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दुनिया मेरे आगे: सड़क पर पन्ने

बेहद अपनी-सी लगती है यह सड़क, पर यह बुनता हुआ खयाल एकदम से टूट जाता है। जैसे ही यह भान होता है कि इस सड़क के मायने स्त्री के लिए क्या हैं! क्या ये मायने स्त्री के लिए भी वही हैं जिनके बारे में मैंने भी जिक्र किया? ठहर कर सोचें तो क्या कोई पथिक स्त्री जैसा लगता है?

Author August 18, 2018 1:27 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Pixabay)

रात के अंधेरे में शांत चौड़ी सड़क को दौड़ते देखने का अपना एक अलग अनुभव है। अक्सर जब भी कभी रात में कहीं आना या जाना होता तो मन रात के सन्नाटे में सड़क के किनारे पेड़ों के नीचे खड़े होने और देर तक रुकने की फैंटेसी या कल्पना करता है, जहां दूर कहीं स्ट्रीट लाइट का एक धब्बा-सा पड़ा है। मैं बचपन में अक्सर ऐसी जगहों को देख कर सोचती थी कि यहां रुकना कैसा होता होगा, कैसा लगता होगा… क्या यहां से कोई और भी गुजरता होगा… क्या यहां कोई जानवर भी आता होगा… यह जगह सुबह होने पर कैसी दिखती होगी! इस तरह की कल्पना करते-करते अक्सर हम शहरों में आ जाते थे। शहरों की भी अपनी दुनिया है चमक और चकाचौंध से भरी हुई। आमतौर पर सड़क शहरों तक आते-आते शोर में तब्दील होती हुई दौड़ने लग जाती थी। इस शोरगुल में फैंटेसी कहीं खो जाती थी।

पिछले दिनों लंबे संघर्षों के बाद मैंने पहली बार अपने शहर से किसी दूसरे शहर में जाने का मौका आखिरकार खोज निकाला। मन यह सोच कर थोड़ा असमंजस और विस्मय में था कि पहली बार अकेले रात का सफर बस में कितना रोमांचक होगा… सब ठीक तो रहेगा न! बहरहाल, विचारों की इस ऊहापोह में यात्रा शुरू हो जाती है। रात में शहर से निकलते ही सड़क फिर शांत हो गई और हवा के झोंके चेहरे को छूकर गुजरते और अपना ठंडा अहसास छोड़ते हुए जाने लगे। और आंखें शांत दौड़ती सड़क पर गड़ गर्इं। साथ चलते होने का अहसास देते पेड़ों से झांकती हुई रोशनी सड़क के किसी और ही रूप को चित्रित करने लगती। उस पल लगा कि जीवन में सड़क मात्र कंकड़-पत्थर से बनी हुई कोई जगह नहीं है, बल्कि यह डगर है किसी कामगार को सुबह काम पर ले जाकर वापस घर लौटने और किसी अपने को खुशी बांटने की। यह पगडंडी है खुली आंखों से देखे गए सपनों को पूरा करने की। यह उस रास्ते का प्रतीक भी है, जिस पर अक्सर पांवों के छाले सत्ता से अपने हक और शोषण से मुक्ति की लड़ाई का सबब बनते हैं। ये पथिक के लिए किनारे हैं और राही के लिए मार्गदर्शन भी। किसी भटके की राह है और किसी बेघर के लिए एक रात का गुजारा!

बेहद अपनी-सी लगती है यह सड़क, पर यह बुनता हुआ खयाल एकदम से टूट जाता है। जैसे ही यह भान होता है कि इस सड़क के मायने स्त्री के लिए क्या हैं! क्या ये मायने स्त्री के लिए भी वही हैं जिनके बारे में मैंने भी जिक्र किया? ठहर कर सोचें तो क्या कोई पथिक स्त्री जैसा लगता है? क्या कोई बेघर जिसने सड़क को अपना सहारा बनाया हो, वह स्त्री जैसी शक्ल का लगता है? यह रात स्त्री के लिए भी वैसी ही लगती है क्या? क्या इसके जो मायने किसी पुरुष के लिए हैं, वे एक औरत के लिए भी हैं? दूर-दूर तक स्मृतियों को फैलाने पर भी मन गहरी निराशा से भर जाता है। सोचती हूं कि अगर इन सभी प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ में हो तो इतना लंबा समय और संघर्ष न लगता इस तरह अकेली यात्रा पर निकलने के लिए।
अक्सर अपने आसपास के फिक्रमंद लोगों को फिक्र जताते हुए सुनती हूं कि अमुक जगह का माहौल ठीक नहीं… अमुक जगह स्त्री के लिए ‘सुरक्षित’ नहीं है। कुछ पुरुष मित्रों को कहते हुए सुनती हूं कि अरे, कुछ नहीं रखा है रात की सैर में… हमसे पूछो कि शहरों की सड़कें और रात का अंधेरा सिवाय वीरानगी के कुछ नहीं देगा, उस वक्त जी में आता है कि उनसे कहूं कि क्यों भई, जीवन और दुनिया को कब तक सिर्फ तुम्हारी नजरों से देखते रहेंगे? अंधेरे की वीरानगी को महसूस करने और तय करने का हक मुझे मेरी नजरों से भी मिलना चाहिए। और तुम सब क्यों आमादा हो मुझे हमेशा मात्र ‘आभासी’ अनुभवों में धकेलने के लिए?

आखिरकार प्रकृति में छाई धुंध, उसकी भोर और रात को महसूस करने का मेरा भी हक है। लेकिन फिर लगता है कि असुरक्षा की परत से लिपटी हुई परतंत्रता की बेड़ियां इतनी मजबूत हैं कि घर की चारदिवारी और गली-मोहल्ले के बने हुए सुरक्षा के घेरे भी इनसे टूट जाते हैं। यह सोच कर मन पसीज जाता है और सड़क के साथ जो रिश्ता अभी-अभी बना था, वह कमजोर पड़ने लगता है। अचानक से शांत सड़क एक भयावह कोलाहल मन में पैदा करने लगती है। मद्धिम सांस उद्विग्न-सी होने लगती है। लेकिन क्षण में ही फिर से ठंडी हवा चेहरे को छू कर गुजरती है। सड़क के साथ चलते लगते पेड़ों के बीचों-बीच बना अंतराल मन में आए कई अंतरालों को पाटने लगता है। पत्तियों से झांकती रोशनी और सड़क के हमेशा आगे बढ़ने का स्वभाव एक बार फिर जेहन में आता है और मन में सपनों का बुनना फिर शुरू हो जाता है।

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