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दुनिया मेरे आगे: सृजन का दायरा

संभवत: इसका एक कारण यह भी हो कि इंटरनेट की दुनिया में अभी सही मायने में समाजवाद नहीं आया है। बहरहाल, सोशल मीडिया और साहित्य दोनों को एक दूसरे से प्राणवायु मिल रही है, वहां इन दिनों खुशनुमा वातावरण है।

फेसबुक, वॉट्सऐप पर अब आप आजाद हैं।

सोशल मीडिया की इन दिनों भारी धूम है। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बूढ़े और गृहिणियां… सब किसी न किसी तरह सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं। भले ही देश में इंटरनेट की पहुंच अभी कई करोड़ लोगों तक सीधे तौर पर न हो, लेकिन कहीं न कहीं इसने आम भारतीय के जीवन को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। साहित्य अभी तक सिर्फ प्रकाशकों, अखबारों और पत्रिकाओं के संपादक पर निर्भर था। अब वह एक तरह से बंधन मुक्त हो गया है। फेसबुक, वाट्सऐप, ट्विटर आदि ने साहित्य सर्जकों को एक नई आजादी दी है। अपनी रचनाएं लिखें और बिना किसी संपादकीय प्रतीक्षा और सहमति के सोशल मीडिया के माध्यमों पर डाल दें। यहां का संसार आपका अपना है, गुणवत्ता की कोई बंदिश नहीं। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं, न आलोचना करने वाला।

सोशल मीडिया पर कविता, लघु कथाएं, गजल, छंदबद्ध रचनाएं जैसे कुंडलियों, हाइकू आदि, व्यंग्य, कहानी और आलोचना जैसी विविध विधाओं को आधार बना कर कई समूह बनाए गए हैं। कुछ समूह फेसबुक पर हैं तो कुछ वाट्सऐप पर। माध्यम की अपनी सीमा है, इसलिए फेसबुक पर जो समूह या पेज बने हुए हैं, वे बाकायदा लंबे लेखों आदि को भी शामिल करते हैं। आलोचना और लघु कथाओं, पुस्तक समीक्षा, कहानी आदि के समूह फेसबुक पर अधिक सक्रिय हैं और कविता के अलावा छोटे-छोटे विषयों को लेकर वाट्सऐप पर समूह अधिक कार्य कर रहे हैं। साहित्य की दुनिया में इससे एक तरह का जनतंत्र स्थापित हुआ है। मठ टूटे हैं और साहित्य का विस्तार हुआ है। ज्ञान की दृष्टि से रचनाकारों को इससे काफी फायदा हुआ है, उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला है। रचनाकारों को प्लेटफार्म मिला है, भले ही वे गलत-सही कैसा भी लिखें, लेकिन उन्हें लाइक करने वाले या प्रोत्साहन देने वाले मिल ही जाते हैं। इन समूहों का सीधा फायदा यह मिला है कि नए और समर्थ रचनाकारों की पीढ़ी भी सामने आ रही है। सृजन के संसार को नया विस्तार मिला है।

कई बार बड़े लेखक जब आपकी फ्रेंड लिस्ट से हट कर आपकी रचनाओं पर सकारात्मक टिप्पणी करते हैं तो नए लेखकों का हौसला दुगना हो जाता है। साहित्य की दुनिया में कवियों की संख्या सर्वाधिक है। शायद इसी कारण कविता को लेकर कई समूह सोशल मीडिया पर ज्यादा दिखाई देते हैं। इन समूहों पर कच्ची-पक्की और कभी-कभी अचंभित कर देने वाली कविताएं भी दिखाई देती हैं। संपादकीय आग्रहों और पसंद या नापसंद से दूर ये रचनाकारों के स्वयंभू चौपाल हैं, लघुकथा साहित्य और व्यंग्य के लिए भी समूह मौजूद हैं, जहां आप अपने सृजन को बेबाक होकर दुनिया भर के लेखकों या पाठकों के सम्मुख रख सकते हैं।

इंटरनेट ने एक तरह का विस्फोट कर दिया है और कलाकारों, समानपेशा धर्मियों, साहित्यकारों ने इसका भरपूर लाभ उठाया है। हालांकि इस दुनिया में सब चमकीला ही हो, ऐसा भी नहीं है। सोशल मीडिया के सामने जो चुनौतियां और सीमाएं हैं, वे यहां भी बरकरार हैं। साहित्य की इस वर्चुअल दुनिया में रचनाओं के चोरी होने, उन्हें अपने नाम से प्रसारित कर देने की घटनाएं आम हैं। कई बार मूल लेखक को पता भी नहीं चल पाता है और कई बार साइबर कानून की व्यापक जानकारी न होने के कारण भी नक्काल छूट जाते हैं। इसके अलावा, परस्पर वाहवाही का मनोरम वातावरण भी यहां पर पसरा हुआ है। कई दिग्गज रचनाकार आज सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं।

दरअसल, इसकी जन-पहुंच ने उन्हें भी विवश कर दिया है। नामी-गिरामी रचनाकारों का सोशल मीडिया पर आना उसको एक गरिमा ही प्रदान करेगा। सोशल मीडिया पर साहित्य की गुणवत्ता और स्वीकृति ही बढ़ेगी इससे। कई बार नए लेखकों को सही मंच नहीं मिल पाता है। इस दृष्टि से सोशल मीडिया ने उन्हें नई उड़ान दी है। कुछ एक ने अपने आपको मांजा है और निखारा भी है। वहीं कुछ आत्ममुग्धता की स्थिति में भी हैं। लेकिन फिलहाल यह जरूर है कि सोशल मीडिया की साहित्यिक दुनिया में इन दिनों काफी आवाजाही है, गहमागहमी है। हालांकि यहां भी विचारधारा के संघर्ष, परस्पर पसंद-नापसंद, मुद्दों की टकराहट, रूठना-मनाना, गुटबाजी जैसे कार्यक्रम जारी हैं, लेकिन इसके बिना साहित्य ही कैसा, उसका आस्वादन कैसे होगा! इसलिए बदस्तूर साहित्य अपनी तमाम खूबियों, कमजोरियों के साथ उपलब्ध है।

संभवत: इसका एक कारण यह भी हो कि इंटरनेट की दुनिया में अभी सही मायने में समाजवाद नहीं आया है। बहरहाल, सोशल मीडिया और साहित्य दोनों को एक दूसरे से प्राणवायु मिल रही है, वहां इन दिनों खुशनुमा वातावरण है। यह अलग बात है कि इस तरह के तमाम लेखन का आकलन कैसे किया जाएगा और वह वक्त की कसौटी पर कितना खरा उतरेगा। लेकिन फिलहाल नित नई कोंपले फूट रही हैं और पंछी चहचहा रहे हैं समूहों की डाल पर।

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