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दुनिया मेरे आगे: खोते हुए गांव

गांव वालों का जीवन सड़क और नए उपकरणों से थोड़ा आसान तो हुआ, पर बुनियादी सुविधाएं आज भी नहीं थीं। गांव में कहने को अस्पताल था, लेकिन उसमें कोई सुविधा नहीं थी। इलाज के लिए लोगों को शहर ही जाना पड़ता है।

Author July 20, 2018 1:40 AM
प्रतीकात्‍मक फोटो

तनिष्का वैद्य

कई साल बाद गांव जाने का मौका मिला था। जब मुझे इस बारे में पता चला, तब से ही मन में खुशी की लहर दौड़ गई थी। आंखों में बचपन की मौज-मस्ती के वे दिन घूमने लगे थे, जब बाकी दुनिया से कोई लेना-देना नहीं होता था। इतने वर्षों बाद वहां वापस जाना जहां हर साल की गरमी बीतती थी, मन को उल्लास से भर रहा था। बचपन में हमें गांव जाना इसलिए बहुत रास आता कि वहां हम सभी भाई-बहन मिल कर खूब मस्ती करते थे। मामा और मौसी के बच्चों के साथ गांव के और भी बच्चे। असल में वहां रोज-रोज के उबाऊ होमवर्क की चिंता भी तो नहीं रहती थी! हमें अपने-अपने मामा के घर से ज्यादा आसपास के दूसरे घरों में रहना पसंद था। उनके बच्चे भी हमारे साथ धमाल मचाते रहते थे, लेकिन वहां हमें कोई डांटता-फटकारता नहीं था और सुबह-शाम का वक्त तो गांव के पास के खेतों और छोटे-से तालाब के आसपास ही गुजरता था। दोपहर होने तक आम के पेड़ के नीचे अलग-अलग खेल खेलना और दोपहर में गरमी बढ़ते ही घर जाकर धमा-चौकड़ी हमारा रोज का काम था।

मुझे गांव जाना शायद इसलिए भी पसंद था कि वहां का प्राकृतिक वातावरण मन को बहुत सुकून देने वाला होता है। वहां के पेड़ों पर हमारे लिए बहुत-से मन ललचाने वाले फल होते थे। कच्ची केरी, जामुन, करौंदे, खिरनी, खजूर, जंगल जलेबी, चूसने वाले आम तो होते ही थे, दोपहरी में कुल्फी और बर्फ के लड्डू बेचने वाले आवाज लगाते हुए आते। मामी हमारे लिए सत्तू या धानी बनाती तो कभी छाछ या केरी का पना। डामर की पक्की सड़क से गांव के लिए एक कच्ची सड़क मुड़ती थी। पेड़ों के झुरमुट से होते हुए गांव में पहुंचा जाता था। गांव शुरू होते ही पीपल के पेड़ की छाया में खड़ा एक हैंडपम्प। थोड़ा आगे जाते ही मंदिर था। रोज सुबह-शाम वहां ढोलक-मंजीरे पर आरती के सुर गूंजते। उससे आगे सरपंच की हवेली हुआ करती और फिर कतार से सभी घर। यहां लगभग हर घर में गाय-बैल थे।

यह सुहावनी छवि मेरे भीतर बचपन से बसी हुई थी। अब पंद्रह साल बाद गांव जाते हुए पूरा रास्ता उन सुहानी यादों में ही गुजर गया। लेकिन जैसे ही हम गांव पहुंचे तो वहां कच्ची सड़क की जगह पक्की सड़क थी तो लगा कि गांव विकास की राह पर है। उसे देख कर खुशी हुई। लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, तो गांव में सब कुछ अलग-अलग लगने लगा। मामा का घर भी काफी बदल गया था। वहां मटके की जगह आरओ का पानी दिया गया, मिट्टी के चूल्हे की जगह एलपीजी गैस पर रोटियां बन रही थीं तो लगा कि गांव में भी नए उपकरण काम को आसान बना रहे हैं। अब धीरे-धीरे मेरे सारे सुहावने सपने टूटने लगे। छोटी दुकानों पर भी कुरकुरे और वेफर्स के पाउच टंगे हैं। वह तालाब, जो कभी पूरे गांव की प्यास बुझाता था, अब उसकी जगह मकान बन गए थे। एक जिंदा तालाब की मौत हो गई और गांव वालों को समझ नहीं आया कि उसका जीवन और दुनिया के लिए क्या महत्त्व था। तालाब के पास आम का वह पेड़ भी अब वहां नहीं था। प्राकृतिक वातावरण अब पहले जैसा नहीं बचा था। गांव वालों का जीवन सड़क और नए उपकरणों से थोड़ा आसान तो हुआ, पर बुनियादी सुविधाएं आज भी नहीं थीं। गांव में कहने को अस्पताल था, लेकिन उसमें कोई सुविधा नहीं थी। इलाज के लिए लोगों को शहर ही जाना पड़ता है। इतना ही नहीं, गांव में आज भी मिडिल से आगे का स्कूल नहीं है। कई लड़कियां कस्बे तक नहीं जा पातीं तो उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है।

इससे भी बुरी बात यह थी कि अब वहां लोगों के बीच आत्मीयता खत्म-सी होती जा रही है। न पहले जैसा भाईचारा और न ही सुख-दुख में साथ खड़े होने की प्रवृत्ति। परिवारों में दरार पड़ चुकी है, लोगों के लिए रिश्तों से बढ़ कर जमीन-जायदाद और धन-दौलत हो चुके हैं। अब लोगों के मन में इतनी कड़वाहट घुल चुकी है कि उसे मन से निकाल पाना नामुमकिन-सा हो गया है। इस सबके बीच ज्यादातर लोग भी अब शहरों का रुख कर चुके हैं। कुल मिला कर गांव ने विकास तो किया, लेकिन उसका असली रूप कहीं खो गया है। नई नीतियों से गांव में दिखने वाले कुछ विकास कार्य जरूर हुए हैं, पर बुनियादी सुविधाएं नहीं मिली हैं। शहरों से प्रतिस्पर्धा करते हुए गांव में विकास तो हो जाएगा, लेकिन उस प्रतिस्पर्धा में हम न जाने क्या-क्या पीछे छोड़ते हुए खो देंगे। वहां जाकर महसूस हुआ कि गांव में विकास ऐसा हो कि उसका असली रूप कायम रहे, गंध बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को भी महसूस हो सके।

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