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बेरोजगारी का दंश

कितने ताज्जुब की बात है कि हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास स्थायी और हमेशा के लिए कोई काम ही नहीं है। कभी कहा जाता था कि लगातार एक ही काम करते रहने से व्यक्ति उस काम में प्रवीण हो जाता है। ‘करत-करत अभ्यास के होत चीकने पात’ वाली उक्ति अक्सर दोहराई जाती रही है। पर आज गरीब और बेसहारा लोगों को अलग-अलग अवसरों, मौसम और मौकों पर अलग-अलग तरीके से काम करते हुए देख कर पुरानी कहावत गलत ही जान पड़ती है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

कितने ताज्जुब की बात है कि हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास स्थायी और हमेशा के लिए कोई काम ही नहीं है। कभी कहा जाता था कि लगातार एक ही काम करते रहने से व्यक्ति उस काम में प्रवीण हो जाता है। ‘करत-करत अभ्यास के होत चीकने पात’ वाली उक्ति अक्सर दोहराई जाती रही है। पर आज गरीब और बेसहारा लोगों को अलग-अलग अवसरों, मौसम और मौकों पर अलग-अलग तरीके से काम करते हुए देख कर पुरानी कहावत गलत ही जान पड़ती है। बहुत-से लोग हैं, जिन्हें हम कभी रंगाई-पुताई करते हुए देखते हैं तो कभी बैंड में बाजा बजाते हुए। कभी गेंदा या गुलाब के फूल बेचते तो कभी गैस-बत्ती उठाते हुए। कभी फल या सब्जी का ठेला लगाते, कभी पैसों के लिए नेताओं की भीड़ में शामिल होते हुए तो कभी कबाड़ बेचते हुए। कभी छोटे-मोटे होटल में गार्ड का काम करते तो कभी सिटी बस या वैन में कंडक्टर का काम करते हुए देखते हैं। यानी वे अवसर और जरूरत के हिसाब से जब भी जो काम मिल जाता है, वही करने लगते हैं। आज इस चौराहे पर तो कल उस दुकान के सामने। कभी इस फुटपाथ तो कभी उस गली। ऐसे ही घूमते फिरते और काम बदलते इनकी जिंदगी गुजर जाती है। उन बेचारों के सामने अपनी पसंद का काम करने की आजादी नहीं है। काम करना उनकी मजबूरी है, भले ही वह कोई काम हो। यों मन का काम करने की आजादी पढ़े-लिखों और हुनरमंदों को भी कहां मिलती है?

एक बार सफाई-पुताई के लिए घर आए लोगों को कुछ दिन बाद मैंने बाजे वालों के साथ उनकी वर्दी में देखा। जब उनसे पूछा कि उन्होंने काम क्यों बदल लिया तो वे बोले कि उनका काम बदलता रहता है। कभी यह तो कभी वह। बाजा बजाने का सीजन चला जाएगा तो कोई काम देखना पड़ेगा। यों उन लोगों ने चाय की दुकान पर कप-प्लेट धोने का काम देख रखा है। ये गरीब लोग कभी भी काम के प्रति आश्वस्त नहीं रह पाते। छाते दुरुस्त करने, दीये बेचने या फिर साइकिल के पंचर बनाने या हवा भरने जैसे काम भी करना पड़ता है। रोज कमाना, रोज खाना शायद इनकी नियति है। बदल-बदल कर छोटे-मोटे काम करके गुजर-बसर करने वालों में सभी वर्ग और समूह के लोग हैं। मुहर्रम के मौके पर मेले में छोटी-मोटी दुकान लगाने वालों में गरीब लोग ही हैं जो खिलौने, भजिए और अन्य सामग्री बेचते नजर आते हैं। इसमें जब मौसम की मार पड़ती है तो उनकी गरीबी में आटा गीला हो जाता है। फटे-पुराने कपड़ों के बदले बर्तन देने वाली महिलाएं भी मौसमी काम करती हैं। यानी अधिकतर लोग मौसम और जरूरत के हिसाब से काम बदलते रहते हैं।

पान, चाय, मूंगफली, रेवड़ी के साथ ताले, कंघे और नमकीन बेचते हुए बच्चे और जवानों को आपने ट्रेन में भी देखा होगा। ये सभी ऐसे असहाय लोग हैं, जिनके पास काम चुनने का विकल्प ही नहीं है। हमारे देश में काम की तलाश में भटकते लोग अधिक हैं, काम कम। फिर सवाल किया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण करके क्या हम काम करने वालों की संख्या कम करके काम तलाशने वालों की संख्या नहीं बढ़ा रहे? आधुनिक तकनीकी अनिवार्य है। लेकिन उसकी कीमत क्या बेरोजगारों की विशालकाय लाचार फौज होगी? बैंक से लेकर पोस्टआॅफिस, स्कूल-कॉलेज या दूसरी जिन दफ्तरों में दो-तीन सौ लोग काम करते थे, वहां आज गिनती के कुछ लोगों से काम चलाया जा रहा है। बाकी लोग कहां गए? ज्यादातर कॉलेजों में नियमित प्राचार्य नहीं हैं और कई विभागों में अतिथि शिक्षक पढ़ा रहे हैं। पुराने गए, नए आए नहीं। यही स्थिति बहुत से संस्थानों की है। जाने-अनजाने पढ़े-लिखे, अनुभवी और काम करने लायक लोग भी बेरोजगार हो गए। उन्हें भी कोई न कोई काम ढूंढ़ना है। जो भी काम मिलेगा, अपनी अनिवार्य जरूरतें पूरी करने के लिए वे करेंगे ही।

त्रासदी यह है कि ये सभी गरीब लोग असंगठित हैं और मिल कर आवाज नहीं उठा पाते। यही कारण है कि इनकी उपेक्षा हो रही है। कोई इनकी तरफ देखना नहीं चाहता। न कोई समाजसेवी संगठन आगे आता है और न कोई उच्चवर्गीय क्लब। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जहां निर्माण कार्य हो रहा होता है, वहां मेहनत-मजदूरी करते हैं। काम पूरा होने पर उन्हें वहां से हटा दिया जाता है। इनके काम का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है और न घर का। अनिश्चितता और अस्थिरता इनके जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है। एक तरफ ऐसे लोग हैं जो अरबपतियों के यहां जन्म लेते हैं और पैदाइश से ही अरबों के मालिक हो जाते हैं। उन्हें बिना कुछ काम किए ही प्रतिमाह लाखों या करोड़ों रुपए अपने हिस्से के रूप में मिलते हैं और वे अपनी आय के स्रोत के बारे में भी नहीं जानते। दूसरी तरफ ये लाचार लोग, जिनके पास न तो कोई स्थायी काम है और न ही रहने के लिए कोई घर। जीवन की यह विडंबना भीतर तक हिला देती है।

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