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दुनिया मेरे आगे: अनोखी कड़वाहट

यह हमारा सुपरिचित पौधा है, जो बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधीय प्राकृतिक उपहार है।

इसका कई तरह की बीमारियों में इस्तेमाल होता है।

घर के बाहर कच्ची जमीन पर बेटी ने गिलोय की बालिश्त भर की जो टहनी रोपी, उसमें कब अंखुए फूटे, यह हमें पता नहीं चला। कुछ ही दिनों में गिलोय के इस पौधे ने लता का रूप धर कर ऊपर लगी रेलिंग और दूसरे पौधों को अपनी लपेट में लेने की कवायद शुरू कर दी। पान जैसे खूबसूरत पत्तों वाली यह सर्र्पीली बेल अपने सौंदर्य से हर रोज हमारी आंखों को मोहने लगी। सवेरे उठते ही हम सबसे पहले गिलोय को देखने पहुंचते जो तेजी से फैलती चली जा रही थी। दिन में कई बार उस विस्तारित होती गिलोय को देखना हमारी दिनचर्या में जुड़ गया था। हर रोज टहनियों के सिरे पर नए कोमल पत्ते झिलमिलाने लगते और नीचे के पत्ते अपने आकार में बड़े और ज्यादा गहरी हरीतिमा लिए आंखों को सुकून देते।

हमें यह देख कर आश्चर्य होता कि गिलोय की उस आगे बढ़ती लता को यह कैसे आभास होता है कि उसे अब सहारे की जरूरत है और वह किसी डोर, दूसरे पौधे की टहनी या सामने लटके किसी तार की ओर लपक कर अपना हाथ बढ़ाने लगती! आगे चल कर अगर उसे अपना रास्ता अवरुद्ध दिखाई देता तो वह वापस उसी सहारे पर लौट आती, जिसे उसने अपने कोमल पाश में पहले से बांध रखा है। हमने एक दिन गिलोय की बढ़ती टहनी के सामने थोड़ी दूरी पर बांस की एक खपच्ची खड़ी कर दी, यह देखने के लिए कि क्या इतनी दूरी तक गिलोय की कोई बेल पहुंच कर इसे पकड़ पाएगी! लेकिन दो दिन बाद ही गिलोय ने जैसे लपक कर बांस के नुकीले सिरे को कस कर थाम ही नहीं लिया, बल्कि उस पर उसने अपनी देह के कई सर्पीले फंदे भी कस दिए।

हालांकि प्रकृति और उसके जीवन की ये गतिविधियां स्वाभाविक हैं और मैं इन सबसे बिल्कुल अनजान नहीं रहा हूं। लेकिन यह दृश्य मेरे लिए हैरत में डालने वाला था। मैं सोचने लगा कि क्या गिलोय के सचमुच की आंखें होती हैं! उसे इतनी दूर तक कैसे दिखाई पड़ जाता है कि वहां कुछ है! खैर, कुछ ही दिनों में गिलोय के पौधे ने सचमुच ही ‘अंतरिक्ष’ की उड़ान भर दी। हमारी छतों के छज्जे तक पहुंच कर उसने अपनी ध्वजा फहरा दी। ऐसा लग रहा था कि पता नहीं गिलोय की सर्पीली बेल आसमान में कहां तक का अपना रास्ता तय करेगी!

यह हमारा सुपरिचित पौधा है, जो बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधीय प्राकृतिक उपहार है। इसका कई तरह की बीमारियों में इस्तेमाल होता है। आयुर्वेद में इसे अमृृता, गुडुची (गुर्च), चक्रांगी, छिन्नरूहा आदि नामों से जाना जाता है। पुराने ज्वर जैसी कई असाध्य बीमारियों में इसका सेवन बहुत लाभकारी होता है। इसका स्वाद बहुत कड़वा होता है। इसे उबाल कर पीना बच्चों के लिए कठिन होता है। गिलोय जिस पेड़ के ऊपर चढ़ जाती है, उसके गुणों को भी अपने में समा लेती है। शायद इसीलिए नीम के पेड़ पर चढ़ी हुई गिलोय ज्यादा लाभदायक मानी जाती है। नीम की संगत से उसकी कड़वाहट में और वृद्धि हो जाती है। हमारे यहां कहावत भी है कि ‘गिलोय और नीम चढ़ी’। अब तो बाजार में गिलोय के जूस और चूर्ण भी चमकीली पैकिंग में उपलब्ध हो चुके हैं। आयुर्वेद में इस विषय पर पूरा अलग विज्ञान है जो बेहद पठनीय है।

यह सचमुच चमत्कारी पौधा है, पर मैं यहां सिर्फ उसके रूप-रंग, आकार-प्रकार और प्रकृति की बात कर रहा हूं। इसके बढ़ने की गति और सौंदर्य देख कर कौन होगा जो मुग्ध नहीं होगा। पत्ते का आकार एकदम ‘दिल’ की तरह। कुछ-कुछ पान से मिलता-जुलता। मैंने अपनी इस गिलोय-लता की कई तस्वीरें उतार कर मित्रों को भेजीं, पर उनमें से कोई उसे पहचान नहीं पाया। एक बोले कि यह मगही या दिसावरी पान है। हम प्रकृति से इतने दूर हो गए हैं कि पेड़-पौधों की शिनाख्त हमारे लिए नितांत मुश्किल कवायद हो गई है। हम हर रोज अपनी रसोई में जिन चीजों का इस्तेमाल करते हैं, उनके पौधों को न पहचान पाना हमारे लिए अफसोस की बात है।

उस दिन तेज बरसात में गिलोय भीग रही थी। पत्ते कुछ ज्यादा ही धुले और चमकीले लगने लगे थे। हवा में लहराती उसकी टहनियों ने उसके लचीलेपन को और अधिक लोच प्रदान कर दी थी। मैं बेल को संभालने में लगा था कि देखा कि उसके कुछ पुराने होते पत्ते पीले जर्द हो गए हैं। मैंने उन पत्तों को तोड़ कर अलग करना चाहा, पर उनमें अभी नमी बरकरार थी। बूढ़े होते वे पत्ते हरेपन के बीच एक अलग ही सौंदर्य की सृष्टि कर रहे थे। फिर हमने नन्हे कोमल पत्तों की तरफ गौर से देखा। अभी उन्हें जीवन की दीर्घ यात्रा तय करनी है पुरातन होने के लिए। गिलोय की टहनियां ज्यों-ज्यों मोटी और कड़ी होती जाती हैं, उनमें कड़वापन बढ़ता है, जो अत्यंत लाभकारी है। प्रकृति ने हमें जो कुछ अच्छा दिया है, उसमें गिलोय की अनोखी कड़वाहट भी है। यह सचमुच अमृता है।

सुधीर विद्यार्थी

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