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वक्त नहीं है

हमारे-आपके पास एक दिन के चौबीस घंटे हैं। इन्हीं घंटों में जो भी हम चाहते हैं, करना होता है। मगर इसका यह मतलब नहीं कि आगे के घंटे हमें मिलेंगे ही नहीं। वक्त का हर हिसाब, हर पल हमारे अधिकार में है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स : Thinkstock Images)

अंशुमाली रस्तोगी

नहीं जानता कि लोग कैसे ‘वक्त नहीं है’ की शिकायत किया करते हैं। कभी फोन किया जाए तो कहते हैं- ‘बिजी हूं अभी’। घर मिलने जाएं तो ठीक से मिलते नहीं। वक्त न होने का उलाहना यों देते हैं मानो चौबीस घंटे भी उन्हें कम पड़ते हों! पिछले कुछ समय से देख रहा हूं कि हममें से बहुत सारे लोग अब हर बात का ठीकरा वक्त के सिर पर फोड़ने लगे हैं। अपने हर झूठ की बंदूक वक्त के कंधे पर रख कर चला रहे हैं। केवल घर या दफ्तर में नहीं, ‘वक्त की कमी के मारे’ ऐसे लोग गाड़ी चलाते हुए भी खूब दिख जाते हैं, जिन्हें हर किसी से आगे निकल जाने की हड़बड़ी शायद इसलिए रहती है कि वे अपने वक्त को मात दे सकें। मगर वक्त को कभी कोई मात दे सका है भला!

कम से कम मुझे ‘वक्त नहीं है’ की दलील सच कम और बनावटीपन ज्यादा लगती है। वक्त का वास्ता देकर दरअसल हम टालने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसा करके हम सामने वाले को जताते हैं कि वक्त की उसके पास इस कदर कमी है कि वह न तो खुद पर, न खुद से जुड़े किसी व्यक्ति या संबंध पर ध्यान दे पा रहा है। क्या वाकई ऐसा है? क्या वक्त ने हमको अपना इस हद तक गुलाम बना लिया है कि वह हमें मुक्त करना ही नहीं चाहता?

मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है। वक्त ने हमेशा इंसान को स्वतंत्र छोड़ा है। वह जैसा चाहता है, उसके साथ वैसा करता है। इंसान ही वक्त को अपने तरीके से निरंतर बदल रहा है और वक्त भी हर बदलाव में सुखी है, क्योंकि ठहर जाना न कभी वक्त की नियति रही, न इंसान की। इसके बावजूद वक्त की कमी का बहाना बनाना, ऐसा लगता है कि हमारा घोषित स्वभाव बन चुका है।

हमारे-आपके पास एक दिन के चौबीस घंटे हैं। इन्हीं घंटों में जो भी हम चाहते हैं, करना होता है। मगर इसका यह मतलब नहीं कि आगे के घंटे हमें मिलेंगे ही नहीं। वक्त का हर हिसाब, हर पल हमारे अधिकार में है। लेकिन कुछ लोगों को आदत होती है हर समय ‘वक्त की कमी’ की दुहाई देते रहने की। मैंने अक्सर देखा है कि जो लोग हमेशा वक्त न मिलने का बहाना बनाते रहते हैं, वे बड़े निराशावादी और यथास्थितिवादी होते हैं। उन्हें कभी वक्त से तो कभी जिंदगी से हमेशा इतनी तरह की शिकायतें रहती हैं कि कभी-कभी लगता है कि ऐसे लोगों की तकलीफों का कोई हल नहीं!

शायद इस बात का अहसास केवल मुझे नहीं, हममें से हर किसी को होगा कि हम अपना कितना वक्त यों ही बर्बाद कर देते हैं। अपने वक्त को बर्बाद करने के हमारे पास एक नहीं, सैकड़ों जरिए हैं। कुछ खाली बैठे रह कर तो कुछ बेमानी बातों में खुद को लगा कर अपने वक्त को जाया करते रहते हैं। वक्त की कीमत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। हां, समय न मिल पाने का रोना रोते रहना उनके लिए मायने रखता है। ऐसा मैंने खुद महसूस किया है। अगर मैं किसी को कह देता हूं कि ‘मैं फ्री हूं, मेरे पास वक्त है’ तो सामने वाला समझता है कि यार, यह कितना खाली बंदा है। इसके पास वक्त है… कभी यह नहीं कहता कि मैं व्यस्त हूं… मेरे पास समय नहीं है। समस्या दोनों तरफ से है। आपके पास वक्त नहीं तो भी सामने वाला परेशान है। आपके पास वक्त है तो भी सामने वाला परेशान। कभी-कभी तो लगता है कि हम वक्त न मिलने को लेकर तो परेशान रहते ही हैं, पर उससे ज्यादा परेशान इस बात को लेकर रहते हैं कि वक्त इतना कम क्यों मिलता है!

बड़ी-बड़ी किताबों और महान लोगों ने हमें वक्त के पाबंद रहने को लेकर क्या-क्या नहीं कहा-सिखाया, लेकिन वर्तमान परिवेश को देखते हुए आज सबसे बड़ा बेवकूफ वही माना जाता है जो वक्त का पाबंद है! कभी किसी आयोजन में दिए हुए वक्त पर पहुंच जाइए, तो लोग ऐसे देखते हैं, मानो उसने तय वक्त पर आकर कितना बड़ा गुनाह कर दिया! एकाध तो पूछ भी बैठते हैं, इतनी जल्दी क्यों आ गए भाई! हर कहीं देर से पहुंचने को लोग अपनी शान समझने लगे हैं अब। लेकिन उन्हें इस देरी के लिए टोकना उनकी नजरों में सबसे बड़ा गुनाह है। जो समाज या व्यक्ति अपने वक्त की कीमत नहीं समझता, फिर उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। वक्त गुजर जाने के बाद अगर समझा तो क्या समझा! गया वक्त कभी लौट कर नहीं आता। मगर जिनकी आदत में ही शामिल हो चुका है ‘वक्त नहीं है’ का बहाना बना कर अपने वक्त को और खुद को धोखा देना, उनकी परवाह वक्त नहीं करता कभी!

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