नान करके पूरे दिन की यात्रा पर जाने के लिए निकल रहा हो। स्मृतियों में बसी ये तस्वीरें मेरी आंखों में हाल की कुछ खास तस्वीरों में घुलने-मिलने लगीं, जो हाल में केरल में आई बाढ़ के दौरान दिखीं। उन तमाम मछुआरों ने अपनी नावें ट्रक पर लादीं और बाढ़ में डूबे इलाकों में चल पड़े… डूब रहे लोगों को बचाने… बिना किसी स्वार्थ के..! यहां तक कि उन्होंने सरकार की ओर से मदद के तौर पर कुछ राशि स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया। बहरहाल, उस दिन समुद्र की नीली लहरें शाम की तरह बेचैन नहीं हुई थीं। बादल घिरे होने से सूर्योदय का दृश्य फीका था, लेकिन उड़ते पक्षी इस सौंदर्य में अनोखी रंगत भर रहे थे!