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दुनिया मेरे आगे: समझ के पैमाने

ह संतोषजनक है कि अब शिक्षा और स्कूली जगत में इस दृष्टिकोण को अपनाया जाने लगा है। ज्ञान को अब किसी पूर्व निर्धारित उत्पाद की तरह प्रस्तुत किए जाने वाली वस्तु की तरह न देख कर भरपूर अवसर, सक्रिय भागीदारी की प्रक्रिया से निर्मित समझ और व्यवहार के रूप देखा जाने लगा है।

Author August 4, 2018 1:58 AM
(File Photo)

आलोक कुमार मिश्रा

कभी-कभी बच्चे अपनी सहज बुद्धि से ऐसी बात कह जाते हैं या सवाल पूछ लेते हैं जो हम बड़ों को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर देते हैं। हम वयस्क लोग जिंदगी की भागम-भाग में अक्सर इतने समाजीकृत हो जाते हैं कि जो या जैसा होता आ रहा है, उसी के अनुसार जीवन जीने में अपनी सारी ऊर्जा लगाने में लगे रहते हैं। ठहर कर सोचने या सवाल उठाने का न समय है, न आदत। हाल ही में स्कूल से फोन पर खबर आई कि बिटिया को तेज बुखार आ गया है, आकर घर ले जाइए। आनन-फानन में स्कूल पहुंचा। स्कूटर से घर ले जाते हुए रास्ते में मैं लगातार उसकी तबियत के बारे में पूछ रहा था। लेकिन बुखार में भी बिटिया रास्ते में दिखने वाले वाहनों, दुकानों, ट्रैफिक लाइट और लोगों के बारे में सवाल किए जा रही थी। इस छोटी-सी यात्रा में उसने यह अनुभव कर लिया कि जब-जब बड़ी लाल बस के किनारे, पीछे या पास से हमारा स्कूटर गुजरता है, ज्यादा गरमी और ताप का अनुभव होता है। उसने मुझसे पूछा कि पापा, इस बस से इतनी गरमी क्यों निकल रही है? चूंकि यह दिल्ली में चलने वाली सार्वजनिक परिवहन की एसी बस थी इसीलिए मैंने बिना ज्यादा सोचे कह दिया कि एसी होने के कारण बस अंदर की गरमी बाहर निकाल रही है। बिटिया झट से बोल पड़ी- ‘पर पापा यह तो गलत है! अपनी गरमी दूसरों पर क्यों फेंक रहे हैं? इन्हें पुलिस क्यों नहीं पकड़ रही?’

साढ़े पांच साल की छोटी बच्ची के मुंह से ऐसी बात सुन कर मैं हैरान था। एसी का प्रयोग करना दूसरे लोगों के अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है या उन्हें परेशान कर सकता है, इतने महीन रूप से मैंने कभी सोचा नहीं था। हालांकि एसी, फ्रिज जैसे आधुनिक घरेलू उपकरण पर्यावरण या ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार हैं, ऐसा पढ़ और सुन जरूर चुका था। बिटिया की अगली बात ने मुझे और शर्मिंदा कर दिया, जब उसने पूछा- ‘पापा हमने इसीलिए घर में एसी नहीं लगाया है न?’ मैं कोई उत्तर नहीं दे सका। मैंने आर्थिक कारण के अलावा घर में एसी लगाने या न लगाने के किसी अन्य आयाम पर ध्यान नहीं दिया था। लेकिन आज बेटी द्वारा दर्शायी गई चिंता ज्यादा प्रासंगिक लगी और इस स्थिति के लिए मन में बैठी अदृश्य हीनता भी दूर हुई। अब मैं तर्कपूर्ण मनुष्य के रूप में एसी न लगाने के पक्ष में हूं। बच्चे अपनी सरलता, सक्रियता, जिज्ञासु स्वभाव और भलमनसाहत से न केवल अपने लिए ज्ञान निर्माण करते हैं, बल्कि हम वयस्कों को भी नए अनुभव और सोच के सिरे प्रदान करते हैं। एक समाज के रूप में हम वयस्क लोग परिवार, स्कूल, धर्म, कौशल प्रशिक्षण केंद्रों आदि के द्वारा बच्चों को अपनी तरह बनाने के उद्यम में दिन-रात लगे रहते हैं। हममें से अधिकतर लोग ऐसा मान कर चलते रहे हैं कि बच्चे तो कोरे कागज की तरह हैं, जिस पर हमें अपने अनुभवों की स्याही से ज्ञान का लेखन करना है, ताकि वे समाज के उपयुक्त सदस्य बन सकें। वास्तव में यह गैरजरूरी नियंत्रण बच्चों में सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया को बाधित ही करता है।
गौरतलब है कि एक-दो दशक पहले तक भी बचपन इस तरह नियंत्रित और वयस्कों की समझ से हर कदम पर संचालित नहीं था।

मीडिया और संचार संसाधनों की सीमित उपस्थिति, स्कूलों में नंबरों पर ज्यादा जोर न होकर लचीला समय नियोजन, ट्यूशन, हॉबी की कक्षाओं के न के बराबर होने तथा प्रतियोगिता की जगह सहयोग और सहकार की भावना पर समाज में बल दिए जाने से बच्चों का बचपन अधिक स्वतंत्र, स्वनिर्भर और संवादमय था। लेकिन एकल परिवारों के बढ़ते चलन और बाजारवाद के प्रभाव ने स्थिति पलट दी है। आज घर, परिवार, स्कूल और समाज सभी बच्चों के लिए इस तरह के सशक्तीकरण से परिपूर्ण अनुभव सृजित करने में चूकते हुए दिखाई देते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है बच्चों पर विश्वास न करने और गलतियों से सीखने की उनकी क्षमता पर संदेह करने की हमारी समझ। हम बस उन्हें बिना गलती किए अपने जैसा बना देना चाहते हैं या फिर सोची गई भूमिका में ढाल देने में जुटे रहते हैं।

हमें यह मानना होगा कि वे कोरे कागज न होकर अपनी भिन्न सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अनुरूप बहुत कुछ जानते-समझते हैं। उनकी इसी समझ को आधार बना कर हमें सहानुभूतिपूर्वक ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में उन्हें शामिल करना चाहिए, जहां वे सक्रिय सदस्य और सम्मानित भागीदार के रूप में न केवल अपने लिए उपयोगी अनुभवों का सृजन कर पाएं, बल्कि हम वयस्कों को भी उनसे सीखते रहने का अवसर मिलता रहे। यह संतोषजनक है कि अब शिक्षा और स्कूली जगत में इस दृष्टिकोण को अपनाया जाने लगा है। ज्ञान को अब किसी पूर्व निर्धारित उत्पाद की तरह प्रस्तुत किए जाने वाली वस्तु की तरह न देख कर भरपूर अवसर, सक्रिय भागीदारी की प्रक्रिया से निर्मित समझ और व्यवहार के रूप देखा जाने लगा है। जरूरत है कि परिवार और समाज के स्तर पर भी बच्चों के लिए इस नई और उपयोगी शैक्षिक समझ को ज्यादा से ज्यादा अपनाया जाए। वास्तव में यह बच्चों के लिए वास्तविक लोकतंत्र और अधिकारों की शुरुआत होगी।

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