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दुनिया मेरे आगे : पूर्वग्रहों का घेरा

दरअसल, समाज में मौजूद अनेक विषमताओं और उनसे जनित अन्यायों को सहज-स्वीकार्य बना कर लोगों के जीवन का हिस्सा बनाने में ऐसी ही कई रूढ़िवादी धारणाओं और पूर्वग्रहों की अहम भूमिका होती है।

Author June 22, 2018 03:14 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

आलोक कुमार मिश्रा

हमारे आसपास मौजूद बहुत सारे लोग बिना किसी अनुभव या ठोस कारण के या महज सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किन्हीं अन्य व्यक्तियों, समूहों, क्षेत्रों, संस्कृतियों आदि से जुड़े लोगों के प्रति अपनी धारणाएं बना लेते हैं और उसी अनुरूप व्यवहार करने लगते हैं। ऐसे अधिकांश विचार या पूर्वग्रह नकारात्मक और गलत ही होते हैं। दरअसल, समाज में मौजूद अनेक विषमताओं और उनसे जनित अन्यायों को सहज-स्वीकार्य बना कर लोगों के जीवन का हिस्सा बनाने में ऐसी ही कई रूढ़िवादी धारणाओं और पूर्वग्रहों की अहम भूमिका होती है। व्यक्तियों और समुदायों को पूर्व निर्धारित नकारात्मक रूढ़ छवियों में कैद करके देखने की प्रवृत्ति न केवल समाज में उन्हें अवसरों और संभावनाओं से वंचित करती है, बल्कि कई बार ऐसे लोग या समुदाय भी अपने आपको ऐसा ही मानने लगते हैं। जैसे नाजी जर्मनी में अल्पसंख्यक यहूदियों के प्रति व्याप्त ऐतिहासिक पूर्वग्रहों और उनके खिलाफ चलाए गए दुष्प्रचार ने जहां बहुसंख्यकों को उनके साथ अमानवीय व्यवहार के लिए प्रेरित किया, वहीं यहूदी समुदाय के बहुत से लोग भी खुद को इसी नजर से देखने लगे। पूर्वग्रह और रूढ़िबद्ध धारणाएं न केवल मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली सोच और व्यवहार को पुख्ता करती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यही सब पुनरुत्पादित भी करती हैं। इसीलिए यह चक्र तोड़ा जाना बहुत जरूरी है।

हमारे देश में ऐसे बहुत से कानून हैं जो जातीय, नस्लीय, लिंग और अन्य आधार पर होने वाले अन्याय और भेदभाव को दूर करने के लिए बनाए गए हैं। इनका कुछ असर भी हुआ है। पर ऐसे गैर लोकतांत्रिक अमानवीय व्यवहारों के पीछे की सोच को मिटाना असली निदान हो सकता है। आलोचनात्मक चेतना और अवसर से लैस सार्वभौमिक शिक्षा व्यवस्था इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। एक शिक्षक होने के नाते मुझे अपनी कक्षाओं में अक्सर ऐसे अवांछित विचारों से जूझने, सवाल उठाने, टकराने और समझ बनाने का अवसर मिलता है। हाल ही में छठी स्तर के सामाजिक विज्ञान की कक्षा में ‘विविधता और भेदभाव’ पाठ के अंतर्गत पूर्वग्रह की संकल्पना पर बात करने के दौरान मैंने बच्चों से पूछा कि क्या वे या उनका परिवार या फिर उनके कोई जानने वाले अपने आसपास मौजूद कुछ लोगों या समुदायों के लिए ऐसे विचार रखते हैं, जिसमें उन्हें औरों से बिल्कुल अलग माना जाता हो, तो एक बच्चे ने कहा कि ‘मेरी गली में एक परिवार है, जिनसे कोई बात नहीं करता। मेरे मां-पिता और दूसरे घरों के लोग भी अपने बच्चों को उनके बच्चों के साथ खेलने से मना करते हैं, क्योंकि वे लोग आतंकवादी हैं!’ मैंने हैरान होकर पूछा कि उसे या उसके परिवार को यह कैसे पता चला तो बच्चे ने कहा कि आसपास के लोग यही कहते हैं और टीवी में भी ऐसा बताया जाता है।
इस दौरान मैंने महसूस किया कि कक्षा में दूसरे समुदायों के भी बच्चे बैठे हुए थे। इस तरह की धारणा का उन पर कैसा असर पड़ रहा होगा? एक शिक्षक के रूप में मुझे इस गलत सोच पर बच्चे को चुप करा देने के बजाय उसे इस पर खुद ही प्रश्न खड़ा करने के अवसर उपलब्ध कराना था। साथ ही पूरी कक्षा को ऐसे पूर्वग्रहों से परिचित करा कर तार्किक आधार पर उन्हें चुनौती देने और नकारने की क्षमता से लैस भी करना था। मुझे एक युक्ति सूझी।

मैंने पूरी कक्षा को संबोधित करते हुए कहा कि ‘आप सब कल्पना करें कि हमारे शहर में पिछले दस-पंद्रह दिन में हुई चोरी या अन्य अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों को पुलिस ने पकड़ा है। संयोगवश पकड़े गए सभी आरोपी मेरे समुदाय के हैं। तो क्या इसके लिए मुझे भी सजा मिलनी चाहिए?’ सभी बच्चे एक साथ बोल पड़े- ‘नहीं।’ मैंने उसी बच्चे से मुखातिब होते हुए जब पूछा कि ऐसा क्यों, तो उसने कहा- ‘सर चोरी या जुर्म आपने नहीं किया है तो सजा आपको क्यों मिलेगी! भले ही वे सभी आपके समुदाय के हों।’ उपयुक्त मौका देख कर मैंने पूछा- ‘फिर बिना किसी गलती के तुम्हारी गली के उस परिवार या समुदाय के बारे में क्या ऐसा सोचना ठीक है?’ अब कक्षा में एक पल के लिए चुप्पी-सी छा गई। सब अपनी ही चिंतन प्रक्रिया द्वारा उस सोच से टकरा रहे थे। धीरे-धीरे सब बच्चे उस परिवार के बारे में व्यक्त की गई सोच को गलत बताने लगे। आखिर इस पूर्वग्रह से सोचने और टकराने के धरातल पर तो वे सब उतर ही चुके थे, जो आगे भी उनकी राह बना सकता है।

सदियों से जमी बहुत-सी रूढ़िबद्ध धारणाओं और पूर्वग्रहों को शिक्षा, जागरूकता और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रसार ने कमजोर किया है। मसलन, महिलाओं और निम्न कही जाने वाली जातियों से जुड़ी बहुत सारी सोच अब भोथरी साबित हो चुकी है। स्वाभाविक मान कर चस्पां की जाने वाली बहुत-सी अयोग्यताएं अवसर मिलते ही काफूर होने लगी हैं। हालांकि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कुछ नए प्रकार के पूर्वग्रह और संकीर्णताएं हाल के दिनों में बलवती भी हुई हैं, जिनमें अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, शरणार्थियों आदि के प्रति बढ़ते दुराग्रहों को आसानी से चिह्नित किया जा सकता है। इन सबका सामना तभी किया जा सकता है जब हमारे बच्चों को ऐसा समाजीकरण और माहौल उपलब्ध हो, जिसमें उन्हें संवेदनशील, साहसी, न्यायप्रिय, आलोचनात्मक चेतना जैसे गुणों से भरपूर व्यक्ति बनने में मदद मिले।

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