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दुनिया मेरे आगे: गुणवत्ता का पाठ

शिक्षकों के साथ समय-समय पर बैठकें आयोजित करना एक अच्छा विचार है। इन बैठकों के दौरान स्कूली स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को अन्य शिक्षक साथियों के लिए सत्र आयोजित करने के अवसर दिए जाने चाहिए और इन सत्रों के लिए उनकी तैयारी में भी आवश्यकतानुसार मदद की जाए।

Author September 22, 2018 3:58 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

विपिन चौहान

सीखना तब बेहतर होता है जब सीखने की इच्छा होती है और क्षमता संवर्धन होता है सीखने से। यानी क्षमता संवर्धन तभी बेहतर होगा जब सीखने की इच्छा होगी। लेकिन इस रिश्ते को कितना समझ पाए हैं हम। शिक्षकों के क्षमता संवर्धन के संदर्भ में इसे और बेहतर तरह से समझा जा सकता है। यों शिक्षकों की क्षमता में इजाफे के लिए पिछले दो दशकों से राष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रम चल रहे हैं। लेकिन कई बार शिक्षक इसे लेकर उत्साहित दिखाई नहीं देते हैं। शायद यही कारण है कि स्कूलों में शिक्षकों की काबिलियत का न तो पूरा इस्तेमाल हो पा रहा है और न ही अपेक्षित नतीजे देखने को मिल रहे हैं।

इसकी तह में जाएं तो कुछ ऐसा महसूस होता है कि शिक्षकों को जो प्रशिक्षण और जिस तरह के मशविरे दिए जा रहे हैं, वे उनकी जरूरत नहीं हैं। उनकी जरूरत और उन्हें दिए जा रहे सहायक तंत्र में एक बड़ा फर्क नजर आता है। इसी वजह से यह सहायक तंत्र उतना प्रभावी नहीं है, जितना इसे होना चाहिए। शिक्षकों के क्षमता संवर्धन की कोशिश में लगे लोगों को इस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। यह शिक्षकों से संवाद के साथ-साथ स्कूलों में जाकर उनकी जमीनी जरूरतों को समझे बिना संभव नहीं है। इससे न केवल उन्हें शिक्षकों की जमीनी चुनौतियों को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि शिक्षकों के क्षमता संवर्धन से जुड़े व्यक्तियों और शिक्षकों के बीच सकारात्मक रिश्ते बनाने में सार्थक रूप से उनकी मदद मिलने की भी गुंजाइश बनेगी।

इससे एक बात और होगी कि शिक्षक प्रशिक्षक स्कूल भ्रमण के दौरान प्रत्येक शिक्षक की अकादमिक चुनौतियों को समझ सकेंगे और उनकी सूची बना सकेंगे। ऐसे शिक्षकों को चिह्नित कर सकेंगे जो सिर्फ चुनौतियों का रोना नहीं रोते, बल्कि सचमुच उनके निदान पर काम करना चाहते हैं। ऐसे शिक्षकों के समूह बना कर जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षण और कार्यशालाएं कर पाना एक बेहतर तरीका हो सकता है। यह भी सोचा जा सकता है कि शिक्षकों के लिए क्षमता संवर्धन कार्यक्रम आयोजित करने से पहले सभी विषय-वस्तुओं पर सत्रों की आवश्यकता के अनुसार गहन तैयारी करके अपनी टीम के बीच इसका प्रदर्शन भी किया जाए, ताकि सभी प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके। इस दौरान सभी शिक्षक-प्रशिक्षक अगर एक टीम के रूप में काम करें तो एक-दूसरे की चुनौतियों को समझने और उनके समाधान तक पहुंचने में आसानी होगी। इस तरह के सामूहिक प्रयासों से बच्चों के सीखने की प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाना शायद ज्यादा आसान हो सकेगा।

शिक्षकों के साथ समय-समय पर बैठकें आयोजित करना एक अच्छा विचार है। इन बैठकों के दौरान स्कूली स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को अन्य शिक्षक साथियों के लिए सत्र आयोजित करने के अवसर दिए जाने चाहिए और इन सत्रों के लिए उनकी तैयारी में भी आवश्यकतानुसार मदद की जाए। शिक्षकों द्वारा आयोजित किए जाने वाले ये सत्र शिक्षकों के बीच एक दूसरे से सीखने के मंच विकसित करने में भी मदद करेंगे। समय-समय पर शिक्षकों के लिए कुछ अन्य रचनात्मक गतिविधियां भी आयजित की जाती रहें तो शिक्षकों और प्रशिक्षकों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनेंगे और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया मशीनी न होकर ज्यादा मानवीय हो सकेगी। इस तरह की गतिविधियों में क्रिकेट मैच, कविता-कहानी सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकता है।

हमारे कुछ शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक प्रशिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति होने पर स्थानीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को प्रशिक्षणों के लिए विशेषज्ञ के रूप में चुना जा सकता है। पूरी संभावना है कि यही शिक्षक आगे चलकर ऐसे स्वैच्छिक मंच के विकास में सहयोग कर सकते हैं जहां आपस में मिल बैठ कर एक-दूसरे का अकादमिक सहयोग किया जाए। सभी जरूरी विषयों और कक्षा-स्तरों की गतिविधियां इस तरह से आयोजित होनी चाहिए, ताकि शिक्षक महसूस करें कि ये सीधे-सीधे उनके व्यावसायिक जीवन से जुड़ी हुई हैं। बेहतर प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहन पत्र के माध्यम से उनका उत्साहवर्धन करना अच्छा विकल्प हो सकता है। दरअसल, ये सब प्रक्रियाएं अंदरूनी प्रोत्साहन का काम करती हैं। इन सब प्रक्रियाओं के चलते शिक्षक खुद ही अपनी रुचि के मुताबिक क्षमता संवर्धन के लिए तैयार होंगे। शिक्षक प्रशिक्षणों में पिछले काफी समय से नवाचारी प्रक्रियाओं का अभाव-सा रहा है। लंबे समय से प्रशिक्षण की एक जैसी प्रक्रियाएं ही अपनाई जाती रही हैं, जिनके चलते इन प्रशिक्षणों में रची-बसी मूल भावना खत्म हुई है और इसकी स्थिति एक निष्क्रिय-सी परंपरा के रूप में ही रह गई है। जरूरत है कि स्थानीय अवसरों और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर कुछ नवाचारी प्रक्रियाएं आती रहें जो शिक्षकों को अपनी क्षमता संवर्धन के प्रति सचेत करें और शिक्षकों की स्वेच्छा को केंद्र में रखते हुए उन्हें खुद के पेशे को संवारने के अधिक से अधिक अवसर दें।

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