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दुनिया मेरे आगे: सफर की छवियां

एक युवती ने रेलगाड़ी की यात्रा के बारे में फुर्सत और विस्तार से बताया जो काठगोदाम से लखनऊ तक की तकरीबन साठ-पैंसठ रेल यात्राएं दो साल में कर चुकी थी।

Author July 4, 2019 1:57 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

पूनम पांडे

रेल से सफर करना किसी रोमांच से कम नहीं होता। अगर यात्रा सात घंटे से अधिक की है तो कई बार हम अपने साथ कुछ ऐसी यादें समेट कर ले आते हैं जो सारी जिंदगी नहीं भुलाई जा पातीं। रेल का डिब्बा हमारे गंतव्य तक अपना घर ही है और उस डिब्बे के लोग यानी सहयात्री हमारा परिवार। जो लोग अक्सर रेलगाड़ी से ही यात्रा करना पसंद करते हैं, वे बहुत सहनशील और मानवीय गुणों से युक्त होते हैं। ऐसी ही एक युवती ने रेलगाड़ी की यात्रा के बारे में फुर्सत और विस्तार से बताया जो काठगोदाम से लखनऊ तक की तकरीबन साठ-पैंसठ रेल यात्राएं दो साल में कर चुकी थी।

उसके पास अनुभवों का इतना मजेदार खजाना मिला कि एक के बाद एक किस्सों की बाढ़-सी आ गई। एक बार उसे एक दार्शनिक मिल गए। उनका बात करने का अंदाज इतना सम्मोहक था कि उन्हें सुनने के लिए और लोग भी उसी जगह पर आ गए और दरी बिछा कर उनकी बातें सुनने लगे। युवती ने बताया कि ‘करीब पचास वर्ष की उम्र के वे विचारक हम सबको इतनी बढ़िया बातें बता रहे थे कि पूरी यात्रा में लखनऊ का स्टेशन आने तक लोगों ने अपना मोबाइल तक बंद रखा।’

जब यात्रा पूरी हो गई तो वहां मौजूद एक यात्री ने सलाह दी कि ‘सर, आप चैनल वाले उपदेशक क्यों नहीं बन जाते! आपके पास सब कुछ होगा… सुख-सुविधाएं, सारी दुनिया में भक्त, चैनल में प्रसारण आदि!’ यह सुन कर वे मुस्कुरा दिए और बोले- ‘मैं एक संत के लिए प्रवचन का आलेख ही लिखता हूं, पर यह धंधा है। सिर्फ धंधा। मैं बस ऐसे ही ठीक हूं। अगर सुविधा मिल गई तो आप जैसे इतने प्यारे लोगों से रेलगाड़ी में कैसे मिलूंगा!’

इसी तरह एक बिहारी परिवार मिल गया। वे लोग किसी आस्था और मन्नत को पूरा करने के लिए देवांशरीफ की मजार पर जाने की बातें कर रहे थे। उनकी बातों का उतार-चढ़ाव बहुत ही प्यारा था। बातों में पूरे समय एक अनोखी-सी मिठास थी। बीच-बीच में कुछ खाने का सामान निकाल कर वे लोग मिल बांट कर खा रहे थे। उनकी बातों के विषय इतने सरस थे कि युवती को मजा आ रहा था। मसलन, इस बार बरसात में कौन-से पौधे रोपे जाएंगे… किस रंग के कपड़े इस साल पहनने से रह गए… रायता किस-किस चीज के साथ खाया जाना चाहिए… इस बार कौन-से विवाह समारोह होने वाले हैं… वगैरह।

यानी उनकी गपशप में न कोई क्लेश, न कोई शिकायत और न ही किसी परिचित की कोई पंचायती शामिल थी। युवती ने कहा कि लखनऊ में पत्ता गोभी सबसे सस्ती मिल जाती है। जब बाकी सब्जियां पचास रुपए किलो तक पहुंच जाती हैं, पत्ता गोभी तब भी बीस रुपए किलो मिल जाती है और उस दिन उस बिहारी परिवार ने गपशप के बीच ही पत्ता गोभी का रायता बनाने की विधि भी आपस में साझा कर ली थी, जो उस युवती के कानों से यादों की किताब में छप गई थी। युवती ने हंस कर आगे कहा- ‘एक बार तो मेरे सामने रहस्य और रोमांच की एक फिल्म ही बन गई। दरअसल, काठगोदाम से पति-पत्नी सामने वाली बर्थ पर आकर बैठ गए और मुझे लगा कि इस जोड़े के साथ लखनऊ तक सफर मजेदार रहेगा। मगर लालकुआं पर एक सज्जन आए और उन तीनों में बातचीत होने लगी। फिर वे नए सज्जन गंभीर होकर पति से बोले- ‘तो हां… आप लौट जाओ… मैं लखनऊ ही जा रहा हूं। साथ ही हूं, कोई डर नहीं है!’ शायद वे नए सज्जन उस व्यक्ति के कोई वरिष्ठ या अधिकारी थे, इसलिए उसने उन्हें विनम्रता से कहा- ‘ओह… शुक्रिया सर, मुझे कल भवाली में काम है।’

करीब दस मिनट तक सब सामान्य रहा। उसके बाद लखनऊ तक वे मोहतरमा हिचकोले भरी यात्रा का आनंद लेती रहीं। न दुनिया की परवाह, न कोई और फिक्र। कैसे-कैसे लोग होते हैं!’ अगले सच्चे किस्से में एक मूक-बधिर बच्चे के माता-पिता और सामान्य भाई के साथ उस युवती का सफर पूरा हुआ। उस यात्रा ने उसे बहुत कुछ सिखाया था। उस परिवार का धैर्य काबिले-तारीफ था। संसार में सबको तो मुकम्मल जहां नहीं मिलता! युवती ने कहा- ‘उस दिन के बाद मैंने तुनकमिजाजी की अपनी आदत में सुधार किया।’ इसके बाद वह युवती अपनी नम आंखें पोंछने लगी। एक बार एक संगीतज्ञ मिले तो उन्होंने हर चाय और समोसे वाले के साथ-साथ बाकी सहयात्रियों को हर बात का जवाब राग यमन के आलाप और तानों मे देकर माहौल सुंदर बना दिया। चाय वाला तो थकान ही भूल गया। वह भी कुछ गाने लगा… जैसे राग यमन में फिल्मी गीत ‘चंदन-सा बदन, चंचल चितवन…!’ जब सुबह लखनऊ का चारबाग रेलवे स्टेशन आया तो वे संगीतज्ञ राग भैरव गाने लगे- ‘जागो… मोहन प्यारे…!’ इसके बाद युवती ने कहा- ‘रेल यात्रा सचमुच अद्भुत होती है’ और मुस्कुरा पड़ी!

 

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