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दुनिया मेरे आगे: निंदा का मानस

पीठ पीछे दूसरों की बुराई करने वाली बातें देखने में लोगों के साधारण व्यवहार में घुली-मिली लगती हैं। लेकिन यह मनोविज्ञान से जुड़ी बात है। एक बार हमारे एक अधिकारी ने एक मनोविद को भोजनावकाश के दौरान हम सबको संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था।

Author May 10, 2018 04:44 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर

विलास जोशी

दफ्तर में मेरे काम करने की जगह के पास ही बाकी कई लोग दिन का भोजन साथ मिल कर करते थे। खाने के दौरान वहां मौजूद महिला और पुरुष कर्मचारी आपस में बात भी करते थे। इधर-उधर की कुछ बातों के बाद किसी वैसे कर्मचारी की कमियों पर बातें शुरू हो जातीं, जो उस दिन अनुपस्थित होता था। निशाने पर आमतौर पर महिला कर्मचारी ही होती थीं। ऐसी स्थिति आमतौर पर रोजाना ही होती थी। एक दिन मैंने एक कर्मचारी से अलग से बात की। मैंने कहा कि आप लोग रोज किसी ऐसे कर्मचारी की आपस में शिकायत करते हैं, जो मौजूद नहीं होता है। क्या आपने सोचा है कि जिस दिन आप अवकाश पर होते हैं, उस दिन आपकी बुराई होती है? शायद मेरी बातों का उन पर असर हुआ और उन्होंने अगले दिन बाकी सबको भी यह बात बताई। मुझे अच्छा लगा कि उस दिन के बाद भोजन अवकाश के दौरान बातचीत का विषय बदल गया और उन लोगों ने इस तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए मेरे प्रति आभार प्रकट किया। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कार्यालय चाहे सरकारी हो या निजी क्षेत्र का, सब जगह किसी न किसी रूप में गुटबाजी और राजनीति चलती ही रहती है। लेकिन जब कोई कर्मचारी अपने दिमाग का कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल करता हो और उससे दूसरे लोगों को तकलीफ होती हो तो उसका इलाज भी करना पड़ता है। हमारे कार्यालय में एक कर्मचारी थे। उनकी एक विशेषता थी। वे रोजाना सुबह दस बजे कार्यालय आने के बाद अपनी कुछ फाइलें टेबल पर बिछा देते, फिर अपनी सीट से उठ कर पड़़ोस के अनुभाग के एक अन्य कर्मचारी के पास जाकर बैठ जाते। उनके पास बैठते ही वे हमारे अनुभाग के दूसरे कर्मचारी की बुराई करने लगते। कुछ देर उनके पास बैठने के बाद वे उठते और सामने वाले अनुभाग में एक महिला कर्मचारी के पास जाकर बैठ जाते और उसकी शिकायत करने लगते, जिसके पास से थोड़ी देर पहले वे उठे थे। फिर एक अन्य अनुभाग में जाकर पिछले वाले की बुराई शुरू कर देते। दोपहर के भोजन तक उनका यही क्रम चलता रहता था। लेकिन मजेदार यह था कि जिनके बारे में शिकायत की जाती, वे सभी एक दूसरे को बताते थे कि वह मेरे पास आकर तुम्हारी बुराई कर रहा था। इस तरह समझा जा सकता है कि हर व्यक्ति की बुराई करने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता कितनी थी और कितना उसे मनोरंजन की तरह देखा जाता था। एक दिन मैंने जतन करके एक साथ सबको बिठाया और सबके सामने ही उस व्यक्ति की उसकी आदत के लिए जम कर खिंचाई की। उस दिन उसने हम सबसे हाथ जोड़ कर माफी मांगी और हमें आश्वस्त किया कि अब वे कभी किसी की बुराई नहीं करेंगे।

पीठ पीछे दूसरों की बुराई करने वाली बातें देखने में लोगों के साधारण व्यवहार में घुली-मिली लगती हैं। लेकिन यह मनोविज्ञान से जुड़ी बात है। एक बार हमारे एक अधिकारी ने एक मनोविद को भोजनावकाश के दौरान हम सबको संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था। उन्होंने अपनी बात शुरू करते ही कहा कि यहां उपस्थित आप सब लोग यकीनन बहुत अच्छे लोग हैं। इसलिए मैं आप सबकी परीक्षा लेना चाहूंगा। फिर उन्होंने कार्यालय के सभागार में बैठे सब लोगों को एक-एक कोरा कागज दिया और कहा कि मेरा सवाल बहुत आसान है। आपको इस कोरे कागज पर अपने किसी रिश्तेदार या मित्र की पांच-पांच बुराइयां लिखनी हैं और इसके लिए मैं आपको पांच मिनट का समय दे रहा हूं।

यकीन मानिए, कार्यालय के सभागार में बैठे हम सब लोगों ने पांच मिनट की जगह सिर्फ तीन मिनट में ही अपने किसी रिश्तेदार या मित्र की पांच बुराइयां लिख कर कागज उनके हाथ में दे दिया। इसके बाद उन्होंने हमें वही कागज फिर वापस करते हुए कहा कि अब आपको अपने किसी रिश्तेदार या मित्र की पांच या इससे अधिक अच्छाइयां इस कागज के पिछले भाग में लिखनी हैं। इसके लिए भी आपके पास पांच मिनट का समय है। इस बार कुछ खास हुआ। पांच तो क्या, छह मिनट में भी हम लोग अपने किसी रिश्तेदार या मित्र की पांच अच्छाइयां नहीं लिख पाए। तब मनोविद महोदय ने कहा- ‘अब आप समझ गए होंगे कि किसी की गैरमौजूदगी में उसकी बुराई करना कितना आसान है, जबकि अच्छाइयों पर गौर करना और उसे स्वीकार करना कितना मुश्किल। भोजनावकाश के दौरान के कई अनुभवों से गुजरने के बाद उसके मनोवैज्ञानिक पहलू पर बात के बाद मिले ये अनुभव मेरे जीवन के अविस्मरणीय मोती हैं। सच है कि जो लोग सकारात्मक सोच रखते हैं, उनके लिए किसी की अच्छाई खोजना बिल्कुल मुश्किल काम नहीं होता। जबकि जो लोग नकारात्मक सोच रखते हैं, वे अक्सर किसी न किसी की बुराई ही करते रहते हैं। इंसान वही है जो किसी की तारीफ करने के मामले में कम से कम शब्दों से गरीब न हो।

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