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दुनिया मेरे आगे: बदलता मानस

महिलाओं में जागृति लाने वाली कई संस्थाओं ने कुछ ऐसा ही महिला मानस बनाने की कोशिश की थी। उनका कहना था कि पुरुष प्रधान समाज (भारत) में महिलाएं घर से बाहर तक प्रताड़ित हैं। प्रताड़न के नब्बे प्रतिशत भागीदार पुरुष ही होते हैं।

Author March 29, 2018 04:26 am
महिला दिवस के आयोजन में पुरुषों ने विशेष भूमिका निभाई है, आशा की जा सकती है कि घर से लेकर बाहर महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुरुष अपनी तत्परता दिखाएंगे।

मृदुला सिन्हा

यों तो समाज के किसी वर्ग के लिए कोई दिवस मनाए जाते समय उस वर्ग की विशेष सक्रियता देखी जाती है। यही अपेक्षित है। आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए हमारे देश में भी लगभग चार दशक बीत गए। प्रारंभ में इस दिवस को मनाए जाने वाले कार्यक्रमों में महिलाओं की ही भागीदारी होती थी। आयोजक भी वे, और सहभागिता भी केवल उन्हीं की। महिला दिवस का आयोजन हो या महिलाओं द्वारा आयोजित अन्य पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक या कानूनी मसलों को लेकर कोई सम्मेलन, मैं कहा करती थी- ‘ऐसे कार्यक्रमों में पुरुषों की सहभागिता और उपस्थिति आवश्यक है। क्योंकि महिलाएं अपने जिन अधिकारों को पाने के लिए प्रस्ताव रखेंगी, उनका कार्यान्वयन पुरुष भी करेंगे।’ मेरे उपर्युक्तसुझाव का उपयोग कहीं-कहीं दीखता था, पर महिला सम्मेलनों में पुरुषों की उपस्थिति दूरबीन से ही देखी जा सकती थी। पिछले कुछ वर्षों में महिला कार्यक्रमों के आयोजन और कार्यान्वयन में पुरुष सक्रियता बढ़ती गई है। इस वर्ष की उनकी सक्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गोवा ही नहीं, देश के कई बड़े-छोटे नगरों से मुझे महिला दिवस आयोजनों पर उपस्थित होने का निमंत्रण मिलता रहा। बीस-पच्चीस निमंत्रणों में से एक-दो को छोड़ सभी आयोजनों के आयोजक पुरुष या महिला-पुरुष का मिलाजुला संकल्प था। इस विषय पर ध्यान उन निमंत्रणों ने ही दिलाया था। गोवा में आयोजित पांच महिला दिवस कार्यक्रमों में शरीक होने पर आश्चर्य और आनंद से मन मगन हो गया। सफलतापूर्वक संपन्न पांचों कार्यक्रमों के आयोजक पुरुष थे। कार्यक्रमों में पुरुषों की उपस्थिति भी अधिक थी। बड़े उत्साह और उमंग से वे महिला दिवस मनाते दिखे।

प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम भी देश-भर में पुरुषों द्वारा ईमानदार नीयत और उत्साह से लिया जा रहा है। आज से चार दशक पूर्व से पिछले दशक तक एक कालखंड ऐसा रहा जिसमें महिलाओं की सारी समस्याओं का जिम्मेदार पुरुषों को माना जाता रहा। महिलाओं में जागृति लाने वाली कई संस्थाओं ने कुछ ऐसा ही महिला मानस बनाने की कोशिश की थी। उनका कहना था कि पुरुष प्रधान समाज (भारत) में महिलाएं घर से बाहर तक प्रताड़ित हैं। प्रताड़न के नब्बे प्रतिशत भागीदार पुरुष ही होते हैं। 1981 में दिल्ली के एक सभागार (फिक्की ऑडिटोरियम) में कवयित्री महादेवी वर्मा ने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अंखफोड़ होती दिल्ली की महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा था- ‘पुरुषों की चिंता छोड़ दो। घर में किसी लड़के की हरकतों से दुखी होकर लोग कहते हैं- आवारा हो गया है, जाने दो! पर क्या कभी किसी लड़की को भी कोई ऐसा कहता है? उसकी मां, घरवाले कभी नहीं कहते-आवारा हो गई है, इसे होने दो! क्यों? इसलिए कि लड़कियों के आवारा होने की कल्पना नहीं की जा सकती। लड़की मात्र एक व्यक्तिनहीं, संस्था है। अब जब पुरुष पागल हो रहा है तो होने दो! आप तो सजग-सचेत नागरिक बनो। अपनी शक्तिपहचानो। अपनी शक्ति से पुन: आपको नया निर्माण करना है।’

निश्चय ही उनके कथन का आशय पुरुषों का संग-साथ छोड़ने का नहीं था। उन्हें भी मालूम था कि समाज-जीवन में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन चल नहीं सकता। प्रकृति और संस्कृति में ऐसा ही पूरकता का सिद्धांत चलता रहा है। पिछले तीन दशकों में नारी के चतुर्दिक विकास में स्वयं नारी, पुरुष, परिवार, समाज और सरकार की भी अहम भूमिका रही है। बेटियों को पढ़ाना हो या उन्हें काम के लिए जल, थल, नभ पर भेजना, माता-पिता में पिता की सक्रियता अधिक दीखती है। हर क्षेत्र में महिलाओं के कदम पड़ रहे हैं। पिता, पति और पुत्रों के भी किसी न किसी प्रकार के सहयोग मिल रहे हैं। वे सब महिलाओं की उपलब्धियों पर आनंदित हो रहे हैं। समाज और राष्ट्र के समुचित और समग्र विकास के लिए ऐसी स्थिति और पुरुषों का ऐसा मानस सराहनीय है।

तीन दशकों में स्थितियां बहुत बदली हैं। आशा की जा सकती है कि आगे और भी बदलेगी। निश्चित रूप से महिलाओं को सुरक्षा की विशेष जरूरत है। जिस प्रकार महिला दिवस के आयोजन में पुरुषों ने विशेष भूमिका निभाई है, आशा की जा सकती है कि घर से लेकर बाहर महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुरुष अपनी तत्परता दिखाएंगे। भारतीय चिंतन और व्यवहार में महिलाएं पुरुष की पगड़ी रही हैं। पगड़ी, इज्जत का ही प्रतीक है। पुरुष का पौरुष जगा कर उन्हें अपनी मां-बहनों की सुरक्षा करने की ओर प्रेरित करना है। दरअसल, अब समय आ गया है कि सम्मेलन, गोष्ठियां और चर्चाएं पुरुषों द्वारा महिलाओं के लिए हों, जिनमें महिलाओं को जीवन के हर क्षेत्र में सुरक्षा और सम्मान देने के साथ-साथ उनके संवैधानिक व कानूनी अधिकारों का भी उचित कार्यान्वयन हो। महिला समस्याओं के समाधान के लिए पुरुष आगे आएं। यह हमारे समाज का इतिहास और व्यवहार भी रहा है।

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