ताज़ा खबर
 

अंधविश्वास के पांव

दिक्कत मीडिया के एक हिस्से से है जो इन ग्रंथों को आधार बना कर अनर्गल बातें अपने दर्शकों के मानस में उंड़ेल रहा है। लगभग सभी चैनलों पर ज्योतिष के कार्यक्रमों की बढ़ती भीड़ को समाज के हित में नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसके बहाने अंधविश्वास का फैलाव व्यापक पैमाने पर हो रहा है।

Author February 20, 2019 11:22 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

रजनीश जैन

इसमें कोई विवाद नहीं है कि हमारे देश में प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की बहुतायत रही है। इनमें दर्शन, इतिहास, साहित्य, अध्यात्म और विज्ञान जैसे विषय शामिल हैं। एक समय अधिकतर ग्रंथों का अरबी, फारसी, चीनी, जापानी और जर्मन भाषाओं में अनुवाद होना सामान्य घटना मानी जाती थी। आज यह सारा ज्ञान अनूदित होकर कई शोध पत्रों और पुस्तकों में संरक्षित हो गया है। इनकी बदौलत वेदों और उपनिषद की ऋचाएं समूचे विश्व के विद्यार्थियों के पास पहुंच गई हैं। निश्चय ही यह उपलब्धि गर्व करने लायक है। अगर इस बात का डंका बजाया जाता है तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है। दिक्कत मीडिया के एक हिस्से से है जो इन ग्रंथों को आधार बना कर अनर्गल बातें अपने दर्शकों के मानस में उंड़ेल रहा है। लगभग सभी चैनलों पर ज्योतिष के कार्यक्रमों की बढ़ती भीड़ को समाज के हित में नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसके बहाने अंधविश्वास का फैलाव व्यापक पैमाने पर हो रहा है।

ज्यादा घातक और चिंताजनक बात यह है कि इसी के साथ अवैज्ञानिक तथ्य भी विज्ञान की शक्ल में परोसे जा रहे हैं। यह सब इसलिए भी हानिकारक है कि जनमानस ही नहीं, बल्कि समाज का प्रबुद्ध वर्ग भी अब अंधविश्वासों का तर्क सहित विरोध करने, वैज्ञानिक आधारों का हवाला देने के बजाय इनके बारे में ही बात करने लगा है। सूचना के अंधड़ में हमारा विवेक ध्वस्त होने लगा है, क्योंकि हर तीसरे दिन प्रकट होने वाला नया दावा कहीं न कहीं हमारी वैज्ञानिक सोच को कुतरने लगा है। अक्सर इस तरह के कपोल-कल्पित रहस्योद्घाटन किसी ऊंचे कद के दिखने वाले नेता के मुखारविंद से टपक रहे हैं। लिहाजा, उन्हें मीडिया या प्रचार माध्यमों के बड़े हिस्से में खासी जगह मिल रही है। प्राचीन साहित्य और मिथकों से निकाल कर लाई जा रही ऐसी मनभावन पेशकश समग्र वैज्ञानिक सोच को चुनौती देने लगी है। सामान्य प्राकृतिक घटनाओं को प्राचीन धारणाओं के चश्मे से देखा जा रहा है।

हम पीछे क्यों देख रहे हैं? कहीं इसके अवचेतन में कोई हीन भावना तो काम नहीं कर रही है? यह चलन इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि डार्विन, न्यूटन और आइंस्टाइन जैसे महान वैज्ञानिकों और शख्सियतों को खारिज किया जा रहा है। बात शायद गणेश की प्लास्टिक सर्जरी से शुरू हुई थी, बढ़ते-बढ़ते हाल ही में संपन्न विज्ञान कांग्रेस के मंच तक जा पहुंची। एक शोधपत्र ने यह साबित किया कि किसी जमाने में हमारे यहां चालीस इंजनों वाले विमान थे और दूसरे ग्रहों पर जाना सामान्य बात थी… रावण के पास अपना हवाई अड्डा था। एक वैज्ञानिक ने स्टीफन हॉकिंग के ब्लैक होल सिद्धांत को हास्यास्पद बता दिया। एक ने कौरवों की पैदाइश टेस्ट ट्यूब से घोषित कर दी, तो एक अन्य ने न्यूटन और आइंस्टाइन के सिद्धांत गलत बता दिए! टीवी मीडिया के लिए माना जा सकता है कि उसके अस्तित्व के लिए इस तरह का कचरा परोसना एक नियमित काम का हिस्सा हो सकता है। लेकिन आखिर कब तक वे ऐसा करते रहते हैं? क्या इन्हें सिर्फ अस्तित्व बचाने की कवायद तक सीमित रहना है? विश्वसनीयता और इस तरह के अनर्गल दावों के लिए शोध करने का दायित्व वहन नहीं करना है?

विज्ञान कांग्रेस के मंच से इस तरह की बातों पर जब सवाल किया गया तो विद्वान वैज्ञानिक का मासूम जवाब था कि ये बातें संस्कृत के ग्रंथों में लिखी हैं तो गलत तो हो ही नहीं सकतीं। इस तरह का दावा उन्होंने बगैर सोचे-विचारे अपने नाम से सार्वजनिक रूप से कर दिया। उन्हें शायद इस बात का खयाल नहीं रहा कि वे जिस वैज्ञानिक समुदाय के सामने ऐसी बात कर रहे हैं, उनकी नजर में इसे कैसे देखा जाएगा! हालांकि इस तरह के दावों को समय-समय पर अकाट्य तर्कों की मदद से बेबुनियाद ठहराया जाता रहा है। लेकिन खारिज करने की सकारात्मक खबरों को इतनी अहमियत मीडिया में नहीं मिलती, जितनी इनके प्रचार के समय मिलती है। यहीं यह समझना मुश्किल हो जाता है कि संचार माध्यमों के काम में इस तरह का दोहरापन क्यों होता है। जबकि सच यह है कि सही सूचनाएं आम लोगों तक पहुंचाना समूचे मीडिया की जिम्मेदारी है।
निश्चित ही समय का यह दौर गंभीर चिंतन करने का है। एक पूरी पीढ़ी इस दुविधा में है कि वाट्सऐप और फेसबुक जैसे माध्यमों पर अनवरत आ रही जानकारी को सही मानें या वैज्ञानिक साहित्य पढ़ें! जन सामान्य को कौन-सा साहित्य पढ़ना चाहिए और कौन-सा नहीं, ताकि वह कूपमंडूकों के रेवड़ का हिस्सा न बन सके। इस दिशा में भी काफी कुछ प्रयास करने की आवश्यकता है। प्रसार माध्यमों और शिक्षण संस्थाओं की भूमिका को अहम माना जा सकता है कि वे ही अंधेरे को दूर करने में मदद करते हुए अंधविश्वास के फैलाव को रोक सकते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि विकास के सारे चरण प्रतिगामी हो जाएंगे, अगर अंधविश्वासों से मुक्ति का रास्ता नहीं अपनाया गया!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X