ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: सीखना और समझना

अक्सर सीखने की गति को दिमाग से भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। मसलन, जिसके पास जितना ज्यादा दिमाग है, वह उतनी तेजी से सीख सकता है। सीखना वास्तव में तब होता है, जब सीखने वाला उस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले सके। वह विषय उसके लिए रुचिकर हो या उसके सामने रुचिकर बना कर पेश किया जाए।

Author February 28, 2018 03:11 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

प्रेरणा मालवीया

नब्बे दिन में अंग्रेजी बोलना सीखें या तीस दिन दिन कंप्यूटर सीखें, पंद्रह दिन में चीनी खाना बनाना सीखें या यादाश्त बढ़ाने के तरीके सीखें। हमारे आसपास इस तरह के विज्ञापनों की भरमार रहती हैं। अन्य विषयों पर भी यही बात लागू होती है। मेरे अब तक के अनुभवों में सीखने का दिनों से गहरा नाता रहा है। अगर हम इस सिरे से सोचते हैं तो इसका मतलब हम यह मान कर चल रहे हैं कि सभी एक ही गति से सीखते हैं। स्कूल में भी कक्षाएं बंटी रहती हैं। मसलन, पहली कक्षा में सभी बच्चों को इतनी दक्षता तो आ ही जानी चाहिए और जो कक्षा के साथ अपनी लय नहीं मिला पाता है तो उस पर कमजोर बच्चे का ठप्पा लग जाता है। और जो बच्चा पढ़ाई में कमजोर है, वह हर क्षेत्र में पिछड़ा माना जाता है। यहां इससे कोई सरोकार नहीं है कि बच्चे का परिवेश क्या रहा है, वे क्या सीख कर आए हैं, उनकी क्या सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति रही है! क्या हर बच्चा एक खास तय की हुई अवधि में सीख ही जाएगा? अगर कोई यह दावा करता है तो मैं कहूंगी वह मजाक कर रहा है। यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है सीखने और बच्चे, दोनों के संदर्भ में, क्योंकि सबके सीखने की गति और हर बच्चे की क्षमता अलग-अलग होती हैं।

अक्सर सीखने की गति को दिमाग से भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। मसलन, जिसके पास जितना ज्यादा दिमाग है, वह उतनी तेजी से सीख सकता है। सीखना वास्तव में तब होता है, जब सीखने वाला उस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले सके। वह विषय उसके लिए रुचिकर हो या उसके सामने रुचिकर बना कर पेश किया जाए। उसे सीखने में आनंद आ रहा हो और जो सीखा जा रहा है उसका वास्तविक जीवन में कोई अर्थ हो। कई दस्तावेज भी इस बात की पुष्टि करते हैं। इस संदर्भ में ज्यादा कुछ जान सकूं, इसलिए लगातार मैं इस कोशिश में थी। इस बीच एक किताब हाथ लगी तो इसका शीर्षक काफी दिलचस्प लगा- ‘सीखना दिल से’। कर के सीखना, देख कर सीखना, सुन कर सीखना, समूह में सीखना तो सुना था, मगर दिल से सीखने की बात मेरे लिए नई थी। किताब में संयुक्ता नाम की लड़की ने अपने विश्वविद्यालय की पढ़ाई के अनुभवों को बहुत खूबसूरती से संजोया है। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे आगे का रास्ता कैसे चुनना है, यह भी उसी ने तय किया। हालांकि इस पूरी यात्रा में उसके अभिभावकों और परिचितों ने उसे निर्णय लेने में मदद की, मगर अपने निर्णय उस पर थोपे नहीं। इसमें उसके पढ़ाई के अनुभवों के अतिरिक्त शिक्षकों के व्यवहार और इस यात्रा के दौरान उसके करीबी मित्रों आदि के रवैए का भी जिक्र है। साथ ही उस दौरान उसके मन में चल रहे द्वंद्व, खीझ और खुशी जैसे सभी मनोभावों का विश्लेषण बारीकी से किया गया है। संयुक्ता के सीखने में सभी अनिवार्य बातें शामिल थीं। उसने न सिर्फ यह तय किया कि उसे क्या सीखना है, बल्कि यह भी कि यह सब किन लोगों से सीखना है। वह इसमें सफल भी रही। लेकिन यह तब संभव हुआ जब उस पर विश्वास किया गया और उसे निर्णय लेने की आजादी दी गई। संयुक्ता को अपनी इस यात्रा में जिन भी शिक्षकों से मिलना हुआ वे काफी संवेदनशील थे। किसी ने भी उसके निर्णय पर प्रश्न नहीं उठाया या आशंका व्यक्त नहीं की, बल्कि प्रोत्साहित किया।

जबकि आम जनमानस में यह धारणा होती है कि बच्चे ठीक से निर्णय नहीं ले पाते हैं। इस कसौटी पर लड़कियों को बिल्कुल ही लाचार माना जाता है। इस कारण घर के बड़े और खासतौर पर माता-पिता ही बच्चों के जीवन से जुड़ी सभी चीजें तय करते हैं। बल्कि कई बार तो यह ताउम्र चलता रहता है, जैसे कि दसवीं के बाद कौन-सा विषय लेना है या किस कॉलेज में दाखिला लेना है या शादी किससे करनी है वगैरह। खासतौर पर लड़कियों को लेकर समाज में गहरे पैठे आग्रहों के बारे में हम अनजान नहीं हैं। हमारे समाज में लड़कियों को निर्णय लेने के अवसर कम या न के बराबर ही होते हैं। यह माना जाता है कि लड़कियां अपने जीवन से संबंधित कोई सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में संयुक्ता जैसी पात्र के उदाहरण हमारे समाज में व्याप्त लड़कियों की पारंपरिक छवि को तोड़ते हैं। यों भी, जब तक लड़कियों को भी लड़कों की तरह खुला आकाश नहीं दिया जाएगा, उनकी सामान्य जिंदगी बाधित और यहां तक कि नियंत्रित ही रहेगी। यह सब बचपन से ही किसी भी विषय पर सोचने-समझने की बुनियाद पर निर्भर है, जो भावी जिंदगी की दिशा से लेकर सोचने-समझने तक को प्रभावित करती है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App