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दुनिया मेरे आगे: नए किरदार, पुराने परिधान

रियो ओलंपिक वह अंतिम क्रीड़ा समारोह बन कर रह जाएगा जिसमें भारतीय महिला खिलाड़ी पीली साड़ी और नेवी ब्ल्यू ब्लेजर के आकर्षक परिधान में मार्च पास्ट करती देखी गर्इं।

अगस्त 2018 में इंडोनेशिया में आयोजित एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ी तो दिखेंगी, लेकिन भारतीय नारी की विश्वव्यापी पहचान साड़ी नहीं दिखाई पड़ेगी।(फाइल फोटो)

सशस्त्र सेनाओं की वर्दियों का इतिहास दिलचस्प होता है। समय के प्रवाह के साथ युद्ध में काम आने वाले शस्त्रास्त्र और युक्तियां बदलती हैं, रणक्षेत्र का प्राकृतिक परिवेश बदलता है, नई गुणवत्ता वाले कपड़े उपलब्ध होते जाते हैं और सैनिकों की वर्दियों में बदलाव आते रहते हैं। वर्दियों के चुनाव में व्यावहारिक उपयोगिता सबसे बड़ा अवयव होती है, लेकिन समारोहों में पहनी जाने वाली औपचारिक वर्दी में उपयोगिता गौण होती है और सैनिक का व्यक्तित्व आकर्षक और प्रभावकारी बनाने वाली सजधज प्राथमिक। औपचारिक वर्दी नयनाभिराम रखी जाती है, भले उसे पहनने में मशक्कत हो। खेल का मैदान भी एक तरह का रणक्षेत्र ही है। उसमें भी खिलाड़ियों के परिधान का चुनाव उपयोगिता और व्यावहारिकता के मद्देनजर होता है। फिर औपचारिक समारोहों पर खिलाड़ियों के परिधान में आकर्षण और सजधज के तत्त्व व्यावहारिक तत्त्वों के आगे अर्थहीन क्यों माने जाएं?

गोल्ड कोस्ट में राष्ट्रमंडल खेल प्रतियोगिताओं में खेल के उद्घाटन और समापन समारोहों में मार्च पास्ट के लिए भारतीय महिला खिलाड़ियों ने पारंपरिक परिधान साड़ी के बजाय नीले रंग की पतलून धारण की। इस मिसाल को आगे भी जारी रखा जाएगा। अगस्त 2018 में इंडोनेशिया में आयोजित एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ी तो दिखेंगी, लेकिन भारतीय नारी की विश्वव्यापी पहचान साड़ी नहीं दिखाई पड़ेगी। जब ऐसी दो मिसालें मौजूद हों तो भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव राजीव मेहता को यह घोषणा करने में कौन-सी देर लगनी थी कि नेवी ब्लू ब्लेजर और नीली पतलून भविष्य की हर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में, महिला हों या पुरुष, सभी भारतीय खिलाड़ियों का औपचारिक परिधान होंगी। रियो ओलंपिक वह अंतिम क्रीड़ा समारोह बन कर रह जाएगा जिसमें भारतीय महिला खिलाड़ी पीली साड़ी और नेवी ब्ल्यू ब्लेजर के आकर्षक परिधान में मार्च पास्ट करती देखी गर्इं।

भारतीय ओलंपिक संघ ने अपने निर्णय को इस दलील से उचित ठहराया कि कुछ महिला खिलाड़ियों को साड़ी धारण करने में और उसे पहन कर मार्च करने में असुविधा होती थी। गरमी लगने जैसे व्यावहारिक कारणों से जैसे पुरुष खिलाड़ियों के परिधान में बंद गले का कोट हटा कर खुले गले का ब्लेजर लाया गया, वैसे ही साड़ी की जगह पतलून भी महिला खिलाड़ियों को अधिक सुविधाजनक लगेगी। समय के प्रवाह के साथ हमें कई सुपरिचित चीजों को भूलना पड़ता है, भले लंबे समय तक आदी होने के बाद उनसे भावनात्मक लगाव हो गया हो। डाक-तार विभाग ने जब इंटरनेट के युग में तार को अलविदा कहा तब भी ‘चिट्ठी को तार समझ कर आ जाना’ कहने वाली पुरानी पीढ़ी के लोगों को थोड़ा भावनात्मक आघात तो लगा ही था। सरकारी तंत्र के राजपथ पर सत्तारूढ़ नेताओं और अधिकारियों ने लालबत्ती वाली सफेद अंबेसडर कार को भी अश्रुपूरित विदाई दी होगी। शायद अब तक के अंतरराष्ट्रीय खेलों के उद्घाटन और समापन समारोहों में शान से स्वदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी भारतीय महिला खिलाड़ियों के मन में भी भारतीय नारी की पहचान बन चुकी साड़ी के प्रति ऐसा ही लगाव हो। युगों से भारतीय नारी की पहचान बन चुकी साड़ी के बजाय पतलून पहन कर मार्च पास्ट करने वाली भारतीय महिला खिलाड़ियों में से कई को अपने परिधान में उस आकर्षण की कमी दिखाई देगी जो देश-विदेश में सराहा जाता रहा है।

व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो साड़ी धारण करने में कुछ असुविधा जरूर होगी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कुश्ती, तीरंदाजी, भारोत्तोलन जैसी कई प्रतियोगिताओं में भारत का नाम उजागर करने वाले कई प्रतियोगी ऐसे सामाजिक, पारिवारिक परिवेशों से होते हैं कि गले में दमघोंटू टाई बांध कर औपचारिक समारोहों में शामिल होने में उन्हें भी असुविधा होती होगी। शायद टाई की गांठ सही ढंग से बांधने में दूसरों से मदद भी लेनी पड़ती हो। फिर कुछ महिला खिलाड़ियों को साड़ी बांधने में मदद लेना या थोड़ी असुविधा को इतना असहनीय क्यों मान लिया गया कि भारतीय नारी की पहचान बन चुकी साड़ी अचानक त्याज्य बन जाए? अगर पहनने और चलने की सुविधा ही सर्वोपरि तर्क है तो साथ में भारतीय पहचान बनाए रखने के लिए सलवार-कमीज को प्राथमिकता क्यों न दी जाए! रंजना जायसवाल की कविता ‘साड़ी और जीन्स’ में साड़ी कहती है ‘वैदिक काल से मैं स्त्री की पहचान थी/आन-बान-शान थी/ घूंघट, आंचल और सम्मान थी’ तो जीन्स प्रतिवाद करती है ‘मैं तो हूं बेरंग, बेनूर, साधारण सी मजदूर/ मिलता है मुझसे आराम/ दो जोड़ी में वर्ष भर चलता है काम’ पर अंत में विनम्रतापूर्वक कहती है ‘मैंने कहां छीना तुम्हारा राज/ हो कोई भी पूजा उत्सव, पहनी जाती हो तुम/ सुना है कभी जीन्स में हुआ किसी लड़की का ब्याह?’ बस अंतिम तर्क यही है। साड़ी औपचारिक समारोहों में बनी रहे, पतलून और ट्रैकसूट बाकी जहां मन हो राज करें।

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