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दुनिया मेरे आगे: हीनता की बोली

यह सच है कि राजनेताओं से किसी भाषाविद या लेखक की तरह अलंकृत भाषा के उपयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हें भी यह गलतफहमी होती है कि उन्हें सुनने वाला वर्ग आज भी केवल भदेस जुबान बोलने-सुनने वाला दर्शक है। इसलिए वे अपने भाषाई स्तर को लगातार नीचे लिए जा रहे हैं।

Author May 9, 2018 03:44 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

रजनीश जैन

मनोविज्ञान कहता है कि जब सामान्य बोलचाल में हम अपशब्दों का प्रयोग करने लगते हैं तो इसका सीधा मतलब यही होता है कि हमारा शब्दों का संग्रह खाली होने लगा है। हमने भाषा को गंभीरता से लेना छोड़ दिया है। आमतौर पर अपशब्दों के इस्तेमाल को समाज के एक खास वर्ग की पहचान के साथ नत्थी कर दिया जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि यह किसी वर्ग विशेष की स्वीकृति का मोहताज नहीं है। हम अक्सर सभ्य और सुशील लगने वाले लोगों को भी धड़ल्ले से इनका प्रयोग करते देखते हैं। मनोविज्ञान ही हमें बताता है कि खीझ, गुस्सा, अहंकार, निराशा और हीनता की अवस्था में अक्सर मनुष्य अपना भाषाई संतुलन खो बैठता है। नतीजतन, इस तरह के लोगों को सामाजिक रूप से अच्छा प्रतिसाद नहीं मिलता। अपशब्दों का प्रयोग करने वाले को लगता है कि इनका इस्तेमाल किए बगैर उसकी बात ठीक ढंग से समझी नहीं जाएगी। ऐसे लोग अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल इसलिए भी करते हैं कि इसी में उन्हें अपने व्यक्तित्व की सार्थकता नजर आती है। मनोविज्ञान इस तरह के व्यक्ति को मनोविकार से ग्रसित मानता है, क्योंकि अपने शब्दों से दूसरे लोगों को आहत करते हुए उसे किसी तरह का अपराध बोध नहीं होता, बल्कि इसके उलट उन्हें एक ‘गरिमामयी’ आवेग की अनुभूति होती है। सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मों के अभिनेता धर्मेंद्र ने एक लोकप्रिय फिल्म में साधारण-सा संवाद बोला था- ‘कुत्ते… मैं तेरा खून पी जाऊंगा!’ वह फिल्म आए काफी साल बीत चुके हैं। लेकिन विडंबना यह है कि किसी के प्रति अपना आक्रोश जाहिर करने के संदर्भ में यह संवाद आज तक गूंज रहा है। यहां तक कि धर्मेंद्र की आवाज में संवादों की मिमिक्री करने वाले कलाकार भी इस संवाद को खासतौर पर बोलते हैं और इस पर उन्हें खूब तालियां भी मिलती हैं। हालांकि गुस्से में किसी व्यक्ति की तुलना पशुओं से करना आम बोलचाल का हिस्सा रहा है। लेकिन इस संवाद के बाद उसके असर में इजाफा हुआ। इस दौर में सिनेमा हॉल में दर्शकों के लिए एक किफायती श्रेणी ‘थर्ड क्लास’ हुआ करती थी, जिसमें आमतौर पर गरीब और अनपढ़ लोग फिल्म देखते थे। धर्मेंद्र के अंदाज में बोले जाने वाले डायलॉग या संवाद पर सबसे ज्यादा सीटियां इसी तरफ से सुनाई देती थीं। पढ़ा-लिखा तबका इसे ‘चवन्नी छाप’ प्रतिक्रिया मानता था। जबकि अलग-अलग सामाजिक तबके अपनी जीवन-दशा के मुताबिक ही मनोरंजन के तौर-तरीके विकसित और निर्धारित करते हैं।

समाज के सामान्य व्यवहार, बातचीत और संवाद में घुले कुछ अपशब्द फिल्म के परदे पर पहुंचे या वहां से आगे अपशब्दों की परंपरा कब राजनीति में प्रवेश कर गई और किसने पहली बार इसका उपयोग किया, इसके बारे में स्पष्ट रूप से बताना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन अस्सी-नब्बे के दौर में अपनी भाषाई समृद्धता और शैली से क्या सत्ता और क्या विपक्ष, सभी का मन मोह लेने वाले जननायकों की सूची लंबी है। अलग-अलग दलों और विचारधाराओं से जुड़े कई बड़े नेता न केवल संसद, बल्कि सार्वजनिक सभाओं में भी सिर्फ भाषण देने की प्रभावी शैली और गंभीर भाषा की वजह से ध्यानपूर्वक सुने जाते थे। लेकिन बीते एक दशक के दौरान हमारे नेताओं की भाषा में लगातार हल्कापन महसूस किया जाने लगा है। यह सच है कि राजनेताओं से किसी भाषाविद या लेखक की तरह अलंकृत भाषा के उपयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हें भी यह गलतफहमी होती है कि उन्हें सुनने वाला वर्ग आज भी केवल भदेस जुबान बोलने-सुनने वाला दर्शक है। इसलिए वे अपने भाषाई स्तर को लगातार नीचे लिए जा रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं, जिनमें जानी-मानी हस्तियां बेहिचक कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर देती हैं जो विवाद का विषय बनते हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं होती कि इससे समाज के किसी खास तबके को अपमानित किया जा सकता है। दूसरी ओर, अवाम पक्ष-विपक्ष को हमेशा आमने-सामने शाब्दिक तलवारबाजी करते देखना चाहता है।

दरअसल, कई लोगों के कई व्यवहार और अभिव्यक्तियां सामाजिक प्रशिक्षण से निर्धारित होती हैं। लेकिन एक सभ्य समाज में कोई नहीं चाहेगा कि राजनीतिक दलों की तुलना किसी वैसे कबीले से की जाए, जो भाषा की हिंसा के बीच जीता हो। हम अपने नेताओं से ज्यादा कुछ नहीं, सिर्फ शालीनता की उम्मीद करते हैं कि वे बोलते समय सोच-समझ कर बोलें। इसलिए भी कि उनकी बातें थोड़े ही वक्त में तीव्रगामी संचार माध्यमों के साथ चारों ओर गूंजने लगती हैं। उसकी प्रतिध्वनि सोशल मीडिया के मंचों पर कई गुना शाब्दिक गंदगी फैलाने लगती है। आजकल अक्सर निदा फाजली याद आते हैं, जिन्होंने कभी इन लोगों के लिए ही तंज किया था- ‘मेरे मुल्क की तालीम कहां तक पहुंची/ जो भी गालियां थीं बच्चों की जुबां तक पहुंची।’

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