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दुनिया मेरे आगे: सफर में सफाई

स्वच्छ भारत की कल्पना केवल सरकारी धन और सफाई कर्मचारियों की जी-तोड़ मेहनत या मात्र विज्ञापनों के भरोसे करना संभव नहीं है। इसके लिए रेल यात्रियों का सहयोगपूर्ण रवैया, उनकी सजगता, गंदगी के प्रति उनका दुराग्रह और स्वच्छता के प्रति उनके लगाव जैसी भावनाओं का पैदा होना नितांत आवश्यक है।

भारत का रेल विभाग स्वच्छता की दिशा में पिछले पंद्रह वर्षों से सक्रिय है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो देश के अधिकतर रेलवे स्टेशन, रेल पटरियां और प्लेटफार्म अब पहले से अधिक साफ-सुथरे दिखाई देने लगे हैं। इसका कारण जहां ट्रेनों में इस्तेमाल की जाने वाली बायो टॉयलेट प्रणाली है, वहीं रेल विभाग द्वारा तैनात किए गए समर्पित सफाई कर्मचारियों का भी इसमें बड़ा योगदान है। ये सफाई कर्मचारी पूरे देश में किसी विपरीत मौसम की परवाह किए बिना दिन-रात रेल पटरियों या प्लेटफार्म को साफ-सुथरा बनाते देखे जा सकते हैं। लेकिन इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या केवल भारत सरकार और रेल मंत्रालय द्वारा खर्च किए जाने वाले सैकड़ों करोड़ रुपए के भरोसे या सफाई कर्मचारियों द्वारा की जाने वाली जी-तोड़ मेहनत की बदौलत समूचे रेलवे परिसर और यात्री डिब्बों को साफ-सुथरा रख पाना संभव है? क्या इसमें यात्रियों की कोई सहभागिता या जिम्मेदारी नहीं है? क्या रेल यात्री सरकार द्वारा जारी किए गए सफाई संबंधी निर्देशों का पालन पूरी तरह कर रहे हैं?

पिछले दिनों मुझे अपने गृहनगर दरभंगा जाने का अवसर मिला। वहां सफाई कर्मचारी प्लेटफार्म और पटरी की सफाई पूरी मेहनत से कर रहे थे। पटरी पर रेल यात्रियों द्वारा किया गया शौच कई जगहों पर दिखाई दे रहा था। सफाईकर्मी उसे पानी की मोटी धार से साफ कर रहे थे। एक अन्य कर्मचारी वहीं फैली खानपान संबंधी दूसरी गंदगी साफ कर रहा था। वहां सफाई होने के बाद प्लेटफार्म पर एक ट्रेन आकर रुकी और कुछ ही मिनटों बाद वह आगे बढ़ गई। मैं यह दृश्य प्लेटफार्म नंबर एक और दो के बीच बने पुल पर खड़ी देख रही थी। जैसे ही वह ट्रेन प्लेटफार्म से रवाना हुई, उसके बाद जिस पटरी को सिर्फ चंद मिनट पहले सफाईकर्मियों ने साफ किया गया था, वह फिर अपने पहले वाले रूप में आ गई यानी गंदगी और शौच से भर गई। सवाल है कि चंद मिनटों में फैली इस गंदगी के लिए जिम्मेदार कौन है? रेल के डिब्बों से लेकर प्लेटफार्म तक विभिन्न स्थानों पर कूड़ा-करकट फेंकने के लिए कूड़ेदान की व्यवस्था की जा चुकी है। लेकिन हमारे ‘सजग’ यात्रियों को कूड़ेदान तक जाने में तकलीफ होती है। प्लेटफार्म से लेकर रेल के डिब्बे में अपनी सीटों पर लोग जहां बैठ कर खाते-पीते हैं, उसी जगह गंदगी भी फैलाते हैं। ऐसा लगता है कि सफाई के बीच में रहना या अपने बैठने की जगह के आसपास सफाई रखना लोगों को भाता ही नहीं।

रेल विभाग दशकों से यात्रियों के लिए यह लिखित निर्देश जारी करता आ रहा है कि ‘कृपया खड़ी गाड़ी में शौचालय का इस्तेमाल न करें’, लेकिन गाड़ी खड़ी होने पर भी शौचालय का प्रयोग करने में यात्री हिचकते नहीं हैं। मैंने खुद तमाम समझदार लोगों को भी साफ-सुथरे प्लेटफार्म पर कुछ खाने के बाद उसकी गंदगी वहीं फेंकते देखा है। कई बार कुछ महिलाएं अपने बच्चों को प्लेटफार्म पर से रेल पटरियों पर शौच कराती दिख जाती हैं। पान, गुटखा, खैनी खाकर थूकना और बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े और माचिस की तीलियां फेंकना तो शायद अधिकार की तरह माना जाता है। केवल साधारण डिब्बों में नहीं, बल्कि वातानुकूलित श्रेणी के शौचालयों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जाते हैं, जिससे हम तथाकथित सजग और सहृदय कहे जाने वाले रेलयात्रियों की भी करतूतों का अंदाजा लगा सकते हैं। कुछ लोग शौचालय की सीट पर और उसके इर्द-गिर्द शायद यह सोच कर गंदगी फैला कर चले जाते हैं कि अब उन्हें दोबारा इस शौचालय का प्रयोग नहीं करना है।

सफाई के संदेश के लिए एक आकर्षक विज्ञापन में ‘शोले’ फिल्म के एक मशहूर डॉयलाग को दृश्य रूप में दिखाया गया है- ‘कालिया, कितना इनाम रखा है सरकार ने गंदगी फैलाने वालों पर’… तो जवाब है ‘पूरे पांच सौ रुपए सरकार।’ लोगों को सफाई के प्रति आगाह करने और गंदगी फैलाने के प्रति भय पैदा करने का यह अच्छा उपाय है। लेकिन अफसोस की बात है कि ज्यादातर रेलयात्रियों पर ऐसी घोषणाओं का कोई खास असर पड़ता नहीं दिखता। रेल के डिब्बों के भीतर और प्लेटफार्म पर जन सुविधा के केंद्रों पर फैली गंदगी आम होती है। इस प्रकार की गंदगी जहां दूसरों के लिए बेहद असुविधाजनक है, वहीं यह बीमारी फैलने का भी जरिया है। स्वच्छ भारत की कल्पना केवल सरकारी धन और सफाई कर्मचारियों की जी-तोड़ मेहनत या मात्र विज्ञापनों के भरोसे करना संभव नहीं है। इसके लिए रेल यात्रियों का सहयोगपूर्ण रवैया, उनकी सजगता, गंदगी के प्रति उनका दुराग्रह और स्वच्छता के प्रति उनके लगाव जैसी भावनाओं का पैदा होना नितांत आवश्यक है। एक स्वच्छता-प्रेमी रेल यात्री का कर्तव्य है कि अपने पास बैठे गंदगी फैलाने वाले दूसरे यात्री को उसकी गंदगी फैलाने वाली हरकतों से रोके या फिर टोके।