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दुनिया मेरे आगे: ऐसी बानी बोलिए

हमारा समाज टूट कर बिखरता जा रहा है। राजनीति ने इस माहौल को और खराब कर दिया है। अलग-अलग राजनीतिक दल इस सामाजिक बिखराव का फायदा उठा रहे हैं।

Author Published on: September 2, 2019 6:01 AM

घनश्याम कुमार देवांश

भक्त कवि कबीर ने एक दोहे में लिखा था-‘ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय/ औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय’। इसका अर्थ यह है कि हमें एक दूसरे से बातचीत करने के लिए हमेशा ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जो हमें भी अच्छी लगे और दूसरों को भी। लेकिन आज हम अपने आसपास जितने भी लोगों से मिलते-जुलते हैं, उनसे बातें करते हैं, उसमें क्या हमें इस दोहे के करीब का भी आशय महसूस होता है? सच यह है कि आजकल हम अपने चारों तरफ जो इतनी अशांति, उत्तेजना, तनाव और मारपीट देखते हैं, उसके पीछे प्रमुख कारण है लोगों में धैर्य का न होना। यह अधैर्य सबसे ज्यादा उनकी जुबान में साफ झलकता है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि मामूली-सी बात पर लोग कई बार अपना आपा खो देते हैं और गुस्सा होकर दूसरे पक्ष के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं। अक्सर ऐसा भी देखने में आता है कि लोग आपस में मारपीट पर भी उतारू हो जाते हैं। अनेक बार ऐसे मामलों में लोग गंभीर चोटों के शिकार हो जाते हैं और कुछ मामलों में तो लोगों की जान तक चली गई। कुछ समय पहले मैं अपने एक सज्जन मित्र के साथ मोटरसाइकिल पर सफर कर रहा था। सड़क पर बहुत भीड़ थी। मित्र की गलती से मोटरसाइकिल हमसे आगे चल रही एक कार में छू गई, जो आगे चलते हुए अचानक ही धीमी हो गई थी।

इसके बाद कार में सवार व्यक्ति ने गाड़ी रोक दी, फिर गुस्से में बाहर निकला और हमारी तरफ बढ़ा। मित्र ने धीरज नहीं खोया और बेहद शालीनता से मुस्कराते हुए कहा- ‘मैं माफी चाहता हूं।’ कार में से गुस्से में उतर कर हमारे पास तैश में आया वह व्यक्ति मित्र के इस व्यवहार से अचानक ही एकदम शांत हो गया और वापस चला गया। उसके जाने के बाद मैंने मित्र से पूछा कि गलती तुम्हारी तो नहीं थी, उसने गलत ढंग से ब्रेक का इस्तेमाल अचानक किया था… फिर तुमने उससे माफी क्यों मांगी? मित्र ने कहा कि वह समय लड़ने-झगड़ने का नहीं… परिस्थिति को समझदारी और ठंडे दिमाग से सुलझा लेने का था। मुझे मित्र की बात अच्छी लगी। अगर कोई और उस जगह होता और उस व्यक्ति से सही या गलत होने पर बहस करता तो अच्छा-खासा झगड़ा सड़क पर हो सकता था, शायद मारपीट भी हो सकती थी।

दरअसल, आजकल हमारी बोलचाल की भाषा इतनी सूखी हो गई है कि उसमें एक दूसरे के लिए न तो प्यार बचा है और न ही सम्मान। हम लगातार एक बिना सहानुभूति वाली भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं और ऐसा करते हुए हमारा बर्ताव कब संवेदनहीन हो जाता है, हमें खुद भी पता नहीं लगता। इस रवैए की वजह से अब हमें एक दूसरे को समझने और एक दूसरे से जुड़ पाने में अच्छी-खासी दिक्कत होने लगी है। कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि एक ही जगह पर काम करने वाले लोग एक दूसरे का अभिवादन करना तो दूर की बात है, एक दूसरे की तरफ मुस्कराकर देखते भी नहीं है। अगर कोई अपने सहयोगी का अभिवादन करता भी है तो उसे उचित उत्तर नहीं मिलता। आसपास बैठने और काम करने के बावजूद एक दूसरे के बीच इस तरह की दूरी कैसे पलने लगती है?

जाहिर है, लोगों के बीच मानवीय रिश्ते सूखते जा रहे हैं। हमारे भीतर सहानुभूति का पानी सूख चुका है। आज लोगों को एक दूसरे के दुख-दर्द और तकलीफों से कोई लेना देना नहीं है। सड़क पर घायल पड़े किसी जीव-जंतु की तो बात ही क्या, किसी हादसे में जख्मी इंसान को भी छोड़ कर हम आगे निकल जाते हैं। हमारे समाज में आज जितनी गरीबी और शोषण दिखाई दे रहा है, उसे देख कर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति बेचैन हो जाए। अलग-अलग जातियां, धर्म, संप्रदाय आदि में लोग न केवल बंटे हुए हैं, बल्कि एक दूसरे के लिए बहुत नफरत भी रखते नजर आते हैं। वे एक दूसरे को लेकर हमेशा डरे रहते हैं।

इस सबसे हमारा समाज टूट कर बिखरता जा रहा है। राजनीति ने इस माहौल को और खराब कर दिया है। अलग-अलग राजनीतिक दल इस सामाजिक बिखराव का फायदा उठा रहे हैं। कोई राजनीतिक दल किसी अल्पसंख्यक समुदाय का भला करने का दावा करता है तो कोई दूसरा आकर किसी अन्य धर्म के उद्धार का ठेका उठाने की घोषणा करता है। कोई दल किसी खास समुदाय का हितैषी बनता नजर आता है तो कोई अन्य समुदायों के लोगों का भला करने के नाम पर राजनीति कर रहा है। लेकिन इन सब मुद्दों के बीच इंसानियत कहीं खो गई लगती है। ऐसा लगता है कि सब अपने अपने हितों को बचाने में लगे हैं। दूसरे पीड़ित वर्गों का किसी को कोई ध्यान नहीं है। इस स्वकेंद्रित जीवन की राह का मंजिल क्या होगा?

 

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