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दुनिया मेरे आगे: सोने-जागने का संघर्ष

पार्क से बाहर निकला तो तेज हॉर्न बजाते वाहनों का अनावश्यक ध्वनि-प्रदूषण, कबाड़ी वालों का गला फाड़ चिल्लाना, रेहड़ी-फेरी वालों का वस्तु बिक्री गान सुनाई दिया।

पनी अधिकाधिक जागृत अवस्था से मैं अपने लिए दिव्य अनुभव बटोरता रहा। (सांकेतिक तस्वीर)

जब तक निश्चिंत रहा, खेलता-दौड़ता भागता फिरता रहा, तब तक ही आठ और उससे ज्यादा घंटों की नींद सो सका था। इसके बाद नींद मुझसे रूठ गई और अभी तक रूठी हुई है। शुरू में तो मैं इस अनिद्रा रोग से खुश था। इस दौरान ‘जो जागत है वो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है’ वाक्य मुझे नींद पूरी नहीं होने जैसी बीमारी से लड़ने की शक्ति देता रहा। अपनी अधिकाधिक जागृत अवस्था से मैं अपने लिए दिव्य अनुभव बटोरता रहा। अनुभवों को लिखता रहा। तरह-बेतरह की परिस्थितियों के लिखे गए वर्णन पढ़ कर अच्छा लगता। दोस्तों को पढ़ाता। वे भी प्रभावित होते और निरंतर लिखने के लिए कहते। लेकिन उन्हें यह आभास नहीं था कि लिखने, पढ़ने और इससे प्रभावित होने का आनंद-स्रोत मेरी अनिद्रा थी। जवान शरीर और दिमाग के रहते तो नींद नहीं आने के दुष्परिणामों से बचा रहा, पर अब देर रात तक जागना यानी नींद नहीं आना कष्ट देता है। आंखों में जैसे सारे शरीर का भारीपन आकर स्थिर हो गया है। लेकिन इतना भार ढोते-ढोते भी थकावट से चूर आंखों में नींद का नाम नहीं है।

कई बार सोचा कि दिमाग को सोचने पर नहीं लगाऊंगा। केवल सोऊंगा। लेकिन नींद आ भी जाए, पर परिवेश के शोर को कैसे कम करूं, इससे छुटकारा कैसे पाऊं! किराए का दो कमरे का घर। सभी घर आपस में एक र्इंट से खड़ी दीवारों से जुड़े हुए। आस-पड़ोस में कोई अपना बाथरूम का दरवाजा भी जरा जोर से बंद करता है तो अगल-बगल के दो-तीन घर हिल जाते हैं। कोई अपने किचेन में खाना बना रहा है या बर्तन धो रहा है तो उसकी आवाज भी ऐसे सुनाई दे, जैसे अपने ही घर में यह सब हो रहा है। जिस आदमी की नींद दीवार घड़ी की सेकेंड वाली सुई की टक-टक से भी उचट जाती हो, उसके लिए आसपास के ऐसे हो-हल्ले किसी विस्फोट से कम नहीं हैं।

उस रात भी कुछ न सोचने के प्रण के साथ जैसे ही सोने की कोशिश की तो पीछे के घर से पति-पत्नी के लड़ने, चीखने, आपस में गाली-गलौज करने की कर्कश आवाजें आने लगीं। पत्नी ने जितनी भी बातें कहीं, उनसे उस घर की पूरी कहानी समझ आ गई। समय देखा तो रात के सवा एक बज रहे थे। शायद वे आपस में लड़ते-झगड़ते थक गए तब आधे घंटे बाद शांति छा गई। सोचा अब नींद का ध्यान करूं। इतने में गली के कुत्ते मिल कर जोर-जोर से भौंकने लगे। रात की शांति भंग करते हुए इतने कुत्तों का एक साथ भौंकना, लगा जैसे शोर का तूफान गलियों से उठ कर आसमान और मेरे कमरों की तरफ ही बढ़ रहा है। पहले ही सिर भन्ना रहा था और अब वह भारीपन से बुरी तरह दब गया।

जब सब तरह का शोर थम गया तो पानी पीकर लेट गया। घड़ी साढ़े तीन बता रही थी। अब सुबह होने तक करवट गिनने की बारी थी। पांच से छह बजे के बीच अगर थोड़ी नींद आती भी तो वह सुबह के कोलाहल से उचट जाती। अंत में अखबार वालों, दूधिया, स्कूली बच्चों, मोटरसाइकिल, कार, खाना बनाने, बर्तन धोने की आवाजों के साथ विचित्र सपनों के आने-जाने के बीच सोने और जागने का संघर्ष। इन सबसे खुद को किसी तरह बचाने के लिए पार्क में जाकर बैठ गया। पेड़, पौधे, हरी-हरी घास, रंग-बिरंगी कलियां और फूल, गिलहरी, कबूतर, चिड़िया, गीली मिट्टी को एक-डेढ़ घंटे तक देखता रहा। प्राकृतिक ठंडी हवा का सेवन करता रहा। रात के शोर, अनिद्रा, बेचैनी, थकावट से लड़ने के लिए सुबह इन्हीं की सहायता लेता हूं। रात भर नींद न आने के बाद भी दिन भर रोजगार के लिए प्रकृति ही मुझे जागृत करती है।

पार्क से बाहर निकला तो तेज हॉर्न बजाते वाहनों का अनावश्यक ध्वनि-प्रदूषण, कबाड़ी वालों का गला फाड़ चिल्लाना, रेहड़ी-फेरी वालों का वस्तु बिक्री गान सुनाई दिया। रात मेरे जैसों की नींद हराम करने के बाद कुत्ते यहां-वहां पसरे हुए सो रहे थे। ये हाईटेक सिटी नोएडा की कहानी है। व्यक्ति के लिए इतनी दुश्वारियां होने के बाद भी कर्ताधर्ताओं के लिए तरक्की शब्द आकर्षण बना हुआ है। आदमी वाहन चला रहा है या पैदल चल रहा है, वह घर में है या बाहर सब जगह ध्वनि-प्रदूषण का आतंक है।

मनोज कुमार अभिनीत ‘शोर’ फिल्म की याद आती है। उसमें एक अभिनेता जीवन परिवेश के शोर से इतना दुखी हो जाता है कि एक दुर्घटना में अपनी सुनने की शक्ति गंवाने के बाद उसे दुख नहीं होता। बहरा होना उसे श्रवणशक्ति से पूर्ण होने से ज्यादा भाता है। बहरेपन में जब कोई उसे इशारे से आसमान में उड़ता हवाई जहाज दिखाता है तो वह उसे देख, उसकी गड़गड़ाहट को नहीं सुन कर एक खास तरह की आत्मसंतुष्टि महसूस करता है। अपनी स्थिति भी शोर से आहत किसी पात्र की तरह ही है।

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