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दुनिया मेरे आगे: शिकायत का हासिल

स्त्री द्वारा किए गए काम और उसकी सफलता को एक व्यक्ति के काम या उसकी सफलता की दृष्टि से देखे जाने से पहले उसके सौंदर्य के अनुपात में देखा जाता है। यों तो यह एक सार्वभौमिक सत्य है, लेकिन भारत के समाज में इसे काफी आसानी से देखा जा सकता है।

हमारी मानसिकता ने स्त्री को बराबरी से देखना सिखाया ही नहीं। (फोटो सोर्स : Pixabay)

आलोक रंजन

पुरस्कार प्राप्त करते हुए वह वाकई खूबसूरत लग रही थी। सोशल मीडिया पर जब उसने तस्वीर डाली, तभी से सब उसे बधाई दे रहे थे। मैंने बधाई के साथ-साथ उसके सुंदर लगने वाली बात भी लिखी। थोड़े दिनों बाद हम किसी मुद्दे पर बात कर रहे थे और बात आगे चली तो उस टिप्पणी पर पहुंच गई। साथ में उसने यह भी जोड़ा कि उसका जिक्र आते ही मैं सौंदर्य से जुड़ी बातें करता हूं जो उसे अच्छी नहीं लगतीं। ऐसा नहीं था कि उसे सुंदर होना अच्छा नहीं लगता, बल्कि बात उससे आगे की थी। उसने जो कहा वह एक साथ बहुत कुछ सिखाने वाला और लंबे समय से चली आ रही मेरी मान्यताओं को बदल देने वाला साबित हुआ।

उसका कहना था कि किसी के सौंदर्य पर बात करना उतना जरूरी नहीं है, जितना कि उसके प्रयास और उसकी मेहनत पर। बात सौंदर्य पर केंद्रित होकर रह जाती है और उसके पीछे वह सब छिप जाता है जो किसी इंसान के लिए आवश्यक है। मसलन, मेहनत और उसका आत्मविश्वास आदि। लड़कियों के मामले में यह बात बहुत आसानी से दिख जाती है। उनके सारे काम पीछे रह जाते हैं और उनकी हर सफलता उनके रूप के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती है। यह स्त्री को सीमित और छोटा कर देने वाली प्रक्रिया है। बात स्त्री तक इसलिए आ गई कि साधारणतया कोई भी पुरुष किसी पुरुष के रूप की प्रशंसा नहीं करता, उसे सुंदर नहीं कहता। जब वह कह रही थी, तब तो नहीं, लेकिन उसके कुछ देर बाद उसकी बात वाजिब लगी। उसकी शिकायत सौ प्रतिशत जरूरी लगी।

मैंने एकाध बार को छोड़ कर शायद ही कभी किसी पुरुष की तस्वीर पर ‘बहुत सुंदर’ कहा होगा! उस दिन समझ में आया कि मेरा किसी को सुंदर कहना कितना जेंडर आधारित है! एक पुरुष के रूप में जाने-अनजाने मेरी जो ट्रेनिंग हुई, वह भी इसी बात की रही। समाज लगातार अपनी भाषा में, अपने कृत्य में यह सिखाता चला गया कि सुंदर का प्रयोग विपरीत लिंग के प्रति किया जाए। थोड़ा सोचने पर यह बात खुल गई कि समान लिंगीय के रूप की प्रशंसा करने पर उसे हतोत्साहित करने के भी प्रयास किए जाते हैं। मुझे अपनी एक और दोस्त की बातचीत याद आई। मैंने उसके पति के शारीरिक सौंदर्य की तारीफ की। उसने तुरंत मुझे कहा- ‘तुम्हारा इरादा क्या है।’ मुझे वहां पर अपनी बात स्पष्ट करनी पड़ी। निश्चित रूप से वह एक मजाक था, लेकिन मेरी दोस्त ने उस मान्यता को ही आगे बढ़ाने वाला कार्य किया, जिसमें सौंदर्य की प्रशंसा लिंग-निरपेक्ष नहीं रहती।

स्त्री द्वारा किए गए काम और उसकी सफलता को एक व्यक्ति के काम या उसकी सफलता की दृष्टि से देखे जाने से पहले उसके सौंदर्य के अनुपात में देखा जाता है। यों तो यह एक सार्वभौमिक सत्य है, लेकिन भारत के समाज में इसे काफी आसानी से देखा जा सकता है। स्त्री को उपभोग की दृष्टि से देखने की हमारी मानसिकता ने स्त्री को बराबरी से देखना सिखाया ही नहीं। इसलिए उसकी सफलता को कम करके देखने की प्रवृत्ति हमेशा से रही। स्त्री का सुंदर होना सबसे पहले नजर आया। कभी-कभी उसका स्त्री होना ही पर्याप्त रहा। सोशल मीडिया पर इसे आसानी देखा जा सकता है। एक ही विषय पर स्त्री और पुरुष की एक समान टिप्पणी होने पर भी जनमत पुरुष की प्रतिक्रिया की ओर साफ झुका हुआ दिखता है। स्त्रियों के हिस्से उनकी तस्वीरों पर आए हुए ‘लाइक्स’ ही आते हैं। यह सब कहना एक सामान्यीकरण लग सकता है, लेकिन वर्तमान दौर में यही सच है।

उसकी शिकायत से समझ आया कि स्त्री को बार-बार सुंदर कहना उसकी प्रशंसा नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व की समग्रता का बार-बार अस्वीकार है। यह कुछ ऐसी बात हुई कि कभी उसमें सुंदरता के अतिरिक्त कुछ और दिखा ही नहीं। उसकी जी-तोड़ मेहनत नहीं दिखी, उसका अपने काम के प्रति समर्पण नहीं दिखा। अगर उसने एक पुरस्कार प्राप्त किया तो उस पुरस्कार के मिलने से पहले उसने अपने समकक्षों में से अव्वल आने लायक काम किया होगा जो खुली प्रतियोगिता के दौर में आसानी से संभव नहीं। फिलहाल हम जिस सामाजिक ढांचे में रहते हैं, उसमें सत्ता की हैसियत में पुरुष है और उसी ने प्रतियोगिता के मानक रचे हैं तो वह आमतौर पर पुरुषों के हक में जाता है। इसमें एक स्त्री को जगह बनाने के लिए पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

ऐसी स्थिति में बधाई देते हुए उसके सौंदर्य पर की गई बात बड़ी लज्जास्पद जान पड़ती है। मैं उस शिकायत को एक सीख की तरह लेता हूं, जिसने यह समझ दी कि सुंदर होना व्यक्ति के हाथ में नहीं है। अगर प्रशंसा करनी ही है तो व्यक्ति के प्रयासों की करनी चाहिए, जिसमें व्यक्ति की भूमिका साफ दिखती है। नैन-नक्श का आकर्षक होना आनुवांशिक है, लेकिन इंसान की मेहनत उसकी अपनी। अगर कोई लड़की सफल होती है तो उसकी मेहनत और काम को देखने समझने की जरूरत है।

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