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दुनिया मेरे आगे: खौफ की दुनिया

अपराध में डूबे ऐसे मनचलों की यौवन-वितृष्णा ने स्त्रियों का हमेशा ही शोषण कर उनकी जुबान पर ताला जड़ने का काम किया है। देवालयों से लेकर वेश्यालय तक इनकी बेशर्मी और औरतों की चीखों के ऐतिहासिक गवाह रहे हैं।

Author Published on: May 24, 2019 2:15 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर- इंडियन एक्सप्रेस)

राजकुमारी

हमारे आसपास लोगों के मुंह से ऐसे ‘आशीर्वचन’ आम हैं कि ‘जीते रहो, दूध-बताशे पीते रहो’, ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’। ऐसे ‘आशीर्वचन’ हम औरतें बुजुर्ग होकर भी कभी बेटी के फलने फूलने को लेकर फूटे मुंह से भी नहीं बोल पातीं। पिछले कई वर्षों से बलात्कार के मामलों को तेजी से बढ़ते देखा। छह महीने की उम्र से लेकर पांच साल या उससे भी कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार और बर्बरता के चरम के रूह कंपा देने वाले ब्योरे पढ़े-सुने। युवतियों के खिलाफ असामाजिक तत्त्वों के साथ-साथ नजदीकी रिश्तेदारों और यहां तक कि सौतेले बाप, भाई, प्रेमी तक के अपराध ने दिल दहला दिया। ‘कसूर’ महज उनका स्त्री होना।

नाबालिग या बालिग- सभी महिलाएं इस तरह की क्रूरता को झेल रही हैं। बहुत-से ऐसे भी मामले हैं जो गड़े पड़े रह जाते हैं। बाप, भाई, पड़ोसी, रिश्तेदार, ससुर, जेठ, देवर आदि से होने वाले शारीरिक शोषण के विरुद्ध उठी आवाज को अभी वह इज्जत नहीं मिली है, जो किसी स्त्री के भीतर थोड़ी हिम्मत भरे। ऐसे मामले सामने आने पर आमतौर पर उसके मौखिक भयाक्रांत परिणाम सुना कर ही दबा दिया जाता रहा है।

हम ही जन्म देती हैं ऐसे लोगों को और ये हमें ही नहीं बख्शते। मुझे लगता है कि कमी हममें है जो ऐसे लड़कों या पुरुषों की अपने ऊपर आपराधिक दृष्टि का आभास होते हुए भी समय पर इन्हें समाज के कठघरे में नहीं खड़ा करतीं। बल्कि इनके अपराधों का शिकार होकर इनका जवाब देने, इन्हें बेनकाब करने के बजाय उल्टे शिशु मृग-सी आंखें चुरा कर हम स्त्रियां खुद ही छिपने लगती हैं। ऐसे मामले आम हैं जिनमें ऐसे घिनौने कृत्यों के बाद पीड़ित बच्ची को ही चुप रहने की हिदायत दी जाती है, यह कह कर कि बात खुली तो परिवार की इज्जत खराब हो जाएगी। कुंठा ऐसी कि झट से कह दिया जाता है कि लड़कियां शरीर दिखाने वाले कपड़े पहनती हैं तो निशाने पर आएंगी। लेकिन घरों में समूचे शारीरिक अंगों को ढकने के बाद भी, पूरे भारतीय परिधान वाली औरतें भी कहां नहीं पुरुषों की हवस का शिकार बनती हैं! खेत-खलिहानों, सरेआम बाजारों, अंधेरे बंद कमरों या कोठरियों में..!

पीछे मुड़ कर देखने से क्या लाभ! जो सबको याद हो, वही बात करते हैं। न उसने छोटी स्कर्ट पहन रखी थी, न वह किसी पुरुष मित्र के साथ आधी रात को कहीं से आ रही थी, न वह बच्ची थी। वह किसी की बीवी थी, बहन थी, बेटी थी। वह कमजोर परिवार से थी, दलित थी। उसे जिस बर्बरता का शिकार होना पड़ा, वह कल्पना भी दहलाती है। हां, थानागाजी जैसी रोंगटे खड़े कर देने वाली शर्मनाक घटना इसी दौर में घटी। सामूहिक बलात्कार, बर्बरता और असभ्यता का चरम। वीडियो बना कर बाद में भी शोषण-दमन। लानत है ऐसे मर्दों पर जो इस प्रकार के कुकृत्य करते हैं।

लेकिन कुछ दिनों बाद हमारी-आपकी बुद्धिमता फिर नई घटना पर सोचने लगेगी। दुखद, शर्मनाक, ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए जैसे विचार जाहिर कर हम तब तक के लिए शांत हो जाएंगे, जब तक वैसा ही नया कुछ न घट जाए। सच क्या है? औरतें सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं देश में। सरेआम नोची जा रही हैं। समाज के अंधे-बहरे लोगों को चीखें भी सुनाई नहीं देतीं। उनके चेहरे पर कहीं शर्म नहीं दिखती। वे कब और किन हालात में समझने और तकलीफ महसूस करने की कोशिश करेंगे! वक्त का पहिया कभी भी घूम सकता है।

अपराध में डूबे ऐसे मनचलों की यौवन-वितृष्णा ने स्त्रियों का हमेशा ही शोषण कर उनकी जुबान पर ताला जड़ने का काम किया है। देवालयों से लेकर वेश्यालय तक इनकी बेशर्मी और औरतों की चीखों के ऐतिहासिक गवाह रहे हैं। धर्म की आड़ में पनपता जिस्मानी धंधा ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ जैसा दृश्य सामने करता है। कार्यस्थलों पर अधिकारियों से लेकर सहयोगियों तक का बर्ताव छिपा नहीं है।

दूसरा पक्ष यह है कि गरीबों के लिए उनकी गरीबी एक जानलेवा समस्या है। अबोधों को उनके अनजानेपन की वजह से शिकार बना लिया जाता है। संबंधी अपनेपन का फायदा उठा कर लड़कियों को चुप करा देते हैं। समझदारी वाली युवतियों के खिलाफ जबर्दस्ती। जाहिर है, मरना स्त्री को ही है। जिन ‘कोठों’ को समाज गंदा कहता है, ‘नाइट बार’ की कॉल गर्ल्स’, देह-व्यापार में धकेली गई युवतियां- ये सब स्त्रियां इस आपराधिक मर्द जाति की देन हैं। कानून और प्रशासन आपराधिक नींद में सोता है। नतीजतन, ऐसे मामले थमने का नाम नहीं ले रहे। ‘अबला’ से सबला और फिर अबलाओं की नई जमात बनाने को तत्पर यह पुरुषप्रधान देश। अश्लीलता का ठेका पुरुषों ने लिया हुआ है और अंगुलियां उठती हैं स्त्रियों पर। निर्मम हत्याओं का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। इस पुरुष प्रधान समाज में सत्ताधारी तबकों ने अपने लिए कोई दंड निर्धारित नहीं किया है। बेखौफ घूमते दरिंदे कौन हैं? मुझे भय है कि कहीं अराजक अपराधों का दौर सब कुछ नष्ट न कर दे!

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