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दुनिया मेरे आगे: सोच का दायरा

‘मेरा शरीर मेरा अधिकार’ जैसे विचारों पर चर्चा चल रही थी। चर्चा में एक सहयोगी शिक्षक भी कूद पड़े। उनके बोलने के ढंग से स्पष्ट था कि यह चर्चा उनकी पसंद से कोसों दूर थी। वे अपने विचारों में बड़े स्पष्ट थे। स्त्री अस्मिता के मसले पर सोचने-समझने के क्रम में इस तरह के कुछ अनुभवों ने मुझे अंदर से झकझोर दिया।

Author March 15, 2019 3:55 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर

नीलम सिंह

कुछ दिनों पहले बातचीत के दौरान एक सहयोगी ने कहा- ‘मेरा शरीर मेरा अधिकार- यह क्या बकवास है!’ उनके मुंह से यह बात सुन कर न केवल मैं हतप्रभ थी, बल्कि मेरे विद्यार्थी भी दंग रह गए। शायद इसलिए ज्यादा, कि वे शिक्षण के पेशे में थे। उन्होंने आगे कहा कि मेरे सामने स्त्री अस्मिता की बात मत करो। मैं इस सबमें विश्वास नहीं करता। स्त्री अस्मिता और उससे जुड़े अधिकारों की मांग उन्हें न केवल बेकार, बल्कि नाजायज लगती थी। उनका स्पष्ट मत था कि स्त्रियां अपनी ‘सीमा-मर्यादा’ में ही अच्छी लगती हैं। स्त्री अस्मिता उनके विचार से चरित्रहीन स्त्रियों की काम वासना की पूर्ति का हथियार भर था। उनकी बातों को सुन कर मुझे ‘निर्भया’ के बलात्कारी या उस जैसे लोगों की मानसिकता का अंदाजा हुआ जिसमें कहा जाता है कि ‘अगर रात में दस बजे घर से बाहर निकलेगी तो यही होगा… अगर विरोध नहीं करती तो उसकी हत्या नहीं होती।’ हालांकि ‘निर्भया’ का बलात्कारी एक अशिक्षित समाज से था और शिक्षा के अभाव में उसकी यह मानसिकता घटक अवश्य थी, मगर अविश्वसनीय नहीं, लेकिन जब इस तरह की मानसिकता स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में शिक्षकों और विद्यार्थियों में दिखाई देती है तो यह घातक और शर्मनाक है।

दरअसल, सिमोन द बोउवा के बारे में पढ़ाने के दौरान ‘मेरा शरीर मेरा अधिकार’ जैसे विचारों पर चर्चा चल रही थी। चर्चा में एक सहयोगी शिक्षक भी कूद पड़े। उनके बोलने के ढंग से स्पष्ट था कि यह चर्चा उनकी पसंद से कोसों दूर थी। वे अपने विचारों में बड़े स्पष्ट थे। स्त्री अस्मिता के मसले पर सोचने-समझने के क्रम में इस तरह के कुछ अनुभवों ने मुझे अंदर से झकझोर दिया। शिक्षित समाज का अनुकरण समाज का हर वर्ग करता है। ऐसे में यह छोटी-सी चर्चा सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में शिक्षा के प्रभाव से हमारी सोच बदलती है! स्कूल, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय वे स्थान हैं, जहां शिक्षा, सोच, विचार और आधुनिकता पलती-बढ़ती है। यहां वे लोग रहते हैं, जिनका अनुकरण पूरा समाज करता है। परंपरागत रूप से गुरुजनों का समाज में विशेष आदर रहा है। कबीर ने तो गुरु को गोविंद के भी ऊपर बैठाया था, लेकिन जब गुरु ही विचारों से इस तरह हों तो हम विद्यार्थियों से क्या आशा रख सकते हैं! शिक्षित समाज अपनी जिम्मेदारी से विमुख हो जाए तो किसे दोषी ठहराएं।

ऐसा नहीं कि महिला आंदोलनों ने इस दिशा में प्रयास नहीं किए। साहित्यिक और सामाजिक आंदोलनों ने ‘स्त्री’ को स्त्री होने के अहसास की जकड़न से मुक्त किया। सिमोन जब कहती हैं कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है, तो वे उसी मानसिकता पर चोट करती हैं जो स्त्री को हमेशा स्त्री बने रहने के लिए प्रेरित करती है। स्त्री विमर्शों ने साफ तौर पर यह बात बताई है कि जन्म से ज्यादा परिस्थिति और व्यवहार उस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं जो स्त्रियों को दायरे में कैद कर उनका चरित्र गढ़ने का काम करती हैं। दुखद यह है कि इस प्रभुत्ववादी सोच ने समाज में स्त्रियों को भी ऐसा बना दिया है कि अब स्वयं वे स्त्री धर्म से बाहर आना नहीं चाहतीं। असुरक्षा के भाव की मारी स्त्री अपनी बेटी को चलना, उठना, बैठना, हंसना, कपड़े पहनना, अपने तन को पूरी तरह से ढंकना या फिर सीनेटरी नैपकिन खरीदने तक की शिक्षा देती है।

बड़ी बात यह है कि इस तरह की शिक्षा केवल घरों में नहीं दी जाती है, बल्कि स्कूलों, महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में भी दी जाती है। यहां केवल शिक्षा देने का तरीका बदल जाता है। मगर सच यह है कि जिन शिक्षण सस्थानों पर हमारी नजरें लगी रहती हैं, जहां से क्रांति की चिंगारी उठती है, उनमें भी महिला शिक्षक अपने पहनने-ओढ़ने, हंसने-बोलने पर टीका-टिप्पणी की शिकार होती हैं। ‘चरित्रवान’ और ‘चरित्रहीन’ की पहचान में नत्थी कर दी जाती है। उन पर कई तरह के अनर्गल आरोप लगाए जाने लगते हैं। कुल मिला कर पुरुष प्रभुत्ववादी सोच मानती है कि स्त्री खूबसूरत हो सकती है, बुद्धिमान नहीं। बुद्धि और ताकत पर तो केवल पुरुषों का एकाधिकार है। ऐसी मानसिकता वाले लोग यह मानने को कतई तैयार नहीं होते कि यह सोच न केवल उनकी ग्रंथियों को दर्शाती है, बल्कि उनके पिछड़े होने का भी सबूत है।

अफसोस यह है कि हर साल महिला दिवस जैसे अंतरराष्ट्रीय अवसर समाज को यह बताने-सिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सच यह है कि जब हमारे समाज का शिक्षित तबका इस मसले पर सोचने और अपनी सामंती मानसिकता बदलने को तैयार नहीं होता तो परंपरागत मानसिकता में जीते साधारण लोगों पर क्या सवाल उठाया जाए! जरूरत इस बात की है कि अगर हम खुद को एक सभ्य समाज का हिस्सा मानना चाहते हैं तो हमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर हैसियत में एक व्यक्ति मानना होगा। पुरुष प्रभुत्व वाले समाज में उसके छीने गए अधिकार उसे वापस लौटाने होंगे।

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