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दुनिया मेरे आगे: भीड़ के चेहरे

यह भीड़ की असामाजिक प्रवृत्ति ही है जिसका इस्तेमाल सच्चाई का पता लगाए बिना समाज को गुमराह करने और शांति भंग करने में किया जा रहा है। इससे पता चलता है कि हमारी सुविधा के लिए ईजाद किए गए तंत्र का हम किस तरह और कितना दुरुपयोग कर रहे हैं। इंटरनेट पर बने समूह भी गुमराह करने और गुमराह होने की प्रवृत्ति अपना रहे हैं।

वंदना यादव

यह फेसबुक और वाट्सऐप के वजूद में आने से कुछ समय पहले की बात है। उन दिनों हम राजस्थान में रह रहे थे। एक दिन शाम को मैंने अजमेर से झांसी एक साहित्यिक कार्यक्रम के बारे में जानने के लिए फोन किया था। उधर से बताया गया कि वह आयोजन रद्द हो गया। मैंने कारण पूछा तो पता चला कि ‘आज विश्वविद्यालय के विद्यार्थी आंदोलन चला रहे थे। न जाने कब-कहां, क्या शुरू हो जाए। भीड़ आमतौर पर गुमराह होती है और उसकी प्रवृत्ति भी गुमराह करने वाली होती है।’ उनका कहा अंतिम वाक्य मेरे जेहन में आज तक उसी तरह अंकित है। लेकिन अब भीड़ शब्द का अर्थ और विस्तृत हो गया है। वर्तमान समय में भीड़ कुछ लोगों का एक साथ दिखाई देता समूह भर नहीं है। कहने को ‘भीड़’ अब भी समूह है, लेकिन वह कहां-कहां है और किस रूप में है, इसका अंदाज लगा पाना कठिन होता जा रहा है। हालत यह हो गई है कि अकेला अपने घर के किसी कमरे में बैठा व्यक्ति भी भीड़ का हिस्सा बन गया है।

यों भीड़ का असल स्वर विरोध माना जाता है। विरोध किसका और क्यों, यह विस्तृत विषय हो सकता है। लेकिन ज्यादातर मामलों में इसका अंजाम सकारात्मक नहीं होता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कब विस्फोटक हो जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। कई बार तो आंदोलन के नाम पर इकट्ठा भीड़ भी बेलगाम होकर विध्वंस कर देती है और संभव है कि कोई मासूम उसका शिकार हो जाए। इस तरह के अपराध का रूप लूट, हत्या और यहां तक कि बलात्कार भी हो सकता है। इस तरह की भीड़ कभी बिना कुछ सोचे-समझे किसी महिला की चोटी काट दे सकती है, बच्चा चोर या किसी संवेदनशील मसले पर फैलाई गई अफवाह में किसी मार डाल सकती है। यह भीड़ की असामाजिक प्रवृत्ति ही है जिसका इस्तेमाल सच्चाई का पता लगाए बिना समाज को गुमराह करने और शांति भंग करने में किया जा रहा है। इससे पता चलता है कि हमारी सुविधा के लिए ईजाद किए गए तंत्र का हम किस तरह और कितना दुरुपयोग कर रहे हैं। इंटरनेट पर बने समूह भी गुमराह करने और गुमराह होने की प्रवृत्ति अपना रहे हैं। यह जरूरी नहीं कि भीड़तंत्र का हिस्सा होने वाले लोग एक-दूसरे को जानते ही हों। अलग-अलग जगहों पर रह रहे अनेक लोग वाट्सऐप या सोशल मीडिया पर एक समूह बना लेते हैं। उनमें से अधिकतर एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते, फिर भी वे समूह में भेजे गए संदेश को सही मान लेते हैं।

लेकिन सवाल है कि तमाम भड़काऊ और दुष्प्रचार वाले संदेश कौन तैयार करता है! कहां से ऐसे संदेश भेजने की शुरुआत होती है और कैसे देखते ही देखते ऐसे संदेश तेजी से फैलने लगते हैं? इसके बाद यही मानसिक हिंसा कैसे थोड़े से समय में हिंसक ‘आंदोलन’ बन जाती है। ऐसे सभी सवालों के जवाब उसी एक पंक्ति में छिपे हैं जो भीड़ में गुमराह होने की प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रही है। आज के अति व्यस्त जीवन में किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। लेकिन हैरानी है कि ऐसे समय में भी लोग ऐसे समूहों पर पोस्ट किए जा रहे दनादन संदेशों को न सिर्फ पढ़ रहे हैं, बल्कि सच्चाई जाने बिना एकत्रित होकर बड़े अपराध को अंजाम देने तक से नहीं डर रहे। अफवाहों को सच मान कर इंसानियत को शर्मिंदा करने करने वाले काम किए जा रहे हैं।

आए दिन पशु चोर या बच्चा चोर होने के शक में सच्चाई जाने बिना भीड़तंत्र किसी को भी अपना शिकार बना लेता है। आज के दौर में घर से बाहर निकला व्यक्ति सही-सलामत घर पहुंच जाएगा, इस पर भी शक होने लगा है। ऐसा माना जाता है कि सब अपनी-अपनी दुनिया में मगन हैं। अगर यह सच है तब वे कौन-से लोग हैं जो बेबुनियाद शक पर किसी को जान से मारने तक से नहीं हिचकते? यह सतर्क हो जाने का समय आ गया है कि क्या वाकई हमारे युवाओं के पास इतना समय है कि वे इंटरनेट पर मौजूद समूहों में पोस्ट होने वाली सामग्री को न सिर्फ पढ़ रहे हैं, बल्कि सच्चाई जानने का प्रयास किए बिना विघटनकारी मानसिकता वाले लोगों के बहकावे में आकर गलत राह पर चल पड़ते हैं?
इस तरह की तमाम घटनाएं सोचने पर विवश करती हैं कि क्या किसी के बहकाने भर से कुछ लोग एकत्रित होकर भीड़ का रूप ले लेते हैं और फिर उन्हें कानून की परवाह भी नहीं रहती या यह फिर यह हमारे भीतर की असहिष्णुता है जो मौका मिलते ही विस्फोटक रूप में बाहर आ जाती है! सच्चाई जो भी हो, अब इसका इलाज करने का वक्त आ गया है। यह व्यक्तिगत या क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है, जिससे हमें पार पाना है। यह राष्ट्रीय चिंता का विषय है। इस पर समाज के हर वर्ग को निगरानी रखनी होगी और भीड़ को गुमराह करने वाली प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा।