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दुनिया मेरे आगे: स्त्री का हक

आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 5-9 आयु वर्ग की लड़कियां अपने बराबर के लड़कों से तीस प्रतिशत ज्यादा काम करती हैं। उत्तराखंड में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार पुरुष एक दिन में औसतन नौ घंटे काम करते हैं तो महिलाएं सोलह घंटे।

प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल ही में एक विज्ञापन देखा, जिसमें स्त्रियों की भागीदारी का प्रश्न गहराई से उठाया गया था। कथा कुछ इस प्रकार थी- एक पुरुष काम से घर लौटता है तो देखता है कि उसके दोनों बच्चे घर के लॉन में धूल-मिट्टी से सने खेल रहे हैं। उसे देखते ही वे सहम कर एक ओर खड़े हो जाते हैं। जब वह घर में घुसता है तो चारों ओर उसे अव्यवस्था दिखाई देती है। बच्चों के खिलौने बिखरे हुए हैं, घर की तमाम लाइटें और पंखे चल रहे हैं। नल से पानी टपकता हुआ और सिंक में जूठे बरतनों का ढेर है। अजीब अविश्वास से भर कर और अनहोनी की कल्पना कर वह पत्नी को खोजता हुआ शयन कक्ष की ओर बढ़ता है। दरवाजे की फांक से उसे बिस्तर पर पत्नी के पैर दिखाई देते हैं। वह भयभीत होकर दरवाजे को ठेलता है तो यह देख कर सुकून की सांस लेता है कि पत्नी लैपटॉप पर कुछ देख रही है। वह खीझ कर पूछता- ‘यह सब क्या है?’ पत्नी का जवाब है- ‘कुछ नहीं, बस तुम रोज-रोज कहते थे न, कि दिन भर घर पर क्या करती हो! तो बस आज कुछ नहीं किया।’

एक हल्की मुस्कुराहट के साथ स्त्री द्वारा किए जाने वाले भुगतान रहित श्रम का मूल्य वह महिला समझा जाती है। स्त्रियों द्वारा घर के भीतर किए जाने वाले काम की गिनती ‘कुछ नहीं’ में ही की जाती रही है। कॉलेज में हर वर्ष प्रवेश लेने वाली न जाने कितनी ही छात्राएं जब मां और पिता द्वारा किए जाने वाले काम का कॉलम भरती हैं तो अक्सर कहती हैं- ‘मम्मी तो कुछ नहीं करतीं… वे हाउस वाइफ हैं बस’। मैं मुस्कुरा कर इतना ही कहती हूं- ‘इतनी बड़ी ऐसे ही हो गई? बिना मां के कुछ किए?’

पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री चाहे अवैतनिक श्रम करे या वैतनिक, उसकी स्थिति यही है। बिल्कुल निचले पायदान पर खड़ी स्त्री से लेकर ऊपरी पायदान पर खड़ी निन्यानवे प्रतिशत स्त्रियों का यही हाल है। जैसे मजदूरी करने वाली स्त्रियां अक्सर अकुशल श्रमिक ही होती हैं। वे र्इंट-गारा ढोने का काम करती हैं, जिसके लिए उन्हें पुरुष श्रमिकों से कम मजदूरी दी जाती है। किसी काम के दौरान अगर सफाई या झाड़ू लगानी होती है तो भी स्त्रियां ही लगाती हैं। मेरे पूछने पर कि ‘फर्श पर बिखरी हुई मिट्टी को कौन साफ करेगा?’ तो मिस्त्री साहब ने अपनी कमीज की आस्तीनें चढ़ाते हुए जवाब दिया- ‘लेडीज ही साफ करेंगी?’ मेरे ‘क्यों’ का जवाब था- ‘लेडीज ही करती हैं’। जबकि स्त्री श्रमिकों की अनुपस्थिति में कोई भी बेलदार झाडू लगा देता था।

श्रम के इस विभाजन में यह विषमता हमारी उस सामाजिक संरचना की देन है, जहां स्त्री और पुरुष के कामों में अंतर किया गया है। जबकि जहां ये काम ‘बाजार’ से जुड़ते हैं, वहां यह विभाजन खत्म होता दिखता है। जैसे घर है तो रसोई की जिम्मेदारी स्त्री की है, लेकिन विराट पैमाने पर बड़े होटलों में ‘शेफ’ पुरुष ही होता है। कई बड़े नाम खाना बनाने की कला के साथ जुड़े हुए हैं। सिलाई करने या पिरोने काम स्त्रियों का माना गया है, लेकिन फैशन डिजाइनर या टेलर पुरुष अधिक हैं, स्त्रियां कम। वहां श्रम विभाजन का यह नियम लागू नहीं होता।

शाम को किसी मजदूर बस्ती में बनी छोलदारियों के पास से गुजरते हुए मैं एक अजीब से अहसास से भर जाती हूं जब देखती हूं कि दिन भर के काम के बाद पुरुष बैठे हुए ताश खेल रहे हैं या मनोरंजन कर रहे हैं, जबकि स्त्री श्रम भरा दिन गुजारने बाद फिर से परिश्रम कर रही है, चूल्हा सुलगा कर रोटी सेंक रही है। उसे कोई रोटी बना कर नहीं देने वाला। वह रोटी बनाएगी, तभी खा पाएगी। यह सभी जानते हैं कि स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला दोहरा श्रम उनकी नियति है। चाहे कुछ भी हो, चौका घरनी से ही जुड़ा रहता है। यही कारण है कि बरसों पूर्व बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध थेरी गाथाओं में मुक्ति का एक भाव उस अनुभव से भी जुड़ा हुआ है, जहां वह चूल्हे-चक्की से छूटती है। बुद्ध की शरण में आने के बाद भिक्षुणी कहती है- ‘अरी भली मैं छूटी/ चूल्हे-चक्की से/ और तीन टेढ़ी चीजों से/ ओखली से/ मूसल से/ और अपने स्वामी से..!’

आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 5-9 आयु वर्ग की लड़कियां अपने बराबर के लड़कों से तीस प्रतिशत ज्यादा काम करती हैं। उत्तराखंड में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार पुरुष एक दिन में औसतन नौ घंटे काम करते हैं तो महिलाएं सोलह घंटे। विडंबना यह है कि समाज महिला श्रम को उस रूप में कहीं भी पहचान नहीं देना चाहता। हाथी के पांव में सबका पांव मान कर दोहरा श्रम करने वाली स्त्रियों को कोई पहचान नहीं दी जाती। समृद्ध परिवारों की स्त्रियों को भी संसाधनों पर मालिकाना हक नहीं मिलता। काम के घंटे तिगुने होने पर भी भुगतान में उन्हें काफी कम मिलता है। दुनिया की कुल संपत्ति का दो प्रतिशत हिस्सा ही स्त्रियों के पास है। स्त्री श्रम की पहचान के इस बड़े प्रश्न का निराकरण स्त्रियां खुद ही सचेत होकर कर सकती हैं। उन्हें बाहर से कोई पहचान नहीं देने वाला।

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