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दुनिया मेरे आगे: स्वच्छता की खातिर

स्वच्छता अभियान सचमुच एक प्रशंसनीय पहल है। इसमें सभी का सहयोग और योगदान चाहिए। यह अभियान सिर्फ सरकार या प्रशासन के करने से सफल नहीं हो सकता। अत: जन-सहयोग भी एक अहम मुद्दा है। व्यापक सामाजिक भागीदारी के जरिए ही इस अभियान को कारगर बनाया जा सकता है।
Author February 14, 2018 03:58 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

उषा महाजन

पिछले लगभग महीने भर से नित्य ही सवेरे-सवेरे, हमारे वसंत कुंज के मोहल्ले में नगरपालिका की एक गाड़ी इस अनुरोध की घोषणा करते हुए गुजरती है कि हम अपना गीला और सूखा कूड़ा, अलग-अलग हरे और नीले कचरा-डब्बों में जमा करें और स्वच्छता अभियान में अपना योगदान दें। हरे और नीले तो नहीं, पर बायोडिग्रेडेबल और गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए हमने अलग अलग कचरा-डब्बे लगा लिए। लेकिन पाया कि घरों से कचरा इकठ्ठा करने वाले लड़के तो दोनों तरह के कूड़े को एक ही गाड़ी में पटक रहे थे। उनसे पूछा कि क्या उनको अनुदेश नहीं मिला था- अलग-अलग तरह के कूड़े को अलग-अलग गाड़ियों में ले जाने का? लड़कों ने ऐसी किसी जानकारी से अनभिज्ञता जाहिर की।

हमारे मोहल्ले में कचरा इकट्ठा करने की जिम्मेदारी ‘वातावरण’ नाम की संस्था के हवाले है। शुल्क की रसीद से मोबाइल नंबर ले, संबंधित व्यक्ति को फोन किया और पूछा कि वे दोनों तरह के कचरे को अलग-अलग क्यों नहीं उठवाते? जवाब के बदले, वे मेरा ही पता-ठिकाना पूछने लगे। बातचीत अप्रिय संवाद में बदल गई। कहना पड़ा, ‘आपको मेरे फ्लैट नंबर से क्या? आपका काम तो सारे मोहल्ले से है।’ दूसरे दिन घोषणा करने वाली गाड़ी को रोका और सारा माजरा बताया और उपाय पूछा। जवाब मिला, ‘जी, हमारा काम तो सिर्फ अनाउंस करते-करते जाना है, हम क्या जानें?’  तालमेल की यह कमी लगभग सभी सरकारी कामों में देखने को मिलती है। किन्हीं दो विभागों को एक साथ जिम्मेदारी उठाते नहीं पाया। टेलीफोन की तारें बिछाने के लिए गड्ढे खोदे जाएं या पानी की लाइनें डालने/बदलने के लिए जमीन खोदी जाए, गड््ढों को समतल करने का काम महीनों नहीं होता। बरसातों से पहले नालियों से गाद निकाल कर सड़कों के किनारे ढेरियों में जमा कर दी जाती है, पर साथ ही उठाई नहीं जाती। बारिश होते ही सड़कें कीचड़ से सन जाती हैं। सड़कों के किनारे और बाजारों के परिसर में शौचालय दिखते तो हैं, लेकिन न कहीं पानी की नियमित आपूर्ति होती है न साफ-सफाई के लिए कोई जिम्मेदार दिखता है, नतीजतन किसी को कभी भीतर जाते नहीं देखा। सब बाहर ही अपना काम निबटा कर, उसे बद से बदतर बनाने में ही योगदान देते दिखते हैं।

कुछ महीने पहले खबर देखी थी कि केंद्रीय शहरी विकास मंत्री ने संबद्ध अफसरों को हिदायत दी थी कि वे अपने-अपने क्षेत्र के शौचालयों का औचक निरीक्षण करते रहें, लेकिन ऐसा कोई सुधार होते तो नहीं देखा। प्रतिबद्धता की कमी के अलावा इसे और क्या कहा जाय! सड़कों के बीच डिवाइडरों पर पौधे तो लगा दिए जाते हैं, लेकिन नियमित देखभाल की कमी से वे कुछ ही दिनों में सूख जाते हैं। प्लास्टिक के थैलों पर आए दिन प्रतिबंध लगता रहता है, लेकिन कुछेक बड़ी दुकानों को छोड़, ज्यादातर दुकानदारी अब भी प्लास्टिक के थैलों पर ही निर्भर है। प्लास्टिक के थैले पर्यावरण के लिए किस कदर नुकसानदेह हैं इस पर काफी-कुछ कहा और लिखा जा चुका है। इसे ‘अमर’ कचरा भी कहा जाता है। यानी इससे छुटकारा पाना संभव नहीं होता।

प्लास्टिक के थैलों का इस्तेमाल रोकने के लिए कई बार अदालती आदेश जारी हो चुके हैं लेकिन उन पर कभी गंभीरता से अमल नहीं हुआ। आदेश के उल्लंघन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में कोई क्या सबक लेता! कभी कड़ाई बरते जाने पर यह जरूर हुआ कि दुकानदारों ने सामान के साथ प्लास्टिक बैग न दिए जाने और साथ में झोला लेकर आने की हिदायत दुकानों पर टांग दी। लेकिन ऐसी तख्तियां दिखावटी ही साबित हुर्इं। कुछ ही दिनों बाद फिर सब कुछ पहले की तरह चलने लगा। प्लास्टिक थैले बदस्तूर चलन में आ गए। बार-बार के ऐसे अनुभवों को देखते हुए, क्यों नहीं प्लास्टिक के थैले बनाने वाले कारखानों को ही बंद किया जाता? पत्तों-डंठलों को तोड़ने से क्या होगा, क्यों न समस्या को जड़ से समाप्त कर दिया जाए?

स्वच्छता अभियान सचमुच एक प्रशंसनीय पहल है। इसमें सभी का सहयोग और योगदान चाहिए। यह अभियान सिर्फ सरकार या प्रशासन के करने से सफल नहीं हो सकता। अत: जन-सहयोग भी एक अहम मुद्दा है। व्यापक सामाजिक भागीदारी के जरिए ही इस अभियान को कारगर बनाया जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, अभियान को सफल बनाने के लिए यह भी जरूरी है कि विभिन्न सरकारी विभागों के बीच तालमेल हो। विकसित देशों के साफ-सुथरे होने का आखिर क्या राज है? देखें तो बहुत-से कारक हैं- भ्रष्टाचार की कमी, विभागों का आपसी तालमेल, कड़ा अनुशासन और स्वच्छता का नागरिकों के आचार-व्यवहार में शामिल होना। क्यों नहीं इन सब मुद््दों को स्वच्छता अभियान के साथ जोड़ कर देखा जाता? और स्वच्छता पखवाड़ा मनाने के बदले इन सब मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाता?

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