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दुनिया मेरे आगे: न्योते का पत्र

कभी मैं शासकीय आवास में रहता था। मेरे आवास के पास ही उसका एक टपरा था, जिसमें उसकी छोटी-सी लॉन्ड्री यानी कपड़े की धुलाई करने की दुकान थी। पूरी कॉलोनी के कपड़े उसी की लॉन्ड्री में धुलाई के लिए जाते थे। दस-ग्यारह वर्ष पहले शासकीय आवास खाली करा लिए गए।

Author July 7, 2018 03:40 am
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

हेमंत कुमार पारीक

कभी मैं शासकीय आवास में रहता था। मेरे आवास के पास ही उसका एक टपरा था, जिसमें उसकी छोटी-सी लॉन्ड्री यानी कपड़े की धुलाई करने की दुकान थी। पूरी कॉलोनी के कपड़े उसी की लॉन्ड्री में धुलाई के लिए जाते थे। दस-ग्यारह वर्ष पहले शासकीय आवास खाली करा लिए गए। वजह बताई गई- पुनर्निर्माण। इसके चलते कुछ लोग अपने-अपने घर चले गए और कुछ ने नए आवास आबंटित करा लिये। इस कारण उसे भी वहां से हटना पड़ा। लेकिन चूंकि उसकी रोजी-रोटी का सवाल था, इसलिए उसने दूसरी जगह ढूंढ़ी और अपना टपरा वहां जाकर लगा लिया। नए आवास वहां से लगभग एक-दो फर्लांग की दूरी पर थे, इसलिए वह साइकिल से आने लगा था। उन सब ग्राहकों के घर जाता जहां से पहले उसे कपड़े मिला करते थे। ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। वे सब उसके निश्चित ग्राहक थे और उनसे उसके परिवार की तरह के संबंध हो गए थे। जिस तरह पारिवारिक डॉक्टर हुआ करते हैं वैसे ही वह पारिवारिक लॉन्ड्रीवाला था।

कुछ दिन बाद उसने एक पुराना स्कूटर खरीद लिया था। बड़ा खुश था। आते ही उसने स्कूटर के साथ खुशखबरी और दी- ‘सर, मेरे लड़के की शादी है।’ थैले में रखा निमंत्रण पत्र निकाल कर मुझे देते हुए बोला- ‘जरूर-जरूर आइएगा!’ बिलकुल साधारण कार्ड था। लेकिन एक बात पर मैंने गौर किया। कार्ड के ऊपर छोटा-सा पाउच यानी प्लास्टिक की थैली चिपकी थी। उसमें हल्दी और चावल रखे दिख रहे थे। हल्दी और चावल देखते ही मुझे पुराना वक्त याद आ गया। उस समय छोटा या बड़ा, कोई भी, शादी का निमंत्रण देने आता तो उसके साथ सहायक के रूप में एक व्यक्ति आता था। दरवाजे के अंदर घुसने के पहले वह देहरी पर हल्दी और चावल रखना नहीं भूलता था। फिर शादी में आने की मनुहार करता। हल्दी-चावल शादी में सम्मानपूर्वक निमंत्रित करने की एक प्रथा थी। उसके बाद एक-दो बार विभिन्न कार्यक्रमों के लिए वही सहायक बुलाने आता था। अब समय बदला है, दूरियां बढ़ गई हैं। तात्कालिक संबंधों पर निर्भर करने लगा है सब। हैसियत के अनुसार निमंत्रण दिए जाने लगे हैं। कुछ समय पहले एक विचित्र वाकया हुआ। मेरे विभाग में कार्यरत एक सहकर्मी के घर लड़की की शादी थी। उन्होंने तीन तरह के कार्ड छपवाए थे। हरे, नीले और पीले। हरे कार्ड वर्ग-तीन और वर्ग-चार वाले कर्मचारियों के लिए, नीले कार्ड वर्ग-एक के लिए और पीले कार्ड अफसरों और बड़े ओहदे वालों के लिए थे। मैंने ऐसा पहले कभी देखा नहीं था। मैंने उनसे कारण पूछा तो वे कहने लगे कि कार्ड महंगे पड़ते हैं। तब मैंने उनसे कहा था कि वर्ग का फर्क दफ्तर तक सीमित है जनाब, बाहर नहीं। अगर औसत मूल्य में कार्ड छपवाते, तो क्या फर्क पड़ता? शादी में कार्ड का उतना महत्त्व नहीं होता, निमंत्रित लोगों को देखते हैं लोग। वे कुछ बोले नहीं, मुस्करा कर रह गए।

लेकिन अब मोबाइल के आने के बाद तो दूरियां और बढ़ गई हैं। पहले लोग शादी के पूर्व लड़की और लड़का पसंद करने के लिए देखने जाते थे। परिवार के बड़े-बुजुर्ग के साथ रिश्ते को ठोंक-बजा कर देखते थे। पर अब इंटरनेट जिंदाबाद! बहुत सारी एजेंसियां आ गई हैं बाजार में। बहुत से ‘डॉट कॉम’ पैदा हो गए हैं। विज्ञापन छपने लगे हैं। और वॉट्सऐप तो है ही। कहीं जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। बायोडाटा देखिए और आगे बढ़िए। वरना आमने-सामने बातें होती थीं। लड़की वाले लड़के वाले के घर जाते थे और लड़के वाले लड़की वालों के घर। दोनों परिवारों को एक दूसरे की पूरी जानकारी मिलती थी। इस प्रकार शादियां तय हो जाती थीं। लेकिन अब रिश्ते वॉट्सऐप पर तय होने लगे हैं। ‘डॉट कॉम’ का यह चलन शायद उस विज्ञापन की देन है जो कभी फरीदाबाद से दिल्ली जाते समय रेलवे लाइन से लगी दीवार पर देखने को मिलता था। कई साल तक वह लिखा दिखता रहा- ‘शादियां ही शादियां, मिलिए…।’ उस समय फोन नंबर हुआ करता था। उस विज्ञापन को देख अब भी हंसी आती है। पर क्या पता था कि ऐसा जमाना भी आने वाला है, जिसमें शादियां इंटरनेट पर तय होने लगेंगी।

कुछ दिन पहले मोबाइल पर एक मैसेज आया था। शादी में निमंत्रण के संबंध में था। ठीक वैसे ही, जैसे दीगर दूसरे आते हैं। मैंने पहले की तरह हल्के में लिया। हालांकि वे लोग नजदीकी संबंधी थे। लेकिन मैं शादी में नहीं गया। कुछ दिन बाद मेरा उनसे आमना-सामना हुआ। शिकायती लहजे में बोले, ‘आप शादी में नहीं दिखे? मेरे बेटे की शादी थी। मैंने ऐप पर भी आपको निमंत्रण भेजा था!’ मैं क्या जवाब देता! वह कपड़ों की धुलाई करने वाला व्यक्ति मेरे जेहन में घूम गया जो मेरा कुछ नहीं था, पर सब कुछ था। हाथ में निमंत्रण कार्ड लिये खड़ा था और उस कार्ड पर चिपके प्लास्टिक के एक छोटे-से पाउच में एक रिश्ते के साथ हल्दी और चावल बंद थे।

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